Friday 13 in Hindi Horror Stories by Sanjay Kamble books and stories PDF | Friday 13

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Friday 13




'Friday 13'



पुलिस स्टेशन के भीतर आम दिन की तरह काम चल रहा था। टेबल पर रखे टेलिफोन की घंटी बजने लगी।
फोन रिसीव कर के हवलदार कुछ बोलता इससे पहले सामने वाला इंसान हांफते हुए बोलने लगा। वो काफी घबराया हुआ था। हवलदार ने उसकी बात कागज पर नोट कर ली।
" जी हम जल्द से जल्द पहुंचते हैं ''

फोन रखते हुए वह हाथ में पर्ची लेकर जल्दी में इंस्पेक्टर साहब की केबिन में दाखिल हुआ।
'' सर, " पर्ची सामने रखते ही इंस्पेक्टर साहब के होश उड़ गए।

'' ये कैसे हो सकता है? चलो, गाड़ी निकालो और बाकी एमरजैंसी व्हेइकल्स को इत्तिला करो।"


गाड़ी में बैठते हुए उन्हें किसी की बात याद आ गई।
" सर , शुरूआत है, शायद कुछ बड़ा होने वाला है, और आप ही रोक सकते हैं "

*****


कुछ दिन पहले।



मुंबई के पॉश इलाके में बनी यह गगनचुंबी इमारत शहर की सबसे ऊँची और सबसे आधुनिक इमारतों में गिनी जाती थी। लेकिन इसके भीतर दबी एक भयानक सच्चाई से बहुत कम लोग वाकिफ थे।

उस दिन पुलिस उसी इमारत के सिक्योरिटी रूम में बैठी सीसीटीवी फुटेज खंगाल रही थी। एक कर्मचारी, जो देर रात लिफ्ट में दाखिल हुआ था, अचानक गायब हो गया था। कैमरों में रिकॉर्ड हुआ कि वह लिफ्ट में घुसा, बटन दबाया, लेकिन उसके बाद वह कहीं नहीं दिखा। न वह किसी फ्लोर पर उतरा, न किसी और दिशा में गया।

इंस्पेक्टर सत्यजीत देशमुख माथे पर शिकन डालते हुए बोले, " रफिक, आज तारीख क्या है?"

हवलदार रफिक ने जवाब दिया, 

"शनिवार, 14 तारीख ।"

पर बोलते हुए हवलदार एकदम से चौंक गया।

" साहब, मतलब कल 13 तारीख थी, "

 " बेवकूफों जैसी बातें मत करो, आज 14 तारीख है तो कल 13 तारीख ही रही होगी ना। ये भी कोई पूछने की बात है।"

"साहब, मै इसलिए पूछ रहा हूं क्योंकि मैंने एक किताब में पढ़ा था, अगर 13 तारीख शुक्रवार को आती है तो शैतानी ताकते ज्यादा ताकतवर हो जाती है। "

" तो क्या अब हम, F.I.R. में भूत और चुड़ैलों और आप लोग क्या बोलते हो ? हां, जिन्न , जिन्नात इनके नाम लिखें ? "

हवलदार एकदम से चुप हो गया और गुमशुदा लडके की अखबार में छपी तस्वीर की तरफ देखने लगा। क्योंकि यह पहली घटना नहीं थी। पिछले कई सालों में इस बिल्डिंग में काम करने वाले कई कर्मचारी इसी तरह गायब हो रहे थे। इन्वेस्टिगेशन चल ही रही थी, लेकिन कोई सुराग नहीं मिल रहा था। कुछ दिनों तक यह मामला सुर्खियों में रहा, फिर धीरे-धीरे सब सामान्य हो गया।



कुछ महीनों बाद, राहुल नाम का एक युवक उसी कॉल सेंटर में नौकरी पर लगा। वह किसी से ज्यादा घुलता-मिलता नहीं था। बस, अपने काम से मतलब रखता और रात देर तक काम करने के बाद अपनी बाइक से घर चला जाता।

राहुल का ऑफिस 22वीं मंजिल पर था। वहाँ काम करने में उसे कोई अजीब बात महसूस नहीं हुई, लेकिन सब कुछ तब बदला जब...

रात के 11:00 बजे, राहुल घर जाने के लिए लिफ्ट में दाखिल हुआ और ग्राउंड फ्लोर का बटन दबाया। लेकिन लिफ्ट अचानक 13वीं मंजिल पर रुक गई।

दरवाजे खुले, और दो कंस्ट्रक्शन मजदूर भीतर आ गए। राहुल ने झांककर देखा—गलियारे में हल्की-हल्की रोशनी थी, और कुछ मजदूर काम कर रहे थे।

वे दोनों आपस में बातचीत कर रहे थे—
"तुझे पता है, इस बिल्डिंग के नीचे एक बड़ा कब्रिस्तान था?"


"हाँ, और यहाँ जबरदस्ती इमारत बनाई गई थी। बहुतों ने मना किया था, लेकिन बिल्डर नहीं माना।"


"तभी यहाँ आये दिन कोई न कोई हादसा होता है। कई मजदूर मर चुके हैं। मैं तो कल से ही काम छोड़ रहा हूँ।"

राहुल की आँखें चौड़ी हो गईं। उसे पहली बार पता चला कि यह इमारत किसी पुराने कब्रिस्तान के ऊपर बनी थी।

तभी मजदूर ने कहा, "आज गुरुवार बारह तारीख है, कल शुक्रवार तेरह तारीख है। मतलब, मौत का जाल फैल चुका है।‌!"

उसकी बात सुनकर दूसरे मजदूर ने कहा

" पता नही किस का नंबर आने वाला है ?"

राहुल को एक अजीब-सा डर महसूस हुआ।

मजदूर उतर कर चले गए और दोबारा लिफ्ट का दरवाजा बंद हो गया। अब राहुल को उस पूरी जगह से डर लगने लगा। रह रह कर उसे लगता के लिफ्ट में उसके अलावा और भी कोई है जो उसे देख रहा है। लिफ्ट एक एक फ्लोर नीचे सरक रही थी, और हर फ्लोर के साथ राहुल के दिल की धड़कन भी बढ़ रही थी। लिफ्ट ग्राउंड फ्लोर पर पहुंची और जैसे ही लिफ्ट का दरवाजा खुला राहुल दौड़कर ही बाहर निकला। उसने बाहर जाकर लिफ्ट के भीतर देखा। लगा कोई काली परछाई एक कोने में खड़ी है। ‌ पर तब तक लिफ्ट का दरवाजा बंद होने लगा। 



*****



        अगले दिन, राहुल ने अपने सहकर्मी को यह सब बताया, लेकिन उसने मजाक में उड़ा दिया। उसने कहा,

  "तू किस मंजिल की बात कर रहा है?"

काफी देर बहस करने के बाद राहुल उसका हाथ पकड़ कर जबरदस्ती लेकर लिफ्ट के पास गया। दोनों लिफ्ट में दाखिल हुए। लेकिन जैसे ही उसने फ्लोअर के नंबरों पर नजर डाली राहुल के होश उड़ गए। वह बार-बार उन नंबर्स को देख रहा था क्योंकि वहाँ तो 12 के बाद सीधे 14 था, 13वीं मंजिल तो बनी ही नहीं!

"लेकिन मैंने अपनी आंखों से १३ नंबर के फ्लोर पर लिफ्ट को रूकते देखा था। वे मजदूर देखे थे। यह कैसे हो सकता है ?"

"तुम्हें शायद वहम हुआ होगा, मेरी मानो कुछ दिनों की छुट्टी ले लो।" 

दोस्त हँस पड़ा। दोनों वापस ऑफिस में आ गए । राहुल के हाथ में कागज में लिपटा समोसा रखते हुए वो बोला। 

" ये उल्टी सीधी बाते सोचना बंद कर।"

राहुल अंदर तक हिल गया था। समोसा निकाल कर कागज डस्टबिन में फेंकता तभी उस टुकड़े पर एक न्युज लिखी नजर आई।

'उस बिल्डिंग से फिर एक शख्स लापता।'

और उस लड़के की छपी तस्वीर पर नजर पडी।  

****

कुछ दिनों तक इस घटना से राहुल काफी परेशान रहने लगा । पर धीरे-धीरे सब ठीक हो गया। लेकिन एक रात ऐसी घटना घटी जिसने उसकी जिंदगी बदल के रख दी ।

      राहुल देर रात तक ऑफिस में काम करता रहा, काम में वह इतना मशगूल हो गया था कि उसे वक्त का अंदाजा ही नहीं रहा। उसने घड़ी देखी तो 12:00 बज चुके थे। उसने जल्दी में काम निपटा कर अपनी बैग उठाई और ऑफिस से बाहर निकला। 12:15 बजे वह लिफ्ट में दाखिल हुआ और ग्राउंड फ्लोर का बटन दबाया।

लिफ्ट धीरे-धीरे नीचे जा रही थी, लेकिन लिफ्ट एकाएक रुक गई। उसने चौंककर फ्लोर के नंबर्स की तरफ देखा, 13 बी मंजिल आ चुकी थी। राहुल के दिल की धड़कन रुक गई। राहूल को उस दिन की बात याद आ गई

'इस बिल्डिंग में तो तेरा नंबर का फ्लोर ही नहीं है '

वह इस डर से उभरा भी नहीं था कि तभी लिफ्ट के दरवाजे खुले, उसने खौफ भरी आंखों से बाहर देखा। पर तभी कुछ मजदूर अंदर आ गए। उनके कपड़े काफी मैले नजर आ रहे थे। आंखों पर सेफ्टी गोगल्स, सर पर पीले रंग का हेलमेट और कंधे पर लटकाए कुछ औजार। डरा सहमा राहुल एक कोने में खड़ा उनकी तरफ देख रहा था। पर उन्होंने एक बार भी राहुल की तरफ नहीं देखा। लेकिन इस बार उनकी बातचीत और ज्यादा डरावनी थी—

"बेचारा, वो मजदूर कल काम छोड़ने वाला था, लेकिन देखो ना, लिफ्ट टूटी और वो तेरहवें फ्लोर से सीधा नीचे गिर गया!"

"शायद उसका नंबर आया था !"

" हां, शायद। पता नहीं ये तेरहवीं मंजिल और कितने लोगों को मारने वाली है!"

तभी दूसरा मजदूर बोला, 

" आज भी 'फ्राइडे 13' है. पता नहीं आज किसका नंबर है.?"

उन मजदूरों की बात सुनकर राहुल के माथे पर पसीना आ गया। तभी लिफ्ट से कर्र कर्र ऐसी आवाज़ आने। लग रहा था जैसे लिफ्ट में कुछ खराबी है। राहुल के चेहरे पर मौत का खौफ साफ-साफ नजर आ रहा था। लिफ्ट धीरे-धीरे नीचे जा रही थी, लेकिन अचानक एक झटके से रुक गई। दरवाजा खुला, और मजदूर बाहर चले गए।

लिफ्ट की आवाज से डरा सहमा राहुल भी भागकर बाहर निकला और लिफ्ट का दरवाजा बंद हो गया। लिफ्ट के धीरे धीरे नीचे जाने की आवाज उस गहरे सन्नाटे में गूंजने लगी। राहुल ने आसपास नजर डाली लेकिन वहां कुछ नहीं था।

पूरा फ्लोर अंधेरे में डूबा हुआ था। उसने मोबाइल निकाल कर टॉर्च शुरू की पर बैटरी खत्म हो चुकी थी। 

"कोई है?" राहुल ने घबराकर आवाज लगाई।

कोई जवाब नहीं आया। 

" आज यह क्या हो रहा है मेरे साथ ?" 

तभी हल्की रोशनी में उसे नीचे जाती सीढ़ियां दिखाई दी। वह तेजी से सीढ़ियों की ओर भागा। तेज कदमों से वह सीढ़ियां उतरने लगा। एक, दो , तीन , चार पता नहीं वो लगातार सीढ़ियों से फ्लोर उतरता रहा। उसके कदम थक चुके थे, सांस फूल गई थी, शरिर पसीने से लथपथ था, दिल जोर जोर से धड़क रहा था। काफी सारे फ्लोर उतरने के बाद वह रूका, दीवार के सहारे खड़े राहुल ने सामने देखा और सन्न रह गया । वह फिर तेरहवें फ्लोर पर ही था ! 

" यह कैसे हो सकता है ?"

अब सीढ़ियां चढ़ते हुए वह ऊपर दौड़ने लगा। लेकिन फिर वहीं पहुँचा। वह दौड़ता रहा पर बार-बार तेरा नंबर के फ्लोर पर ही आकर ठहर जाता। ‌

उसका शरीर अब पूरी तरह से थक चुका था। अब ना सीढ़ियां चढ़ने की उसमें ताकत थी और ना ही उतरने की। उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। तभी उसे कुछ याद आया 

उस खाली बरामदे में चलने लगा। कई बार सीढ़ियां चढ़ने और उतरने की वजह से चलते हुए उसके पैर लड़खड़ा रहे थे। दीवार का सहारा लेकर वो आखिरी छोर तक पहुंचा। दूर से ही एक खिड़की नजर आने लगी। खिड़की के पास पहुंचकर देखा तो बाहर सिर्फ अंधेरा था। पूरा शहर अंधेरा और खामोशी में डूबा हुआ था। ना रोशनी थी ना कोई आवाज।

राहुल की साँसें तेज़ हो गई थीं। उसका दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था कि उसे लग रहा था जैसे यह सन्नाटा कहीं उसी की धड़कनों को सुनकर टूट न जाए। चारों ओर अंधेरा पसरा था। हल्की-हल्की ठंडी हवा उसके चेहरे को छू रही थी, मगर वह हवा नहीं थी—कुछ और था।

तेरहवीं मंज़िल। एक ऊँचाई, जहाँ से नीचे देखने पर दुनिया छोटी लगती है, लेकिन यहाँ राहुल को खुद ही बहुत छोटा और बेबस महसूस हो रहा था—एक तुच्छ प्राणी, जो किसी अज्ञात शक्ति के शिकंजे में फँस गया था।

उसने चारों ओर देखा। खालीपन। घुप्प अंधेरा। दूर कोने में एक टूटी हुई खिड़की से हल्का सा चाँदनी का टुकड़ा अंदर झाँक रहा था, मगर वह भी जैसे यहाँ आने से डर रहा था। राहुल ने अपनी कलाई पर बँधी घड़ी देखी । 12:15। समय रुका हुआ सा महसूस हो रहा था, जैसे इस मंज़िल पर आने के बाद दुनिया की हर घड़ी ने काम करना बंद कर दिया हो।

" कोई है...? प्लिज मदद करो"

उसने खुद से ही कहां, मगर उसके शब्द जैसे दीवारों से टकराकर लौट आए।

उसका गला सूखने लगा। और तभी,

ठक... ठक... ठक...



राहुल का खून जैसे जम गया। किसी चीज़ की धीमी-धीमी आहट... किसी के चलने की हल्की सी ध्वनि।

"कौन है वहाँ?"

उसकी आवाज़ काँप रही थी। पर जवाब में केवल सन्नाटा था। इतना गहरा सन्नाटा कि उसके कानों में हल्की सी सनसनाहट गूँजने लगी।

वह दीवार से सटकर खड़ा हो गया। दिल की धड़कनें असहनीय हो चली थीं। वह भागना चाहता था, मगर वो सीढ़ियां... जो बार बार उसे इसी फ्लोअर पर ले आती। अब तो जैसे कमरे का नक्शा बदल चुका था। या शायद उसका दिमाग़ धोखा खा रहा था।

राहुल को अचानक एक ठंडा अहसास हुआ—जैसे कोई अदृश्य साया उसके बहुत करीब खड़ा हो। उसने झटके से पीछे देखा। वहाँ कुछ नहीं था। लेकिन अब उसे यक़ीन हो गया था...उस जगह पर वह अकेला नहीं था।

 तभी अचानक, उसे अपने पीछे किसी के कदमों की आवाज आई।

राहुल ने घबराकर मुड़कर देखा।

कोई नहीं था।

लेकिन फिर... नीचे से ऊपर आती लिफ्ट की आवाज उस गहरे सन्नाटे में गूंजने लगी। राहुल तेजी से लिफ्ट की तरफ दौड़ने लगा। वह बुरी तरह से थक चुका था पर एक उम्मीद नजर आ रही थी, ऊपर आती वह लिफ्ट। वह लिफ्ट के पास पहुंचा और बटन दबाने लगा। लिफ्ट धीरे से आकर उस फ्लोर पर रुक गई। राहुल की आंखों में एक उम्मीद झलक उठी, जिंदा रहने की उम्मीद। 

लिफ्ट का दरवाजा खुलने लगा। पर जैसे ही राहुल भीतर जाता लिफ्ट के अंदर कोई खड़ा था। उसने गौर से देखा, चेहरा जाना-पहचाना लगा। 

'अरे ये तो वही है, जिसकी तस्वीर समोसा खाते वक्त एक अखबार के टुकड़े पर छपी देखी थी।'



 राहुल उसे कुछ पूछता पर वो आदमी काफी घबराया हुआ था। खौफ भरी आंखोंसे अपने आसपास देखने लगा । पसीने से लथपथ शरिर, कांपते हाथ। राहुल उसे कुछ बोलता तभी एकदम से उसने राहुल की तरफ देखा। उसके चेहरे का रंग बदल गया। चेहरा सफेद पड़ने लगा, उसपर अजिब सी हंसी छा गई, गहरी काली आँखो के भीतर गुस्सा नजर आने लगा!

उसके होंठ हिले, और आवाज राहुल के कानों में गूँजने लगी।

" आज फ्रायडे १३ है."

 और एक खौफनाक हंसी उसके चेहरे पर छा गई। 

लिफ्ट के दरवाजे धीरे-धीरे बंद होने लगे और घबराया राहुल लिफ्ट के बंद दरवाजे की तरफ ही देखता रहा । 13 वी मंजिल के उस घुप्प अंधेरे में राहुल बेबस होकर खड़ा रहा। तभी अंधेरे से एक शख्स की हल्की आवाज आने लगी। 

'13 नंबर आ गया है'

अगले दिन।

इन्स्पेक्टर साहब चुपचाप खड़े थे पीछे खडा हवलादर उसकी जानकारी लिख रहा था। मिली सारी जानकारी लिखने के बाद दोनों अस्पताल से बाहर निकले। 

इंस्पेक्टर सत्यजीत देशमुख ने हवलदार रफिक से चलते हुए कहां।

" क्या बकवास है, उसकी बात कैसे सच मानें ? ना उस दिन १३ तारिख थी ना फ्रायडे था। "

रफिक ने शांत आवाज में कहा।

" शायद इसलिए वो जिंदा बच गया। क्योंकी शुक्रवार तो कल है और तेरा तारिख भी। और शुक्रवार और 13 तारीख दोनों एक साथ साल में शायद एक या दो बार ही आते हैं"

" मतलब "

" साहब जी, वहां से कोई जिंदा बच गया, शायद यह हमारे पास आखरी मौका हो, इस चक्रव्यूह को रोकने का ?"



" वो कैसे।"



" साहब, आज तक उस बिल्डिंग में जितने हादसे हुए वो 'फ्रायडे १३' को ही हुए, पर राहुल के साथ सोमवार को हुआ, वो आज , मतलब गुरुवार को होश में आकर बताता है की , वो शुक्रवार १३ को वहां फंस गया था। पर शुक्रवार १३ तो कल है, इसका मतलब जो होने वाला है, या तो उस बिल्डिंग में होगा , या फिर राहुल के साथ, इस जगह पर।"



" रफिक, जरा आहिस्ता बोल, अगर किसी मिडिया के आदमी ने हमारी यह बात सुन ली तो तेरे साथ मेरी भी लग जायेगी।"

और दोनों पुलिस व्हॅन से पुलिस स्टेशन की तरफ जाने लगे।



*****



प्रेझेंंट डे।



उस पुलिस व्हॅन की पिछली सीट पर बैठे रफिक ने कहा।

" सर आज आप ने सैंकडो जाने बचाई, कल अपने बिल्डिंग के ओनर से एक दिन पुलिस ड्रिल के लिए बिल्डिंग पुलिस के कंट्रोल में लेकर वहां के सभी कर्मचारियों को छुट्टी देने को कहा और देखीये। आज इतना बड़ा हादसा हो गया। शॉर्ट सर्किट से देखते ही देखते आग की लपटों ने पुरी बिल्डिंग को अपनी चपेट में ले लीया है। और वो भी उस वक्त, जब मौके पर पहले से ही फायरब्रिगेड की गाड़ी के होते हुए।"



रफिक एक एक बात बता रहा था , पर इंस्पेक्टर साहब यह सोच कर सन्न रह गए थे.

'अगर कल मैं राहुल और रफिक की बात को नजरंदाज करता तो उस बिल्डिंग में आज कितनी लाशों का ढेर लगता।'

और सायरन बजाते हुए वो उस धूं धूं कर जल रही बिल्डिंग के सामने पहुंच गए।



Story by Sanjay Kamble.



समाप्त