bhram jaal in Hindi Horror Stories by Sanjay Kamble books and stories PDF | भ्रम जाल

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भ्रम जाल


 भ्रम जाल



ऑफिस के वार्षिक समारोह की पार्टी और सहकर्मियों की जिद... लेकिन वह हाथ में शराब का गिलास लेकर शराब पीने का नाटक कर रहा था। तो उसे इस कार्यालय में शामिल हुए कुछ सप्ताह ही हुए होंगे। और हालाँकि उसे कुछ दिन पहले ही समझ में आ गया था कि ऐसी बड़ी-बड़ी पार्टियों में शराब पीना प्रतिष्ठा की निशानी मानी जाती है, लेकिन शराब पीकर अपनी प्रतिष्ठा बढ़ानी पडे इतना भी बूरा समय नहीं आया है और वैसे भी वो जिस बस्ती में रह चुका है वहा वहाँ शराब पीने वाले लोग मान, मर्यादा और प्रतिष्ठा को बढ़ने की बजाय उसी गिलास में मिलाकर पी जाते थे।



रात 11:30 बजने के बाद भी पार्टी खत्म नहीं हुई थी... बॉस कब के निकल चुके थे , ऑफिस में काम करने वाले कुछ लड़के-लड़कियाँ एक-दूसरे के साथ हल्के-फुल्के गानों पर डांस कर रहे थे... लेकिन वो बेचारा एक जगह अकेले बैठे सब कुछ देख रहे थे। लेकिन पर अब उसे काफी बोर लगने लगा... लगभग सभी को बाय कह कर वो वहां से घर के लिए निकला....

    रात के तकरीबन 12 बज चुके थे... ऑफिस शहर से तकरीबन बीस किलोमीटर की दूरी पर था । हालाँकि दिन में सड़क पर काफी भीड़ रहती , लेकिन रात होते होते सड़क पूरी तरह से खाली हो जाती..। और अब वो उसी सड़क पर बाईक से जा रहा था। कभी-कभी सड़क के दोनों ओर बंजर विरान इलाका लगता, तो कभी-कभी घनी झाड़ियों के बीच से सुनसान सड़क दिखाई देती। सड़क से कुछ दूरी पर छिटपुट आबादी नजर पडती. जब एखाद गांव आता था तो सड़क के किनारे गांव के आवारा कुत्तों को सोता देख थोड़ा डर भी लगता... उस घने अंधेरे में कभी कभार ही कोई गाडी सामने से आती हुई दिखाई पड़ती।. । कानों में पहने हेडफोंस के उपर लगे गानों की धुन पर उसका सफर शुरू था। सड़क के दोनों तरफ कई तरह की झाड़ियां नजर आ रही थी। वैसे पिछले दो हफ्तों से वो इसी सड़क से ऑफिस के लिए जाता इसलिए यह इलाका उसके लिए नया नहीं था। उसी सड़क के बीच-बीच में कई छोटे छोटे पूल लगते थे। 

          टेढ़े मेढ़े रास्ते से गुजरते हुए उसकी गाड़ी एक छोटा पूल क्रॉस करते हुए आगे आई और सड़क किनारे खडे एक बड़े से बरगद के पेड़ के सामने उसे लोगों की भीड़ दिखाई दी। शायद एक्सिडेंट हुआ था। भीड़ से आगे जाते हुए उसने अपनी गाड़ी सड़क किनारे खड़ी की और पीछे आकर देखने लगा। सड़क पर कांच के टुकड़े बिखरे पड़े थे। सड़क के बीच से एक सफेद लंबी सी लकीर नजर आ रही थी। शायद कोई बाइक वाला स्लिप होकर गिरा था। वहां से थोड़ा खून भी बहता दिखाई दिया। लोगों की काफी भीड़ थी। उसने आगे जाकर देखना चाहा पर कुछ दिखाई नहीं दिया। इसलिए उसने भीड़ में ही खड़े एक आदमी से पूछा।
" भाई साहब। क्या हुआ ? "

"किसी ट्रक का पहिया सीर के ऊपर से गुजरने की वजह से मौके पर ही मौत हो गई है।"

" क्या किसी ने एंबुलेंस को फोन किया है ?"

" हां गाड़ी निकल चुकी है शायद कुछ देर में पहुंच जाएगी "


  " वैसे एक्सीडेंट हुआ कब है ?"


" पता नहीं, लोगों की भीड़ दिखाई दी इसलिए रुक कर देखा तो पता चला के एक्सीडेंट हुआ है। वैसे भाईसाहब, मैं आगे के गांव जा रहा हूं। क्या मुझे वहां तक छोड़ देंगे "

" जी जरूर , चलिए "

 वो आदमी गाड़ी की पिछली सीट पर बैठ गया और उन लोगों का सफर शुरू हो गया।

बाइक चलाते हुए उस लड़के ने कहा।

" रात के समय अगर कोई साथ हो तो सफर जल्दी खत्म होता है, ऐसा मैंने सुना है "

" सही कहा आपने "

" वैसे भाई साहब आप यही के रहने वाले हैं ?"

" जी नहीं मेरा गांव यहां से काफी दूर है। मैं यहां नौकरी की तलाश में आया हूं "

" तो क्या नौकरी मिल गई...? या तलाश अभी भी जारी है ?"

"अभी तक तो नहीं मिली, पर मिल जाएगी। "

अपने राइट हैंड से बाईक का हैंडल पकड़कर उसने लेफ्ट हैंड पीछे वाले पॉकेट में डालकर एक कार्ड निकाला और पीछे उसकी तरफ करते हुए कहा

" यह मेरा ऑफिस का कार्ड है, कल आप मुझे इस पते पर आकर मिलीये "

कार्ड हाथ में लेकर पीछे बैठे उस आदमी ने कहा।

" आपका बहुत-बहुत शुक्रिया, वैसे साहब आप हमेशा इतनी देर से आते हैं ?"

" अरे नहीं, आज ऑफिस में पार्टी थी इसलिए थोड़ा लेट हो गया, "

" अच्छा, फिर ठीक है "

" क्यों , क्या हुआ ?"

" कुछ नहीं , यह सड़क कुछ ठीक नहीं है "

" हां पता है ,काफी गड्ढे और स्पीड ब्रेकर है यहां पर। दिन के समय ठीक है पर रात को गाड़ी चलाते वक्त काफी मशक्कत करनी पड़ती है। अगर तेज रफ्तार से गलती से गाड़ी का पहिया गड्ढे में गया तो समझो काम खत्म।"


" अरे साहब । में सड़क के बीच बने गड्ढों के बारे में बात नहीं कर रहा।"

उस आदमी की बात सुनकर उसने आश्चर्य से पूछा।

" तो फिर किस बारे में बात कर रहे हैं ?"

" लोग कहते हैं यह रास्ता भुतिया है। लोगों ने इस रास्ते पर काफी अजीब और गरीब घटनाओं को अनुभव किया है।"

" आपको जो कहना है खुलकर कहिए।"

" इस सड़क पर बुरी आत्माओं का बसेरा है।"

उस आदमी की बात सुनकर वह लड़का ठहाका मार के हंसने लगा। उस की बातों का मजाक उड़ाते हुए बोला।

" भाईसाहब, बाकी सब तो ठीक है। लेकिन आपको इन अजीबोगरीब ख्यालों से बाहर आना होगा। मेरा मतलब है हमारा देश चांद पर मंगल पर और पता नहीं कौन-कौन से ग्रहों पर अपने स्पेसक्राफ्ट भेज रहा है। लेकिन आप लोग अभी भी भूत प्रेत जैसी मनगढ़ंत कल्पनाओं में फंसे हुए हैं। यह सब हमारे दिमाग का वहम होता है। हम जो, जैसा, जिस तरह का सोचते हैं हमारा दिमाग हमें वही बातें दिखाता है। आपलोग जिसे भूत प्रेत कहते हैं वह दरअसल इन्सान के दिमागी की बीमारियां है। किसी साइकोलॉजिस्ट की नजर में उन्हें स्क्रिजोफ्रेनिया हैल्ल्यूसीनेशन कहा जाता है। और एक बात बताऊं, मैं आज तक कई बार रात में सफर कर चुका हूं । काफी सुनसान जगहों से गुजरा हूं, लेकिन मुझे तो आज तक कभी भुत प्रेत का अनुभव नहीं हुआ। और ना कभी होगा। क्योंकि यह बातें हमारे दिमाग का भ्रम है , जो हमें भ्रमित करती है। मैं आज की पिढी का युवा हूं। कोई मन से 'भ्रमित' इंसान नहीं. समझ गये मेरी बात को ?"

इतना कह कर उस ने पीछे मुड़कर देख एकदम से चौंक गया।. 

" अरे ये कहां गया ? अभी तो था। बातें करते-करते हम यहां तक तो साथ आए हैं , पर एकदम से ये कहां ????"

कहते हुए उसने अपनी बाइक की रफ्तार कम की और सड़क किनारे बाइक खड़ी कर वह कुछ कदम पीछे चल कर देखने लगा.. लेकिन कोई दिखाई नहीं दे रहा था... वह आश्चर्य से खडा इधर-उधर देख रहा था लेकिन आस-पास न कोई बस्ती दिखी, न कोई घर.. 


 " कैसा आदमी है? लगता है कि वह कुछ ज्यादा ही जल्दी में था इसलिए बाइक के रूकने का इंतजार भी नहीं किया... सीधे कूद गया...!"

   उसने अपनी बाईक फिर से स्टार्ट की और अपनी मंजिल की ओर चल दिया... हवा बेहद ठंडी थी। एक पल के लिए सोचने लगा।

 'अगर पार्टी में कुछ ड्रिंक कर ली होती तो इतनी ठंड नहीं लगती... फर्क सिर्फ इतना है कि घर जाने की बजाय अस्पताल जाना पड़ता। या कोई खुद ले जाता... '


 और इस ख्याल से उसके चेहरे पर हल्की सी मुस्कान छा गई.. गांव धीरे-धीरे पीछे जाने लगे... थोड़ी दूरी तय करने के बाद उसे कुछ बेचैनी महसूस हुई... हालांकि रात के अंधेरे को चीरते हुए हेडलाइट्स की रोशनी में आगे का इलाका बिल्कुल साफ दिख रहा था , पर उसे कुछ ऐसा महसूस हुआ... मानो कोई उसे अपनी ओर खींच रहा हो... शायद यह काम की थकान और आज पार्टी में बिताया समय था, हालाँकि वो शराब नहीं पीता था , फिर भी उसे कुछ अंदाज़ा था कि किसी दोस्त ने उसके साथ शरारत की होगी। मतलब उसकी कोल्ड ड्रिंक में चुपके से शराब मिला दी होगी और यह ठंडी हवा अब उस नशे का अहसास करा रही थी।


*****


रास्ता अब और भी डरावना लगने लगा. दूर तक जाने वाली हेडलाइट की रोशनी में उसे सिर्फ एकांत और अकेलेपन से घिरी सड़क ही नजर आ रही थी...लेकिन थोड़ी देर बाद उसे कुछ अजीब सा महसूस हुआ...वह आस-पास के माहौल से भ्रमित हो गया।


 'मै तो अभी यहीं से गया था .! या मुझे लगता है कि मैं यहां से जा चुका हूं.. यह क्या हो रहा है मेरे साथ ?
शायद मुझे लगता है कि मैं यहां से गुजरा हूं। मतलब
ऐसी चीजें अंग्रेजी फिल्मों में बहुत देखी गई हैं जिसे 'डेजा वु' कहा जाता है... मतलब की हमें लगता है कि एखादं घटना हमारे जीवन में घट गई है लेकिन वास्तव में ऐसा पहली बार हो रहा होता है।'


 जब वह अपने विचारों में खोया हुआ था, तभी उसे एक और झटका लगा... नाले पर बना वह पुल पार करने के बाद कुछ दूर आगे एक बरगद के पेड़ के नीचे सड़क के बीच में लोगों का जमावड़ा दिखाई देने लगा.. उसने बड़ी गौर से आसपास के इलाके को देखा और वह सच में चौंक गया.. 

 'अरे यह भ्रम नहीं। सचमुच, मैं कुछ समय पहले इसी सड़क, इसी जगह से गुज़रा हूं। क्योंकि वो लोग अभी भी वहीं खड़े हैं। हो सकता है कि एंबुलेंस अभी भी नहीं आई हो...। लेकिन मैं दोबारा इस सड़क पर कैसे आ गया..?'


 सब कुछ उसकी कल्पना से परे था... उसने अपनी बाईक की रफ्तार धीमी कर ली , क्योंकि सड़क पर लोगों की काफी भीड़ थी... उसे नहीं पता था कि भीड़ में किससे और क्या पूछा जाए , क्योंकि वह कुछ समय पहले उसी जगह से गुजरा था। और वह जानता था की वहां एक दुर्घटना हुई है और वो ये भी जानता था की उस दुर्घटना में एक व्यक्ति की मौके पर ही मौत हो गई...


तो वो बिना किसी से कुछ पूछे धीरे धीरे भिड़ से बाईक निकालते हुए जाने लगा... लेकिन तभी पीछे से उसके कानों में आवाज़ आई...

 "भाईसाहब, मुझे अगले गांव में छोड़ दीजिए..."

उसके हां या ना कहने से पहले ही वह शख्स दौड़ता हुआ उसकी बाईक के पीछे बैठ गया.. उसे थोड़ा गुस्सा आ गया क्योंकी वो अजनबी सीधे आकर बाईक के पीछे बैठ गया...

 "अरे, दूसरी गाडी देखो,. मुझे बहुत दूर जाना है..."


 " अरे भाईसाहब, रात के एक बज चुके हैं, इतनी देर तक यहाँ कौन रुकेगा? और वैसे भी , किसीने कहा है 'अगर रात के सफर में कोई साथ हो तो रास्ता जल्दी और आसानी से कट जाता है..."


 उस इन्सान के मुँह से निकले शब्द सुनकर वह चकरा गया। क्योंकि यही वाक्य उसने कुछ समय पहले उसी जगह से गुजरते समय किसी अन्य व्यक्ति से कहा था... उसे नहीं पता था कि क्या हो रहा है... अब वे भी परेशान हो गया था पर बिना कुछ बोले वह चुपचाप बाइक चला रहा था।. कुछ देर तक दोनों चुप रहे... दरअसल वह अपने ही ख्यालों में खोया हुआ था, तभी पीछे बैठा शख्स बोलने लगा...

" एक बात कहूं "

" जी कहिए "

 "दरअसल, अगर कोई आपके साथ हो तो आप नहीं जानते कि रास्ता जल्दी खत्म होगा या नहीं, लेकिन कभी-कभी इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन रास्ता नहीं..."


 "मतलब .. ? आख़िर आप क्या कहना चाहते हैं...?"


 "यह सड़क काफी अजीब है .. मेरा मतलब है, चार या पांच मील की दूरी तक। कब कोई यहां से गुजर जाए और किसी को दुनिया से गुजार दे, कहा नहीं जा सकता। इसीलिए तो कहते हैं कि कभी-कभी इंसान खत्म हो जाता है, लेकिन यह सड़क ख़त्म नहीं होती।”


 पीछे बैठा शख्स बात तो कर रहा था लेकिन उसे उस शख्स की बात सुनने में कोई दिलचस्पी नहीं थी... लेकिन पीछे बैठे शख्स को क्या पता कि उसे उसकी बात सुनने में दिलचस्पी है या नहीं.. वो बोलता रहा...


" चिथड़े उड़ गए है..! सिर सचमुच कुचल दिया गया है... इस महीने में यह चौथी दुर्घटना है... गाडियां सही से चलाने के लिए पीछे का बोर्ड लगाया गया है, लेकिन कौन सुनेगा ? और हम कितना भी अपनी गाडी सही तरीके से गाड़ी चलाए, इसकी क्या गारंटी है कि सामने से आने वाला कैसी चला रहा है..? या अभी उसका दिमाग कैसा है ? मतलब, क्या वह दारू पी के टाईट है, या दारू मिली नहीं इसलिए गुस्सा है। या किसी से लड़ कर के आ रहा है , या किसी को मारने जा रहा है, अपनी गर्लफ्रेंड को मिलकर खुशी में आ रहा है या प्रेमिका ने ना बोला इसलिए खुद को खत्म करने की सोच रहा है। ..''


उस आदमी की बातें वह चुपचाप सुन रहा था . उसे कोई दिलचस्पी नहीं थी लेकिन उसके कान खुले थे और ना चाहते हुए भी वह सारी बातें उसके दिमाग को कुरेद रही थी... अब उसका गांव कब आयेगा और यह कब उतरेगा रही सोच रहा था... लेकिन उसके दिमाग में कोई और ही बात घूम रही थी


 ' पहली बात , वह आदमी जो थोड़ी देर पहले बाईक पर बैठ कर आया था वो अचानक कहां गायब हो गया...? और दुसरी बात मैं इस सड़क पर वापस कैसे आ गया?'


 हालाँकि गर्मी के दिन थे, लेकिन रात के इस समय हवा बेहद ठंडी थी....सड़क किनारे कुछ पेड़ और झाड़ियाँ दिख रही थीं...सामने काफी दूर उस गाँव में बिजली के खंभे पर लाइट की धिमी रोशनी चमक रही थी। ..


 "सर, क्या आप हर दिन इतनी देर से आते हैं या आज देर हो गयी...?"


 उसके पीछे बैठे व्यक्ति के एक प्रश्न ने उसे उसके विचारों से बाहर निकल दिया...


 "आज ऑफिस में पार्टी थी इसलिए थोडी देर हो गई..."


 "तभी आपको इससे पहले नहीं देखा... ठीक है, उस नाले पर बने पुल के बगल में रोक दिजिए..."


 "नदी के पास....? पर वो गाँव तो काफी दूर है न?"


पर पीछे बैठे आदमी ने कोई जवाब नहीं दिया। 
कुछ दूर एक छोटे से पूल पर उसने अपनी बाईक रोक दी... पुल के नीचे बहते पानी की आवाज़ उस भयानक सन्नाटे में स्पष्ट रूप से सुनाई दे रही थी... उसने पीछे मुड़कर देखा और वह व्यक्ति बिना एक शब्द कहे तेजी से सड़क पार कर दूसरी तरफ जा रहा था... थोडी गौर से देखा तो सड़क के दूसरी ओर कुछ दूर उसे घनी झाड़ियों के बीच आग की हल्की लपटें दिखाई दे रही थीं... उसने अपनी बाईक स्टार्ट की और थोड़ा आगे जा कर देखा तो उसे नदी के किनारे एक श्मशान घाट दिखाई दिया, जहां एक चिता धूं धूं कर जल रही थी... 


 'वो आदमी श्मशान घाट चला गया ? शायद मृत व्यक्ति उसका रिश्तेदार होगा...'



 वह बाईक पर बैठ कर ही श्मशान में जलती चिता को देखने लगा तभी वही आदमी जलती चिता के नजदीक जाता दिखाई दिया... रात के अंधेरे में आग की लपटों की पीली लाल रोशनी बहुत निराशाजनक थी...वह दृश्य मन को परेशान कर रहा था इसलिए उसने अपनी बाइक स्टार्ट की और उस व्यक्ति को देखा तो वो श्मशान में खड़ा कुछ कर रहा था... मतलब वह शख्स चिता के बिल्कुल करीब गया, मुश्किल से दो कदम लेकिन हैरानी की बात की थी कि जलती हुई लपटों का उस पर कोई असर नहीं हो रहा था... और अगले ही पल जो हुआ उसे देखकर किसी का भी कलेजा कांप उठता... वह आदमी जलती हुई चिता पर चढ़ गया और किसी पागल की तरह चिता पर जलती हुई लकड़ियाँ एक तरफ फेंकने लगा... यह भयानक दृश्य देखकर उसकी आँखें फटी की फटी रह गई ... ऐसा लग रहा था जैसे उसके शरीर की सारी ताकत ख़त्म हो गई हो... वह कांपती बेचैनी से सामने का भयानक दृश्य देखने के लिए विवश था... अगले ही पल चिता पर खड़े उस आदमी ने चिता में जल रही अधजली लाश को बाहर निकाला.. और जो उसने देखा वह कल्पना से परे था। वो जलती लाश उसकी खुद की थी... उसके शरीर पर जलता हुआ मांस लटक रहा था... उसके बाल पिघल कर जल रहे थे और सिर से चिपके हुए थे.. अधजली वो लाश में जैसे जान आ गई और धीरे धीरे चिता में खड़ी होने लगी... चिता के पास खड़ा हुआ आदमी चिता में खड़ी उस लाश के साथ कुछ बात करने लगा और इधर बाइक पर बैठा हुआ आदमी डर के कारण अपने होशो हवास खो रहा था । तभी एकदम से उसका पैर लड़खड़ा गए और वह गिरते गिरते संभाल। तभी झटके से दोनों ने अपनी गर्दन उसकी तरफ कर ली और गुस्सैल नजरों से उसे देखने लगे। वह भयानक दृश्य देखकर उसकी रूह तक कांप गई। झट से बाईक स्टार्ट की और स्पीड बढ़ा दी... बड़ी तेजी से उसकी बाइक सड़क पर दौड़ने लगी। उसने साइड मिरर में देखा तो उसके पीछे सड़कपर दो जलती हुई मानवी आकृतियाँ दौड़ रही थीं। वो भी डरा सहमा बडी तेज़ गति से अपनी बाईक चलाने लगा ... कुछ देर तक यह भयानक पीछा चला रहा। 

उसकी बाईक की रफ्तार १०० km से ज्यादा हो गई. वह बाईक चलाते हुए भी पीछे देख रहा था लेकिन कुछ दूर जाने के बाद उसे यकीन हो गया कि उसके पीछे कोई नहीं आ रहा... उसने राहत की सांस ली... 


 'यह कैसी अजीब घटना थी..? क्या सच में भूत होते हैं या ये सिर्फ एक भ्रम था...? भ्रम और वो भी इतना असली...?'


 उसके दिमाग में ख्यालों का तूफ़ान उठ गया... कब ख़त्म होगी ये राह और कब आएगा मेरा घर... और कब रुकेगी ये दहशत... लेकिन न ये सड़क ख़त्म हो रही थी, न ये रात...

उसने घड़ी में समय देखा और चौंक गया...

' ये कैसे हो सकता है ?'

 उसने गाड़ी की रफ्तार धीमी की और गाड़ी सड़क किनारे रोक दी। उसने दोबारा गौर से घड़ी में वक्त देखा 
' 12:30....! मतलब मै आधे घंटे से इसी सड़क पर घूम रहा हूं..? यह नामुमकिन है। '


 उसने बाईक स्टार्ट की और स्पीड बढ़ा दी... फिर से उसकी बाइक तेज गति से चलने लगी... वह सड़क के दोनों तरफ देख रहा था पर उसे कोई गांव नजर नहीं आ रहा था .. फिर भी बाईक की स्पीड कम किए बिना ऐसे ही जाने लगा... कुछ तिरछे टर्न लेकर वो बाईक से नाले को पार करने लगा... और सामने का दृश्य देखकर उसके दिमाग ने काम ही करना बंद कर दिया। वही बरगद का पेड़, सड़क पर लोगों की वही भीड़ और... दिमाग सुन्न हो गया था... लेकिन दूर से ही हॉर्न बजाते हुए वहां बीना रूके चल पड़ा ... कुछ समय पहले हुई भयानक घटना के बाद अब आधी रात को किसी को लिफ्ट देने की हालत में नहीं था ... वह उस भीड़ से बचकर आगे निकला और गहरी राहत की सांस ली। 


 " एक्सीडेंट हो गया.. सिर के पुरी तरह से चिथड़े उड़ गए है."


 कानों पर पड़े ये शब्द सुनकर उसका दिमाग ही सुन्न हो गया... उसने झट से बाईक की स्पीड धीमी की सड़क किनारे रूकते हुए पीछे मुड़कर देखा । पर पीछे तो कोई नहीं था... लेकिन उसने आवाज साफ-साफ सुनी थी... और वो भी बहुत करीब से...


उसके दिमाग में काम करना बंद कर दिया था। वो सोचने लगा.

 'क्या मुझे वापस मुड़कर ऑफिस जाना चाहिए? चलो आज रात ऑफिस में ही रूकता हूं। यहां सब कुछ अजीब हो रहा है..."


 उसने अपना मन बना लिया और बाईक वापस मोड़ ली... और अब वह फिर से ऑफिस की ओर चल पड़ा... बाईक तेज गति से चल रही थी... और अब उसे डर का अहसास होने लगा था...दिल की बढ़ती धड़कने, पसीने से लथपथ शरिर और कुछ देर पहले की वह घटना याद आते ही उसके शरीर पर सिहरन दौड़ जाती। तभी आगे टेढ़े टर्न खत्म हो गए और नाले पर बना वह पुल आ गया जीसे देखकर अब उसका धैर्यही समाप्त हो गया. ..

 ' मैं तो ऑफिस जा रहा था...! पर ये रस्ता। तो घर की तरफ जाता है...' 

 और कोई उसके कान में फुसफुसाया...

 " मैंने कहा था ना, सड़क ख़त्म होगी या नहीं पता नहीं लेकिन आदमी जरूर ख़त्म हो जाता है।"


  उसने झट से पीछे मुड़कर देखा तो जलती चिता से निकली वह लाश उसकी बाइक के पीछे बैठी थी। 
यह दृश्य देख उसकी जान हलक तक आ गई। उसका खुद पर कोई नियंत्रण नहीं था। उसने सामने देखा तो वहीं लाश अब उसके सामने सड़क के बीचों-बीच दौड़कर उसकी तरफ आ रही थी और वह अपनी बाईक पर से नियंत्रण खो बैठा...

       बाईक सड़क से नीचे फिसलने की कर्कश आवाज, और उसके मुंह से निकली चीखें जीसनने रात के उस सन्नाटे को फाड दिया.. बाईक सड़क के बीच में एक जगह रूक गई और एक बार फिर रात के भयानक अँधेरे में फैले सन्नाटे ने सब कुछ निगल लिया... आवाज़ थी तो दर्द से उसके कराहने की... उसका शरीर घायल हो गया था... उसने चारों ओर देखा और सन्न रह गया... क्योंकि वह उस जगह पर पड़ा था जहां कुछ देर पहले उसने दुर्घटना देखी थी... पुल पार करने के तुरंत बाद वह एक बहुत बड़ा बरगद का पेड़ था... मतलब कि वह वापस उसी स्थान पर आ गया... वह काफी दर्द में था... उसका पूरा शरीर सुन्न हो रहा था... उठना तो दूर वह हिल भी नहीं पा रहा था... अपनी आँखें बंद करके वह दर्द से छटपटा रहा था... और उसे उसी व्यक्ति की बात याद आने लगी जिसे उसने कुछ देर पहले बात करते हुए सुना था...


'भाईसाहब, यह सड़क ठीक नहीं है............

इस सड़क पर एक शैतान रहता है...............

कभी-कभी इंसान ख़त्म हो जाता है लेकिन रास्ता कभी ख़त्म नहीं होता...........'



 कुछ देर पहले की वह बातें अच्छी तरह से याद आने लगी... उसने उठने की कोशिश की लेकिन उसके शरीर में ताकत नहीं बची थी... वह जितना अधिक हिलता उसे उतना ही अधिक दर्द होता... वो वहीं लेटा रहा.। आँखें बंद करके...

' जल्द ही सुबह हो जाएगी... '


 तभी एक जानी-पहचानी आवाज़ उसके कानों पर पडी ।

 "भाईसाहब, क्या हुआ..?"


 "गाड़ी का पहिया सिर के ऊपर से निकल गया है. सिर के चिथडे उड़ गए है। ख़त्म हो गया है..."


 ये शब्द सुनते ही उसने अपनी आँखें खोलीं और देखा कि उसके चारों ओर लोगों की भीड़ जमा है... जो आपस में बात कर रहे थे.. और उसे एहसास हुआ कि यह वही भीड़ है जिसे उसने कुछ देर पहले देखा था.. .. लेकिन अगले ही पल, सब कुछ गायब हो गया...

 वह उस जगह में अकेला था..
 था तो वहां फैला गहरा अंधेरा और भयानक सन्नाटा ...

 अपने शरीर को हिलाने में असमर्थ, वह जोर से चिल्लाया ताकि कोई उसकी आवाज सुन सके। और कोई उसकी मदद के लिए आए... लेकिन.... 

 तभी एक गाड़ी की हेडलाइट की रोशनी से सब कुछ साफ नजर आने लगा...शायद उसी सड़क पर पीछे से एक गाडी आ रही थी... उसने भगवान के सामने हाथ जोड़े और गर्दन घुमाकर देखा तो सड़क पर तेज गति से आ रहे एक ट्रक की हेडलाइट की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ी, और नारियल फटने की आवाज के साथ वह ट्रक तेज़ी से आगे निकल गया..!!!



Story by Sanjay Kamble


समाप्त।