लबूबू डॉल
रात के अंधेरे में भी उस बहुत बड़े निर्माण का काम जोरों शोरों से शुरू था। उस कन्स्ट्रक्शन साईट पर खडे ट्रक से काफी सारे पत्थरों को डंप किया जा रहा था... सारे पत्थर डंप हो जाने के बाद वह ट्रक उस जगाह से जाने के लिए निकला और उसकी जगह दुसरा भरा हुआ ट्रक आ गया... वो खाली ट्रक तेजी से सडक पर दौड़ने लगा।
रात के समय आसमान पर बादलों की हल्की परत चाँदनी को ढक रही थी। सुनसान सड़क पर सिर्फ स्ट्रीट लाइट्स की झिलमिलाती रोशनी और बीच-बीच में बहती ठंडी हवा के झोंके थे। रात के अंधेरे में ट्रक की हेडलाइट अंधेरे को चीरते हुए सड़क को रोशन कर रही थी। सड़क पर आवाजाही कम थी। लेकिन तभी सामने से एक काले रंग की कार आने लगी और तेजी से पास हो गई। उसी वीरान सड़क पर काले रंग की एक कार धीमी रफ्तार से चल रही थी।
कार की ड्राइविंग सीट पर बैठी औरत का चेहरा तनाव से भरा हुआ था, लेकिन आँखों में अजीब-सी चमक थी। उसकी बगल वाली सीट पर एक लबूबू डॉल रखी थी—एक अजीब, डरावनी शक्ल वाली गुड़िया, जिसकी बड़ी-बड़ी आँखें मानो अंधेरे में भी चमक रही हों। किसी खूंखार जानवर की तरह।
औरत बीच-बीच में डॉल की तरफ देखती और ठंडी हँसी हँस देती।
सामने खाली सड़क पर नज़रें गड़ाए उसने धीमी लेकिन गुस्सेल आवाज़ में कहा
" मनहूस गुड़िया… तुम्हें लगता है तुम मुझे भी खत्म कर दोगी..? लेकिन तुम गलत समझ रही हो। मुझे पता है, तुम्हें खत्म करना इतना आसान नहीं है। पर मैं तुम्हें ऐसी जगह पहुँचा दूँगी… जहां से तुम कभी वापस नहीं आ सकोगी।”
उसके शब्दों में हिकारत और डर का मिला-जुला स्वाद था।
कुछ दूर जाते ही सड़क पर बने गड्ढों से थोड़ा आगे जाकर उसने अपनी कार सड़क किनारे रोक दी। आसपास का इलाका पूरी तरह वीरान था। कार से उतरकर वो सड़क को देखने लगी जैसे किसी का इंतजार कर रही हो। कुछ देर उसकी निगाहें खाली सड़क पर टिकी रही। अचानक सड़क से एक पुराना ट्रक आता दिखा, जिसमें काफी सारे पत्थर भरे हुए थे।
औरत ने पीछे मुड़कर देखा, फिर तेजी से लबूबू डॉल को उठाया। डॉल की आँखें ऐसे चमकीं मानो वह ज़िंदा हो। एक पल के लिए औरत का दिल जोर से धड़क उठा, पर उसने हिम्मत जुटाकर हाथ में पकड़ी लबूबू डॉल की तरफ देखकर कहां।
" अब तु ऐसी जगह दफन हो जाएगी जहां से कोई भी ताकत तुझे बाहर नहीं निकाल सकती।"
तभी वह पत्थरों से भरे ट्रक की रफ्तार गड्ढों की वजह से धीमी हो गई। इसी बात का फायदा उठाकर उस औरत ने हाथ में पकड़ी लबूबू डॉल को ट्रक के पीछले हिस्से में फेंक दिया।
गुड़िया जब ट्रक के अंदर गिरी तो हल्की-सी 'ठक…' की आवाज़ आई, जैसे किसी धातु की चीज़ ने टकराकर अजीब गूंज पैदा की हो। औरत ने गहरी साँस ली और बड़बड़ाई—
“अब देखती हूँ… तू कैसे वापस आती है।”
वह अपनी कार की ओर लौटी और बैठते हुए राहत की सांस ली। कार का इंजन चालू किया और धीरे-धीरे यू-टर्न लेने लगी।
लेकिन तभी पीछे से आती एक बड़ी सी ट्रक ने तेज़ी से उसकी कार को टक्कर मार दी। टक्कर इतनी जोरदार थी कि कार हवा में उछली और ज़मीन से टकराते ही भयानक आवाज़ के साथ धमाका हो गया। आग की लपटें रात के अंधेरे को चीरते हुए ऊपर उठीं। चारों तरफ धुएँ और बारूद की गंध फैल गई। सड़क वीरान थी, लेकिन उस धमाके की गूँज बहुत दूर तक सुनाई दी। आग की रोशनी में, ट्रक में फेंकी गई लबूबू डॉल की परछाईं झलक रही थी। वह हिल नहीं रही थी, लेकिन उसकी आँखें अब और ज्यादा चमकदार दिख रही थीं—जैसे इस हादसे का मज़ा ले रही हों। और तभी जंगल में एक उड़ते बाज के पंजों से मरा हुआ सांप उस ट्रक में डॉल के उपर गिरा। जिसे उठाने के लिए बाज ट्रक की तरफ तेजी से उड़ने लगा।
*****
कुछ दिन बाद।
रात के लगभग ग्यारह बज रहे थे ।
दिल्ली से आगरा जाने वाली सड़क पर दूर-दूर तक फैली काली चुप्पी और झमाझम बरसते बादलों की तडतडाती आवाज़ गाड़ी के भीतर तक घुस रही थी। विंडशील्ड पर बारिश की बूँदें टकराकर ऐसे बह रही थीं जैसे कोई अदृश्य हाथ शीशे पर नाखून घसीट रहा हो।
गाड़ी की हेडलाइट्स सामने की सड़क को तो रौशन कर देतीं, लेकिन गाड़ी के पीछे घना अंधेरा जैसे दौड़ते हुए सब कुछ निगलने की फिराक में था ।
मानो किसी गहरे काले समंदर में तैरती एक छोटी-सी नाव को समंदर की ऊंची लहरें निगलना चाहती हो।
सड़क के दोनों ओर घने जंगल में हवा के झोंको से हिलाने वाले भीगे हुए टेढ़े-मेढ़े आकारों में खड़े पेड अंधेरे में किसी डरावनी चुड़ैल की तरह नजर आ रहे थे।
कहीं झाड़ियों से अचानक सरसराहट सुनाई देती, तो कहीं ऊपर डालियों पर बैठे उल्लू की टेढ़ी निगाहें गाड़ी की हेडलाइट पर पड़ते ही चमक उठतीं।
एक पल के लिए श्रुति को लगा मानो उन उल्लू की चमकती आँखें उसका ही पीछा कर रही हों। माहौल को थोडा हल्का बनाने के लिए उसने रेडियो ऑन कर दिया, लेकिन शोर के अलावा कुछ नहीं था ।
बारिश और अंधेरे की संगत में वह अकेली ड्राइव कर रही थी।
श्रुति बेहद खूबसूरत, हंसमुख थी। आगरा के ऑफिस में उसकी हंसी और मस्ती से सब उसे “दिल्ली की गुड़िया” कहते थे।
लेकिन एक राज़ था, जिसे बहुत कम लोग जानते थे।
श्रुति के दिल में बसा डर। उसे अंधेरे से बहुत डर लगता था।
बचपन की एक घटना ने उसके दिल में यह डर हमेशा के लिए बसा दिया था।
और आज, अकेली रात में यह सफ़र उसके लिए किसी परीक्षा से कम नहीं था। कल सुबह ग्यारह बजे तक उसे क्लायंट के सामने प्रेजेंटेशन की फाईल तैयार रखनी थी।
गाड़ी जैसे-जैसे जंगल के भीतर बढ़ती गई, माहौल और घना होता गया। बारिश की बूँदें अब काँच पर इतनी तेज़ थपथपा रही थीं कि वाइपर भी उनका शोर दबा नहीं पा रहे थे।
श्रुति ने एक लंबी साँस ली और खुद से बुदबुदाई —
“बस थोड़ी देर की बात है, ऑफिस पहुँचकर चैन से थोड़ा आराम करूंगी।”
गाड़ी ने एक तिखा मोड़ लिया और उसकी नज़र सड़क किनारे पड़ी।
गहरे अंधेरे और बारिश के बीच, हेडलाइट्स की पीली रोशनी में सड़क किनारे कुछ दूर एक छोटी-सी लड़की खड़ी नजर आई। श्रुति की नजरे उस पर ही टिक गई।
सिर्फ़ सात-आठ साल की होगी।
उसके बाल भीगकर चेहरे पर चिपक गए थे।
सफ़ेद फ्रॉक पूरी तरह भीगी हुई थी और हाथ में कुछ पकड रखा था।
श्रुति का दिल एकदम से जोर से धड़कने लगा।
“ये बच्ची यहाँ… इस सुनसान सड़क पर… आधी रात को?”
उसने गाड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ाई।
पल भर को सोचा कि रोककर पूछे — लेकिन मन में एक अजीब-सी घबराहट उठी।
गाड़ी थोड़ी दूर निकल गई, लेकिन दिल ने कहा — नहीं, कुछ गड़बड़ है।
उसने ब्रेक दबाए और गाड़ी पीछे ली।
पर जब उसने खिड़की से बाहर झाँका —
वहाँ कोई लड़की नहीं थी।
वह हैरान हो गई।
" कहा गई। अभी तो यहीं थी…”
उसने हिम्मत जुटाकर गाड़ी रोक दी और नीचे उतरी।
बारिश तुरंत उसके बालों और कपड़ों को भिगो गई।
उसने इधर-उधर नज़र दौड़ाई — सड़क खाली।
जंगल से बस सरसराहट और ठंडी हवा की आवाज़ आ रही थी।
तभी उसकी नज़र सड़क के किनारे जमीन पर गई।
वहाँ, कीचड़ में एक गुड़िया पड़ी थी।
गुड़िया का चेहरा अजीब-सा था।
आँखें बड़ी-बड़ी, मानो अभी झपकेंगी।
लाल होंठ, लेकिन मुस्कान में कुछ खौफ़नाक।
उसके कपड़े फटे हुए, लेकिन चेहरा साफ़ — जैसे किसी ने जानबूझकर उसे यहाँ रखा हो।
श्रुति का दिल काँप गया।
उसने तुरंत गाड़ी का दरवाज़ा बंद किया और तेज़ी से ड्राइव करने लगी।
गाड़ी के भीतर का माहौल और डरावना हो गया था।
श्रुति ने रेडियो फिर से ऑन किया — इस बार बीच-बीच में कोई पुराना गाना बजा और अचानक आवाज़ कट गई।
खामोशी में अचानक उसे कुछ सुनाई दिया।
एक हल्की-सी हँसी।
पहले लगा जैसे वहम है।
लेकिन हँसी धीरे-धीरे साफ़ होती गई।
एक बच्ची की खिलखिलाती हँसी…
गाड़ी के बिल्कुल अंदर से आती हुई।
श्रुति ने काँपते हाथों से रियर-व्यू मिरर ठीक करते हुए देखा।
सड़क खाली थी।
पीछे की सीट पर भी कोई नहीं था।
लेकिन हँसी अब भी गूँज रही थी।
उसका शरीर ठंडा पड़ गया।
उसने गाड़ी की स्पीड और बढ़ा दी। बारिश को चिरते हुए गाड़ी तेजी से आगे बढ़ने लगी , लेकिन दिल की धड़कन अब उसे महसूस होने लगी।
बारिश और अंधेरा मिलकर हर चीज़ को और भयानक बना रहे थे।
श्रुति की आँखें सड़क पर टिकी थीं, तभी उसने देखा की बीच सड़क में वही लड़की खड़ी थी।
इस बार और साफ़।
उसकी आँखें सीधी हेडलाइट में चमक रही थीं किसी बिल्ली की तरह। और एक हाथ से गर्दन पकडी वही गुड़िया।
चेहरे पर अजीब-सी मुस्कान।
श्रुति ने कांपते हुए ब्रेक दबा दिए । पानी से भरी सड़क पर गाड़ी के पहियें कुछ दूर फिसलते हुए थम गए। सब कुछ एकदम से शांत हो गया। आवाज आ रही थी तो बारिश की तड़कती बुंदों की। सरसराते पेड़ों के पत्तों की।
श्रुति की कार सड़क के बीचों बीच टेढ़ी होकर खड़ी थी
उसकी की हिम्मत जवाब दे रही थी, लेकिन उसने धीरे-धीरे दरवाज़ा खोला और बाहर कदम रखा।
बारिश अब और तेज़ हो चुकी थी।
वह काँपते हुए गाड़ी के सामने पहुँची।
लेकिन लड़की गायब थी।
सड़क पर सिर्फ़… वही गुड़िया पड़ी थी।
भीगी हुई, लेकिन उसकी आँखें अब भी खुली थीं। श्रुति ने घबराकर गाड़ी में बैठ गई और दरवाज़ा बंद करते हुए एक झटके में इंजन स्टार्ट कर दिया।
उसका दिल जोर से धड़क रहा था।
सिर्फ़ एक ही खयाल —
“यहाँ से निकलना है। जितनी जल्दी हो सके…”
श्रुति ने पूरी ताक़त से एक्सेलरेटर दबाया। गाड़ी चीखती हुई उस सुनसान सड़क को पीछे छोड़ती जाने लगी।
बारिश की धारों को चीरती उसकी गाड़ी अंधेरे जंगल से निकलने लगी।
दिल में डर ने इस तरह जगह बना ली थी के साँस लेना भी मुश्किल लग रहा था।
गाड़ी के भीतर अब भी एक अजीब सी गंध तैर रही थी — जैसे गीले कपड़े और मिट्टी में कुछ सड़ रहा हो।
श्रुति ने बार-बार शीशे में झाँका, लेकिन हर बार उसे खालीपन मिला।
लेकिन उसे ऐसा लग रहा था मानो कोई उसकी गर्दन के पीछे से घूर रहा हो।
करीब आधा घंटा और चलने के बाद सामने इमारतों की रोशनी दिखाई दी।
आगरा का ऑफिस इलाका देखते ही श्रुति ने चैन की साँस ली, लेकिन हाथ अब भी काँप रहे थे।
ऑफिस पहुँची तो गार्ड ने उसे देखकर पूछा
“मैडम, सब ठीक है? चेहरा इतना उतरा हुआ क्यों है?”
श्रुति ने जबरन मुस्कान बनाई,
“कुछ नहीं… बारिश की वजह से थोड़ी परेशानी हुई ।”
लेकिन अंदर से वह जानती थी कि यह सिर्फ़ डर नहीं था।
यह कुछ और था। कुछ ऐसा जो तर्क से परे था।
वह पूरी रात फाइलों और काम में लगी रही, लेकिन बीच-बीच में उसे वही खिलखिलाती हँसी सुनाई देती।
कभी लगता, खिड़की के शीशे पर कोई परछाई झलकी।
कभी उसकी आँखें बंद होते ही वही भीगी गुड़िया दिखाई देती।
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दो हफ्ते या महिने में एक बार उन्हें प्रेजेंटेशन के लिए आगरा आना पड़ता था। सुबह हुई तो सहकर्मी मजाक कर रहे थे, चाय पी रहे थे।
लेकिन श्रुति के लिए रात के वे दृश्य उसके भीतर जहर की तरह घूल गए थे।
वह तय कर चुकी थी। वापस उसी सड़क से गाड़ी नहीं ले जाएगी।
प्रेजेंटेशन के बाद सब बातों में मशगूल थे पर श्रुति अब भी रात की उस अजीब घटना से परेशान थी। उसे इस तरह परेशान देख किसी ने पूछा।
" अरे मॅडम, क्या हुआ। आप काफी परेशान लग रही हो। "
ऑफिस के दोस्त की आवाज सुनकर उसने धीमे स्वर में कहा
" हां तबियत कुछ ठीक नहीं। "
" अरे तो आराम करीए ना। वैसे भी प्रेजेंटेशन पुरा हो चुका है। "
सभी ने श्रुति को घर जाकर आराम करने की सलाह दी। पर श्रुति चाह कर भी कल रात की वह बात किसी को बता नहीं सकी।
श्रुति जाने के लिए निकली। पार्किंग में खड़ी कार में बैठ कर उसने चाबी लगाई पर गाड़ी स्टार्ट ही नहीं हो रही थी। काफी देर कोशिश की पर कोई फायदा नहीं। ऑफिस के दोस्तों ने भी कोशिश पर कोई भी गाड़ी स्टार्ट नहीं कर पाया। दोपहर के तीन बज चुके थे। श्रुति को रात तक यहां रूकना मंजूर नहीं था।
श्रुति ने अपने ऑफिस के दोस्त से कहा।
श्रुति : संजय, क्या तुम किसी मैकॅनिक को बुलाकर कार ठीक करा लोगे ?
संजय : हां, जरूर। वैसे भी मुझे वापस आने में काफी वक्त है।
श्रुति: और एक मदत करोगे ?
संजय: हां बोलो ना।
श्रुति : तुम बाईक से आए हो ?
संजय : अरे नहीं। बस से आया हूं। बारिश की वजह से बाईक नहीं लाया।
श्रुति: अगर गाड़ी ठीक हो गई तो तुम मेरी कार ले आ सकोगे..?
संजय : हां ज़रूर। फिक्र मत करो।
श्रुति अब भी कुछ परेशान थी।
संजय : क्या हुआ। तुम कुछ ज्यादा ही परेशान लग रही हो। कोई प्रॉब्लम है क्या ?
श्रुति : कुछ नहीं। कल बात करेंगे।
इतना कह कर श्रुति ने संजय के हाथ में गाड़ी की चाबी दी और जल्दबाजी में पार्किंग से बाहर निकलते हुए टैक्सी से बस स्टैंड के लिए निकली । श्रुति का यह व्यवहार संजय को काफी अजीब लगा। पहली बार उसने श्रुति को इस तरह परेशान देखा था।
दिन का उजाला था।
वही सड़क थी, वही झमाझम बारिश थी, लेकिन अब उजाला था, लोग थे, गाड़ियाँ थीं। श्रुति बस की आधी खुली खिड़की से बाहर झाँक रही थी।
झाड़ियों में सरसराहट अब साधारण लग रही थी।
पेड़ों पर बैठे पक्षी भी अब सामान्य दिख रहे थे।
लेकिन मन में अजीब सी हलचल बनी रही।
वह हर मोड़ पर नज़र डालती —
'कहीं वही लड़की या वह गुड़िया न दिख जाए…'
उसके दिल की धड़कन तेज़ हुई जब उनकी बस उस जगह पहुँची जहाँ पिछली रात गाड़ी रोकी थी।
उसने खिड़की से झाँका।
सड़क किनारे कीचड़ था।
वहाँ कोई लड़की , कोई गुड़िया नहीं थी।
उसने लंबी साँस छोड़ी।
“शायद सब वहम था…”
लेकिन भीतर का डर अब भी बना रहा।
घर पहुँचकर उसने खुद को कामों में व्यस्त रखने की कोशिश की।
लेकिन हर चीज़ उसे रात की याद दिला रही थी।
अंधेरे कोनों में जैसे वही खिलखिलाती हँसी गूँज रही हो।
आईने में कभी-कभी उसे अपना चेहरा नहीं, बल्कि किसी और की मुस्कान झलकती दिखती।
रात दस बजे होंगे । बिजली गुल थी इसलिए मोमबत्ती की हल्की लौ कमरे को रौशन कर रही थी। थक हार कर वह अपने सोफे पर लेट गई। दिन भर की भगदौड़ और नींद पूरी न होने की वजह से आंखें पर नींद का असर नजर आ रहा था। आंखें बंद करके वह सोफे पर वैसे ही पड़ी रही। तभी दरवाजे पर हुई दस्तक से उसकी आंख खुली। उसने समय देखा तो 10:00 बज चुके। उसने जाकर दरवाजा खोला तो बाहर कोई नहीं था। बाहर झांककर देखा तो अंधेरे में डूबा पूरा बरामदा काफी डरावना नजर आ रहा था। उसे कुछ अजीब लग रहा था। बगैर कुछ सोचे उसने दरवाजा बंद किया। और पीछे मुडी ही थी के तभी वह डरावनी गुड़िया एकदम से उसके ऊपर झपटी और श्रुति की नींद खुल गई। वह अब भी अपने सोफे पर ही थी। दो पल में उसने एक बेहद डरावना सपना देखा था। लेकिन दरवाजे पर दस्तक तो अब भी हो रही थी। श्रुति के पैरों के नीचे से जमीन खिसक गई क्योंकि कुछ पल पहले उसने जो सपना देखा था उसमें भी दरवाजे पर दस्तक हो रही थी। लेकिन जब दरवाजा खोला तो कोई नहीं था और अब असल में दरवाजे पर दस्तक हो रही थी और अब उसे दरवाजा खोलने में भी डर लग रहा था। तभी उसे एक जानी पहचानी आवाज सुनाई दी।
" हैलो, श्रुति। दरवाजा खोलो। "
उसने पहचान लिया यह तो संजय की आवाज थी। फिर भी घबराते हुए उसने दरवाजा खोला। बाहर सचमुच संजय खड़ा था , गाड़ी की चाबी लेकर।
श्रुति का परेशान चेहरा देखकर संजय ने पूछा।
संजय: अरे, तुम इतनी परेशान क्यो हो ? क्या बात है ?
*****
कॉफी पीते हुए श्रुति ने सारी बातें संजय को बता दी। संजय भी पुरी गंभीरता से उसकी बात सुन रहा था ।
संजय: तो यह सब उस लड़की की वजह से हो रहा है जिसके हाथ में गुड़िया थी जिसका नाम लबूबू डॉल है।
श्रुति : लबुबू डॉल ?
संजय : हां। वह एक शापित गुड़िया है। जिसके अंदर छिपी शैतानी रुह अपने शिकार का पीछा तब तक नहीं छोड़ती जब तक शिकार को खत्म नहीं कर देती।
श्रुति : तुम्हें कैसे पता ?
संजय : न्युज में देखा था, काफी खतरनाक है वह डॉल।
कहते हुए संजय ने खाली चाय का कप सामने टिपाई पर रख दिया। श्रुति ने वह कप उठाई और किचन में जाते हुए कहां
श्रुति : बिल्कुल सही कहा तुमने। इस वजह से मैं रात तक नहीं रुकना चाहती थी। और आगे भी कभी रात के समय उस सड़क से नहीं जाने वाली। कम से कम अकेली तो।
तभी मोबाइल की रिंग बाज उठी। वाश बेसिन का नल शुरू करते हुए उसने कानों में लगे ब्लूटूथ से फोन रिसीव किया। और कप वॉश बेसिन में साफ करते हुए बात करने लगी.
श्रुति : हैलो।
व्यक्ति : हैलो श्रुति गाड़ी ठीक हो गई है । मैं गाड़ी लेकर सीधे घर चला जाता हूं। क्योंकि मुझे आने में रात के ढाई तीन बच सकते हैं। बाय और अपना ख्याल रखना।
वह आवाज सुनकर श्रुति के हाथ से कप फिसल कर वॉश बेसिन में गिर कर टूट गया। उसका शरिर कांपने लगा। कोने में जलती मोमबत्ती की लौ फड़फड़ाने लगी। तभी उसकी कानों पर एक छोटी बच्ची के हंसने की आवाज पड़ी। पीछे देखने की हिम्मत नहीं हो रही थी। घबराते हुए उसने पीछे देखा तो पीछे सोफे पर संजय नहीं था। बल्कि कमरे में फैली मोमबत्ती की मटमैली रोशनी में वही लबूबू डॉल दिखाई दी।
Story by sanjay kamble
समाप्त।