Invisible Drink - 17 in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | अदृश्य पीया - 17

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अदृश्य पीया - 17

(रात का समय। हवेली के बाहर सन्नाटा। अंदर बच्चों के कमरे में हल्की-सी रोशनी।)

कुछ रातें नींद नहीं लातीं… सुकून लाती हैं।
और इस हवेली में हर रात अब किसी के आने का वक़्त तय था।

(सुनीति और कौशिक धीरे-धीरे कमरे में आते हैं। उनके कदमों की कोई आवाज़ नहीं।)

सुनीति(मुस्कुराकर) बोली - 
“देखिए…आज भी कितनी शांति से सो रहे हैं।”

कौशिक बोला - 
“शायद इन्हें महसूस होता है कि कोई है… जो इन्हें छोड़कर नहीं जाएगा।”

(सुनीति आरुषि के सिरहाने बैठती है। हल्के से उसके बालों में उँगलियाँ फेरती है।)

वो हाथ दिखते नहीं थे…पर उनकी गर्माहट बिल्कुल माँ जैसी थी।

(आरुषि नींद में करवट बदलती है, होंठों पर हल्की मुस्कान।)

(कौशिक आरव के पास बैठता है। उसकी पीठ थपथपाता है।)

कोशिश (धीरे से) बोला - 
“सो जा, शेर…मैं यहीं हूँ।”

(आरव नींद में बुदबुदाता है।)

आरव (नींद में) बोला - 
“पापा…”

बच्चों को कभी ये जानने की ज़रूरत नहीं पड़ी कि हाथ किसके हैं।
उन्हें बस इतना पता था—
मम्मी-पापा पास हैं।

(आरुषि अचानक हल्की-सी आँख खोलती है, फिर बंद कर लेती है।)

आरुषि (नींद में) बोली - 
“मम्मी…आप यहीं रहना…”

(वो आँखें पूरी तरह नहीं खोलती।)

सुनीति(आँखें भरकर) बोली - 
“हाँ बेटा…हम यहीं हैं।”

कौशिक बोला - 
“देखा…ये हमें देखते भी नहीं।”

सुनीति बोली - 
“क्योंकि प्यार देखने की चीज़ नहीं होती।”

हर रात—
कभी सुनीति लोरी गुनगुनाती, कभी कौशिक थपकी देता। बच्चे चैन से सोते।
और इस तरह हर रात दो अदृश्य लोग चार ज़िंदगियों की नींद संभालने लगे।

(कमरा शांत। बच्चों की साँसें नियमित।)

सुनीति(धीरे से कौशिक से) बोली - 
“काश… ये पल हमेशा ऐसे ही रहें।”

कौशिक बोला - 
“अगर हमें दिखना नसीब नहीं… तो भी ये सुकून काफ़ी है।”

बच्चों के सिरहाने दो अदृश्य परछाइयाँ बैठी हैं।
कुछ माता-पिता कभी सामने नहीं आते… पर उनकी ममता
हर रात बच्चों को गहरी नींद सुला देती है।

(शाम का समय। हवेली की पुरानी सीढ़ियाँ। आरुषि हाथ में किताब लिए उतर रही है।)

कुछ सच्चाइयाँ धीरे-धीरे सामने आती हैं… और कुछ एक पल में।

(आरुषि दूर की चीज़ देखने के लिए आँखें सिकोड़ती है। पैर फिसलता है।)

आरुषि चिल्लई —
“आ…!”

(आरुषि गिरने ही वाली होती है कि अचानक—
कौशिक तेज़ी से आगे बढ़ता है। अदृश्य हाथ उसे थाम लेता है।)
(आरुषि सीढ़ियों पर नहीं गिरती, सीधा खड़ी रह जाती है।)

आरुषि (घबराकर) बोली - 
“मैं…मैं गिरी कैसे नहीं?”

(वो चारों ओर देखती है। कोई नहीं।)

आरुषि (अपने आप से) बोली थी 
“मम्मी थीं क्या?
नहीं…मम्मी तो नीचे थीं…”

(वो अपना हाथ देखती है, जैसे किसी ने पकड़ा हो।)
(राधिका भागती हुई आती है।)

राधिका (घबराकर) बोली - 
“आरुषि! गिरी तो नहीं?”

आरुषि बोली - 
“नहीं मम्मी… मैं गिरने वाली थी…
पर…पता नहीं कैसे बच गई।”

(राधिका उसे ध्यान से देखती है।)

राधिका बोली - 
“तुम सीढ़ियों पर ध्यान क्यों नहीं देती?
ठीक से दिखता नहीं है क्या?”

(आरुषि सिर झुका लेती है।)

आरुषि (धीरे से) बोली - 
“मम्मी…मुझे दूर की चीज़ें ठीक से नहीं दिखतीं…”

(राधिका चौंक जाती है।)
(पास ही अदृश्य खड़े सुनीति और कौशिक।)

सुनीति (घबराकर) बोली - 
“कौशिक जी…इस बच्ची को सच में दिक्कत है।”

कौशिक बोला - 
“और आज अगर हम नहीं होते…”

(वो बात अधूरी छोड़ देता है।)

अस्पताल। डॉक्टर आँखों की जाँच कर रहा है।)
“विटामिन की कमी है। और दूर का नंबर भी आया है। चश्मा लगाना पड़ेगा।”
(राधिका की आँखों में अपराधबोध।)
(आरुषि नई फ्रेम वाला चश्मा पहनती है। दूर की दीवार साफ दिखती है।)

आरुषि (खुश होकर) बोली - 
“मम्मी! अब सब साफ दिख रहा है!”

(राधिका मुस्कुराती है, लेकिन दिल भारी है।)
(सुनीति और कौशिक थोड़ी दूरी पर खड़े देखते हैं।)

सुनीति (हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
“आज भी इसे बचा लिया…”

कौशिक बोला - 
“पर सुनीति… आज पहली बार ये सवाल उठा है कि इसे बचाया किसने।”

(घर लौटते समय आरुषि खिड़की से बाहर देखती है।)

आरुषि (धीमे से) बोली - 
“आज…किसी ने मुझे पकड़ा था…”

(वो अपने चश्मे को छूती है।)

शायद चश्मा सिर्फ़ नज़र नहीं बदलता… शायद वो सच्चाई के दरवाज़े भी खोल देता है।

(दोपहर का समय।नहवेली में हल्की धूप फैली है।)
(आरुषि नया चश्मा लगाए पूरे घर में घूम रही है। वो दीवारों, तस्वीरों, खिड़कियों को ध्यान से देखती है।)

चश्मा लगते ही सिर्फ़ नज़र साफ़ नहीं हुई थी… दुनिया भी बदल गई थी।

(आरुषि हॉल में आती है। वहीं सामने कौशिक खड़ा है।)

आरुषि(अचानक रुककर, घबराई हुई) बोली - 
“अ… अंकल…आप कौन हो?”

(कौशिक के चेहरे का रंग उड़ जाता है।)

कौशिक (हक्का-बक्का, धीमे से) बोला - 
“सुनीति…ये…ये मुझे देख पा रही है!”

(उसी पल सुनीति भी पास आ जाती है।)

आरुषि (अब सुनीति की तरफ देखकर) बोली - 
“और आप…आंटी आप कौन हो?”

(सुनीति और कौशिक एक-दूसरे को बड़ी-बड़ी आँखों से देखते हैं।)

सुनीति (संभलकर, हल्की मुस्कान के साथ) बोली - 
“बेटा…तुम हमें देख सकती हो?”

आरुषि(मासूमियत से) बोली - 
“हाँ! क्यों नहीं देख सकती?
आप क्या…भूत हो?”

(एक पल की चुप्पी।)

(अचानक—
सुनीति और कौशिक दोनों हँस पड़ते हैं।)

कौशिक (मजाक में, छाती तानकर) बोला - 
“इतना हैंडसम लड़का तुम्हें भूत लगता है?”

आरुषि(हँसते हुए, सिर हिलाकर) बोली - 
“नहीं! आप दोनों तो बहुत क्यूट हो।”

(वो सुनीति को ध्यान से देखती है।)

आरुषि बोली - 
“आंटी तो बिल्कुल परी जैसी हैं।”

(सुनीति की आँखें भर आती हैं।)

सुनीति (झुककर, प्यार से) बोली - 
“डर नहीं लगा तुम्हें?”

आरुषि बोली - 
“नहीं…आप लोग बुरे नहीं हो।
आप तो… हमेशा रात को हमें सुलाते हो ना?”

(कौशिक और सुनीति एक-दूसरे को देखते हैं अविश्वास और भावुकता साथ-साथ।)

कौशिक(धीमे स्वर में) बोला - 
“तो तुम्हें पता था…कि कोई है?”

आरुषि बोली - 
“हाँ…पर मुझे लगा मम्मी-पापा हैं।”

(वो मुस्कुराती है।)

जिस सच्चाई से बड़े डर जाते हैं…बच्चे उसे अपनाने में एक पल भी नहीं लगाते।

(आरुषि सुनीति का हाथ पकड़ लेती है, उसे सिर्फ़ वो महसूस नहीं करती, वो उसे देख भी पा रही है।)

आरुषि बोली - 
“आंटी…आप यहीं रहोगे ना?”

(सुनीति कुछ बोल नहीं पाती। सिर्फ़ सिर हिलाती है।)

कौशिक (धीरे से) बोलीं - 
“लगता है सुनीति…अब हमारी दुनिया पूरी तरह छुपी नहीं रही।”

जिस चश्मे से दुनिया साफ़ दिखने लगी थी… उसी चश्मे ने अदृश्य प्यार को नाम दे दिया था।