Prem Ratan Dhan Payo - 47 in Hindi Fiction Stories by Anjali Jha books and stories PDF | Prem Ratan Dhan Payo - 47

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Prem Ratan Dhan Payo - 47

सुबह का वक्त , ठाकुर भवन




नारायण जी हॉल में बैठे अखबार पढ रहे थे । गायत्री उनके लिए चाय लेकर आई । उसने चाय का कप उनकी ओर बढाते हुए कहा " बाबुजी आपकी चाय । "

नारायण जी ने उसके हाथों से चाय ले ली । गायत्री भी किचन में चली गई ।

वही ऊपर गिरिराज के कमरे का दरवाजा खुला । वो तो अभी तक सो रहा था लेकिन रागिनी तैयार होकर बाहर चली आई । उसने इस वक्त गायत्री के कपडे पहने हुए थे । वो कुंदन के कमरे के पास चली आई । उसने दरवाज़ा खटखटाया । कुंदन शायद जगा हुआ था , इसलिए उसने जल्दी आकर दरवाज़ा खोला । रागिनी उसे देख तिरछी मुस्कुराहट के साथ बोली " छोटे ठाकुर सुबह हो गयी हैं । अब तो उसे छोड दीजिए वैसे भी कल उसकी पहली रात थी । "

कुंदन चिढ़ते हुए बोला " पहली रात हो या दूसरी रात उसे सब सिखा कर भेजना चाहिए था न । रो रोकर बस दिमाग खराब किया हैं उसने । जाओ ले जाओ उठाकर । " ये बोल कुन्दन कमरे से बाहर चला गया ।

रागिनी मन में बोली " बाप रे इतना गुस्सा ये तो अपने बडे भाई से भी चार कदम आगे निकले । " रागिनी ये बोलते हुए कमरे में चली आई । एक पल के लिए सकीना की हालत देखकर वो चौंक गयी । पूरे बदन पर चोट और जख्मों के निशान थे , जो अब नीले पड चुके थे । सिर्फ एक सफेद चादर मे लिपटी वो बेड पर पडी थीं ‌‌। रागिनी उसके पास आई । उसने जैसे ही सकीना की बांह पर हाथ रखा वो घबराकर उठ बैठी । " नही अब और नही हम मर जायेंगे । " सकीना कहते कहते रूक गई जब उसने रागिनी का चेहरा देखा ‌‌। रागिनी उसके पास बैठी अपना सिर पीटते हुए बोली " हाय राम क्या होगा लडकी तेरा ? कितना सिखाया तुझे लेकिन हमक़ो नही लगता कुछ भी तेरे पल्ले पडा होगा ‌‌। थोडा बहुत हमारे सिखाए गए ज्ञान का प्रयोग कर लेती , तो इतने ज़ख्म नही मिलते । "

सकीना अपने आंखों में आसु लिए नजरें नीची कर बैठी थी । आखिर वो कहे भी तो क्या कहे ? जिस्म फरोशी के दल-दल में जबरदस्ती उसे धकेला गया । अब उससे उम्मीद की जा रही थी की वो उसमें महारत भी हासिल करे । रागिनी उसके कपडे उसकी ओर बढ़ाकर बोली " पूरा दिन नही बिताना हमे यहां , अब जल्दी से इसे पहनकर तैयार हो जा । " सकीना कपडे लेकर बेड से उतरने की कोशिश करने लगी तो एक पल के लिए गिरने से बची । चलने में बेहद तकलीफ हो रही थी उसे ‌‌। आसु और तेज हो गये , लेकिन खुद को संभालते हुए वो वाशरूम तक पहुंची । पूरे आधे घंटे बाद वो तैयार होकर बाहर आई । रागिनी उसे साथ लेकर कुंदन के कमरे से बाहर निकली । बाहर निकलते ही उन दोनों को अपने ठीक सामने दिशा खडी नज़र आई । रागिनी और सकीना दोनों रूक गए । दिशा का चेहरा गुस्से से तमतमा रहा था । वो रागिनी की तरफ उगली कर बोली " तुम जैसी निहायती घटिया बेशर्म लडकी मैंने आज तक कही नही देखी । सिवाय दूसरों की जिंदगियां बर्बाद करने के और कुछ आता नही हैं तुम लोगों को । पहले सिर्फ बाहर गंदगी फैलाती थी ‌‌। अब तो लोगों के घर में आकर गंदगी फैलाने लगी हो । बहुत सुकून मिलता हैं न दूसरो का घर बर्बाद करके । एक बात याद रखना सुकून से कभी नहीं जी पाओगे । जिस तरह तुम दूसरो के आंसूओं की वजह बनते हो , उसी प्रकार तुम्हारी आंखों से भी नमी कभी दूर नहीं होंगी । ये बद्दुआ है मेरी । " दिशा की कडवी बातें सुनकर रागिनी ने कोई रियेक्ट नहीं किया , बस सकीना सिर नीचे किए आंसू बहा रही थी ।

दिशा जाने लगी तो रागिनी उसे पीछे से टोकते हुए बोली " जरा रूकिए दिशा जी एक बेहतरीन नसीहत भी साथ लेते जाइए । " ये बोल रागिनी उसके सामने चली आई और अपने दोनों हाथ बांधते हुए बोली " कहा जाता हैं की हम जो दूसरों को देते हैं वही हमारे पास लौटकर आता हैं चाहे वो आशिर्वाद हो या बद्दुआ ..... बात समझ गयी न हमारी । "

दिशा ने घूरती नजरों से उसे देखा और फिर वहां से चली गई । रागिनी तिरछी मुस्कुराहट लिए उसे जाते हुए देख रही थी । वो सकीना का हाथ पकड़ नीचे चली आई । कुंदन और गिरिराज भी वही हॉल में बैठे थे । रागिनी और सकीना सीढ़ियों से नीचे उतर रही थी । सबकी नजर उनकी ओर गयी । गायत्री जिसके हाथों में चाय की ट्रे थी वो चलते चलते रुक गई । भले ही चेहरे पर घूंघट हो लेकिन चीजों को वो अच्छे से देख पा रही थी । रागिनी ने नारायण जी और बाकी सबको देखकर हाथ जोड़ लिया और सकीना को साथ लेकर बाहर निकल गई । उनके जाते ही नारायण जी ने गिरिराज और कुंदन की ओर देखा और थोडा गुस्से से बोले " ई सब हवेली में का कर रही थी ? "

कुंदन तो चुप रहा अब जवाव देने की सारी जिम्मेदारी गिरिराज पर थी । गिरिराज हकलाते हुए बोला " वो .... वो बाबुजी कल कुंदन का जन्मदिन था तो बस उसी खुशी में .... गिरिराज इतना कहकर चुप हो गया । नारायण जी दांत पीसते हुए बोला " खुशी हो या मातम दोबारा से ई गलती नही होनी चाहिए । ई सब हवेली के बाहर ही शोभा देता हैं । घर के अंदर लाने लायक़ वस्तु नही होती । समाज में खबर फैली तो तुम लोगों का कुछ नही बिगड़ेगा , लेकिन हमरी बेइजतती जरूर होगी । "

" समझ गये बाबुजी आगे से ऐसा नही होगा । " गिरिराज ने कहा । गायत्री भी खुद को संभालते हुए चाय की ट्रे लेकर वहां पहुंच चुकी थी । नारायण जी अपनी चाय खत्म कर चुके थे , इसलिए उठकर बाहर चले गए । गायत्री ने कुंदन और गिरिराज को चाय दी और वहां से चली गई । गिरिराज कुंदन के कंधे पर हाथ रखकर बोला " का बात हैं कल रात इतना सुंदर तोहफा दिये चेहरा तो खिला-खिला होना चाहिए , लेकिन तुम्हारे चेहरे पर तो मायूसी छाई हुई है । "

कुंदन उसका हाथ हटाते हुए बोला " और नही तो का पागलों की तरह हंसे मुस्कुराए । कैसी लडकी थी सिवाय नखरे के रात भर कुछ नही की । सारा मूड का सत्यानाश कर दिया । "

" इतना काहे भडक यह रहे हो तुम्हरे लिए ही तो नयी नवेली उठाकर लाए थे ‌‌। " गिरिराज ने बेशर्मी से कहा तो कुंदन बोला " बाजी मारना तो कोई आप से सीखे । खुद तो रसमलाई उठाकर ले गए और हमको पकडा दिया छोटा सा आम जो ठीक से पका भी नही । " गिरिराज उसकी बातों पर मुस्कुरा रहा था ।

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सुबह का वक्त , रघुवंशी मेंशन




सुबह जानकी पूजा के बाद सबको आरती दे रही थी । समायरा के दोस्त तो अभी सो रहे थे , अगर कोई जगा था तो बस रिषभ । उसने जब आरती ली तो जानकी का ध्यान उसपर गया । ऋषभ मुस्कुराते हुए बोला " आप बहुत अच्छा गाती हैं । "

जानकी ने कोई जवाब नहीं दिया बस हल्का मुस्कुरा दी । वो आरती की थाल लेकर ऊपर की तरफ चली गई । सीढ़ियां चढ ऊपर पहुंची ही थी , की तभी सामने से आता राघव दिख गया जो किसी से फ़ोन पर बात करता हुआ आगे बढ रहा था । वो जानकी के साइड से निकलकर जा ही रहा था की तभी उसे कुछ ध्यान आया । वो रूक गया और जानकी के हाथ में रखी थाल से आरती ली । राघव आगे बढ गया । जानकी मुस्कुराते हुए परी के कमरे में चली गई । अंदर आते ही उसे परी ड्राइंग करती हुई नज़र आई । जानकी उसके सामने बैठी और उसे आरती देते हुए बोली " आज आप इतनी जल्दी उठ गयी । "

परी ने हां में सिर हिला दिया । जानकी उसे देखते हुए बोली " आप सुबह सुबह ड्रोइंग बुक लेकर क्यों बैठ गयी । "

" जानू मैने न मम्मा , चाचू और आपकी भी ड्रोइंग बनाई हैं । बताओ न कैसी ड्रोइंग बनी हैं । "

जानकी उसकी ड्रोइग देखते हुए बोली " आपकी तरह बहुऊ प्यारी है । लेकिन आप इसे बाद में बनाना अभी हमे स्कूल जाना हैं इसलिए पहले हम रेडी होंगे । " ये बोलते हुए जानकी उसे तैयार करने लगी ।

कीर्ती अपने कमरे से बाहर निकलते हुए खुद से बोली " यार घर हैं या सिंगिंग काम्पडिशन का मंच । कौन इतनी सुबह सुबह भजन गाता हैं । " कीर्ति ने वहां पास से गुजर रही एक नौकरानी से पूछा " ऐ सुनो .... ये सुबह सुबह भजन कौन गा रहा था ? '

" ये जानकी दीदी की आवाज थी । वही इतना प्यारा भजन गाती हैं । ' नौकरानी ये कहकर आगे बढ गयी ।

" वाह नौकरों को भी घर के मंदिर में जाने की इजाजत हैं । लगता हैं समायरा तुम्हें यहां आकर बहुत सी चीजें बदलनी पडेगी । "

कुछ देर बाद सब लोग नाश्ते की टेबल पर जमा हुए । कीर्ति को छोड़कर बाकी सब वहां मौजूद थे । जानकी परी को नाश्ता करा रही थी । राज भी वहां पहुंच चुका था । अंदर आकर वो सबको सरप्राइज़ देता था , लेकिन आज खुद सरप्राइज़ था । इतने सारे नये चेहरों को देखकर वो वही रूक गया । करूणा मुस्कुराते हुए बोली " वहां क्यों रूक गये राज । अंदर आओ ये सभी समायरा के दोस्त हैं । " काव्या ने सबसे राज का परिचय करवाया । इसी बीच एक लडकी भागती हुई आई और राज के गले लग गई । उसके इस तरह गले लगने से राज शॉक्ड था । वो लडकी कोई और नही बल्कि कीर्ति थी । राज ने उसे खुद से दूर किया तब कही जाकर उसे कीर्ति का चेहरा दिखा । राज समायरा की सिर्फ एक ही दोस्त को जानता था और वो सिर्फ कीर्ति थी ।

" हे राज , तुम तो काफी बदल गये हो यार । "

राज अपने चेहरे पर जबरदस्ती की स्माइल के साथ बोला " हां और तुम भी । " इतना बोलकर वो नाश्ते की टेबल पर जाकर बैठ गया । पहले परी के गाल खींचे और फिर जानकी को प्यार से गुड मॉर्निंग विश किया । ऋषभ को राज का जानकी से इतने प्यार से बात करना अच्छा नही लगा ।

राज खाते हुए बोला " जानू आज हम दोनों इसे स्कूल छोडने साथ चलेंगे । "

" उसकी कोई जरूरत नहीं हैं क्योंकि मैं जा रहा हू । " राघव ने कहा तो राज और जानकी एक दूसरे की ओर देखने लगे । कुछ देर बाद सबने अपना नाश्ता खत्म किया और अपने अपने काम पर लग गये । करूणा नौकरों को घर का कुछ काम बता रही थी । कीर्ति और बाकी दोस्तों को हवेली घुमाने लगी । राज को भी अपने साथ वो जबरदस्ती ले गयी । राघव जानकी और परी को साथ लेकर निकल चुका था । उन्होंने परी को पहले स्कूल ड्रोप किया । जानकी ने उसे स्कूल के दरवाजे पर छोडा जहां उसके कयी सारे दोस्त खडे थे । उन सबने आकर परी को घेर लिया और उससे पूछने लगे । " परी ये कौन हैं ? "

परी मुस्कुराकर बोली " ये मेरी जानू हैं । " सारे बच्चे जानकी की ओर देखने लगे , आखिर परी दिन भर उसी के बारे में बाते करती थी ‌‌। एक छोटी सी बच्ची आगे आई और जानकी का दुपट्टा खींचते हुए बोली " आप परी की जानू हो क्या हमसे दोस्ती करोगी ? "

उसके ये कहते ही जानकी को हंसी आ गयी । वो नीचे बैठी और उसने परी के पास खडे सभी बच्चों को अपने पास आने का इशारा किया । जानकी ने सबसे दोस्ती की । जानकी की नजर परी पर गयी जो सबको उसके पास देखकर जेलेस फील कर रही थी । जानकी उसके पास आई और उसके गालों को चूमते हुए बोली " जानू सिर्फ आपकी हैं बाकी सबके लिए वो डुबलिकेट कॉपी । जाइए जाकर पढ़ाई कीजिए हम दोपहर में आपको लेने आएंगे । " परी मुस्कुराकर अपने दोस्तों के साथ वहां से चली गई ।

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ये बात तो सही हैं जानू सिर्फ परी की हैं बाकी सबके लिए डुबलिकेट कॉपी हैं । ऋषभ का खिंचाव जानकी की तरफ क्यों हैं ? क्या वो राघव और जानकी के बीच एक दीवार का काम करने वाला है ? कैसी मुसीबत आने वाली हैं ? ये जानने के लिए पढ़ते रहिए मेरी नोवल

प्रेम रत्न धन पायो

( अंजलि झा )


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