वर्शाली सरमाते हूए एकांश से कहती है--
> एकांश जी ! मैं भी आपसे बहुत प्रेम करती हूं । मेरा सब कुछ आपका है। मैं भी आपके बिना नही रह सकती एकांश जी।
इतना बोलकर वर्षाली एकांश से लिपट जाती है। और फिर मायूस होकर कहती है--
> ये तु क्या कर रही है वर्शाली । तु यहां किस कार्य से आयी है और तु क्या कर रही है। एक मनुष्य से तु प्रेम कैसे कर सकती है। तु ये कैसे भूल गयी के तु एक परी है और एकांश एक मनुष्य ! तुम दौनो का मिलन कभी नही हो सकता। अपने आप पर धेर्य रख और अपनी बहन के जिवन के बारे मे सौच। एकांश केवल एक मार्ग है तेरे लिए बस ! जिससे तु हर्शाली को वापस ला सकती है। तुम्हे सिर्फ अपना कार्य करवाना है और अपनी बहन को लेकर यहां से अपने लौक को चला जाना है।
वर्शाली ये सब सौच ही रही थी की वर्षाली एकांश के चेहरे की तरफ दैखती है। एकांश बड़ी चैन से सो रहा था। जिससे उसका चैहरा बहुत प्यारा और मासूम दिख रहा था। वर्षाली एकांश को एक टक नजर से दैखती रह जाती है। वर्षाली बहुत मायूस हो जाती है और उसके आंख से आंसु निकल पड़ती है।
वर्षाली कहती है।
> मुझे क्षमा करना एकांश जी ! मैं आपका बस उपयोग कर रही हुँ केवल अपने कार्य को पुरा करने के लिए । पर ऐसा करते - करते मैं कब आपसे प्रेम कर बैठी ये मुझे पता ही नही चला। मैं भी आपसे उतना ही प्रेम करती हूं एकांश जी जितना की आप मुझसे करते हो। मैं भी आपके बिना नही रह सकती।
वर्शाली कुछ दैर एकांश की और दैखती है और कहती है --
> परतुं मैं ... मैं विवस हूँ एकांश जी। में आपको अपना प्रेम नही दे सकती ।
इतनी बोलकर वर्षाली आंखो मे आंसु लिए वर्षाली अपने आपको संभालते हूए वहां से निकल जाती है। दुसरे दिन सुबह एकांश कमरे मे सो रहा था। तभी वहां पर वर्षाली आ जाती है और एकांश को प्यार से उठाते हूए कहती है--
> एकांश जी ! ओ एकांश जी ! अब उठीए भी देखिये भौर हो गई है।
एकांश अपनी आंखे मलते हूए उठता है और कहता है--
> अरे वर्षाली तुम ?
एकांश अंगड़ाई लेते हूए कहता है--
> क्या निंद हुआ वर्षाली वाह ! मजा आ गया। ऐसा लग रहा था जैसे मे किसी आराम दायक झुला मे एक ठंडे झरने के पास झुल रहा हूँ। और फिर कब सुबह हो गई पता ही नही चला।
इतना बोलकर एकांश अपनी नजर तो कमरे की और घुमाता है तो उसकी आंखे फटी के फटी रह जाती है। इतना आलीशान कमरा उसने कभी नही दैखा था।
एकांश अपना मुह खोलकर बस हेरानी से कमरे को घुरे जा रहा था। वर्षाली कहती है--
> क्या हुआ एकांश जी ! आप ऐसे क्या दैख रहे हो ?
एकांश हेरानी से कहता है--
> ये कमरा है या कोई स्वर्ग । वाह वर्शाली ! क्या कमरा है ये बिल्कुल स्वर्ग है ।
वर्शाली हंसते हुए कहती है--
> अच्छा... ! आपको पंसद आया एकांश जी ?
एकांश वर्शाली की और दैखकर कहता है --
> पंसद की क्या बात कर रही हो वर्शाली ! ऐसा कमरा तो मैने आज से पहले कभी नही दैखा था। पर वर्शाली ये कमरा किसका है ?
वर्शाली कहती है--
.> ये मैरा कमरा है एकांश जी। और यहां पर मौजूद हर चिज पर मेरा अधीकार है। मैं जो बोलूगी ये सब मेरी बात मानते है।
एकांश कहता है--
> वर्षाली अगर मैं तुम्हारे कमरे मे था तो फिर तुम कहां पर सोयी थी ?
वर्षाली हंसते हुए कहती है--
> एकांश जी पुरा का पुरा महल ही मेरा है। और यहां पर बहोत सारे कमरे है। तो इसिलिए अब आप मेरी फिक्र करना छौड़ दो । कभी तो अपने बारे मे सोचो एकांश जी।
एकांश वर्षाली के बारे मे सोचकर परेसान हो जाता है के वर्शाली नी जाने कैसे सोयी होगी। इतना सौचकर एकांश परेसान हो रहा था। एकांश को परेसान दैखकर वर्शाली कहती है--
> आप अभी तक इसी सौच मे हो के मैं ठीक से सोयी थी की नही।
एकांश हां मे अपना सर हीलाकर कहता है--
> ह ... हां वर्शाली ।
वर्शाली कहती है--
> मैने आपसे कहा ना के यहां की प्रत्येक वस्तु मेरी
बात मानती है। अब आप देखिये मैं क्या करती हूँ।
इतना बोलकर वर्शाली अपना हाथ हवा मे घुमाती है और दैखते ही दैखते वहां पर एक सुंदर बिस्तर वर्शाली के लिए आ जाती है। जिसे एकांश अपनी आंखे बड़ी बड़ी करके दैख रहा था उसे ये एक जादु की तरह लग रहा था। वर्शाली फिर से अपनी हाथ घुमाती है तो वहां पर जल की ग्लास हवा मे उड़ता हुआ आ जाता है।
वर्शाली एकांश से कहती है--
> लिजिए एकांश जी आपके लिए जल है। इसे पी
लिजिये।
एकांश को ये सब एक चमत्कार जैसा लग रहा था । एकांश जल के ग्लास को पकड़ता है जो हवा मे लटक रहा था। ग्लास मो पानी जग से अपने आप ही भर जाता है , ग्लास को लेकर एकांश पानी को पीने लगता है।
एकांश ने इतना मिठा और शितल पानी कभी नही पिया था। पानी का घुट जैसे जैसे एकांश के गले से उतर रहा था उसे एक अलग ही आंनद का अनुभव हो रहा था। एकांश ग्लास का सारा पानी पी जाता है और वर्शाली से कहता है--
.> वाह ! वर्शाली ! इतना मिठा पानी मैने आज तक नही पिया।
वर्शाली हंसते हुए कहती है--
> अच्छा ! पियेंगे भी कैसे एकांश जी ये जल तो परी लोक का है।
एकांश चौंक कर कहता है--
> क्या ! परी लौक का जल । अरे वाह ! वर्शाली तुम्हारे साथ रहकर तो मुझे भी परी लौक का लाभ मिल रहा है।
एकांश के इतना कहने पर दौनो ही एक दुसरे को दैखकर हंसने लगता है। उधर भानपुर मे सभी एक साथ बैठकर आलोक और संपूर्णा की शादी के बारे मे बीत कर रहे थे। तभी सत्यजीत इंद्रजीत से कहता है--
> भईया आलोक तो बहोत ही अच्छा लड़का है पर उस दक्षराज का क्या उस हवेली मे वो भी तो रहेगा। जिसका केरेक्टर के बारे मे तो आप सब को पती ही
है। औरतो और लड़कियो के मामले मे वो एकदम निच आदमी है। इसिलिए तो उसकी शादी भी नही हुई। भईया क्या ऐसे इंसान के घर मे हमे अपनी बेटी ब्याहनी चाहिए ?
सत्यजीत की बात पर घर के बाकी सदस्य भी हामी भरता है। तभी सत्यजीत कहता है--
> तुम लोगों का कहना बिल्कुल सही है। मैने भी इस
बारे मे काफी सौच विचार किया। इसिलिए दक्षराज को मैने अभी तक हां नही कहा हूं। पर आलोक अच्छा लड़का है उसके जैसा लड़का मिलना संपूर्णा के लिए अच्छी बात है और आलोक काफी समझदार लड़का भी है। यही सौच कर मैनें तुम सबको यहां बुलाया है। अब तुम लोग जो बोलोगे वही होगा।
इंद्रजीत सत्यजीत और मिरा को दैखकर कहता है--
> सत्यजीत संपूर्णा तुम्हारी बैटी है और तुम्हे पुरा अधीकार है उसके भविष्य के बारे मे सौचने का। इसिलिए तुम दौनो जो कहोगे वही होगा।
इंद्रजीत का बात सुनकर मिरा कहती है--
> ये आप क्या बोल रहे हो भईया । संपूर्णा पर सबसे ज्यादा अधीकार आपका है। आप इस घर के बड़े हो । आप जो फेसला लेगें वो वो संपूर्णा के उज्जवल भविष्य के लिए ही लेगें।
इतना बोलकर मिरा चुप हो जाती है। मिरा की बात का समर्थन करते हुए सत्यजीत भी कहता है--
> हां भईया मिरा बिल्कुल ठीक कह रही है । आज तक संपूर्णा की हर छोटा बड़ा फेसला आपने ही किया है। तो ये फेसला भी हम आप पर छौड़ते हैं।
इतना बोलकर सत्यजीत भी चुप हो जाता है।
सत्यजीत की बात सुनकर इंद्रजीत कहता है--
.> अगर तुम सब की यही इच्छा है तो ठीक है। मेरे हिसाब से आलोक एक समझदार और एक नैक दिल का इंसान है। वो ये बात अच्छी तरह से जानता है के दक्ष राज किस तरह का इंसान है। और आलोक जैसा लड़का हमारे संपूर्णा के बेस्ट होगा। क्योकीं हम सब आलोक को उसके बचपन से जानते है।
इतना बोलकर इंद्रजीत चुप हो जाता है। तभी मिरा कहती है--
> वो सब तो ठीक है पर हम जिसकी शादी की बात कर रहे हैं उससे तो हमने पूछा ही नही।
मिरा के इतना कहते ही संपूर्णा भी वहा पर आ जाती है। संपूर्णा को दैखकर मिरा कहती है--
> लो जिसका नाम लिया वो खुद ही यहां पर हाजिर हो गई।
सभी संपूर्णा की और दैख रहे थे। संपूर्णा को कुछ समझ मे नही आ रहा था के सब मिलकर उसे ही क्यों दैख रहे हैं। संपूर्णा कुछ बोलती उससे पहले ही इंद्रजीत संपूर्णा को अपने पास बुलाकर कहता है---
> बेटी संपूर्णा यहां आओ मेरे पास ।
संपूर्णा जाके इंद्रजीत के पास बैठ जाती है। इंद्रजीत संपूर्णा से कहता है--
> दैनो बैटा अब तुम बड़ी हो गई हो और हम सब को
तुम्हारी शादी की चिंता हो रही है और फिर तुम्हारे लिए हमे एक अच्छा लड़का भी तो मिलना चाहिए ना ।
संपूर्णा शादी की बात सुनकर घबरा जाती है क्योंकी संपूर्णा तो आलोक से प्यार करती है इसिलिए उसे इस बात की चिंता होती है के कही घरवाले उसकी शादी किसी और क् साथ ना कर दे।
इंद्रजीत अपनी बात को जारी रखते हूए कहता है---
> तो बैटा हम सबने मिल कर तुम्हारे लिए एक लड़का चुना है , जो तुम्हारे लिए बेस्ट है । और फिर हम सब तुम्हारी राय भी जानना चाहते है। क्योकीं बेटा अगर तुम हां कहोगी तो ही बात आगे बड़ायेगें और अगर तुम ना कहोगी तो बात यही खतम कर देगें ।
इतना सुनने के बाद संपूर्णा को थोड़ी राहत मिलती है तो संपूर्णा इंद्रजीत से कहता है--
> बड़े पापा ! आप जिसे मेरे लिए चुनिएगा वो अच्छा ही होगा।
संपूर्णा के इतना कहने पर सभी के चेहरे पर मुस्कान आने लगता है। संपूर्णा की बात सुनकर इंद्रजीत संपूर्णा से कहता है --
> बेटा इतना कहके तुमने मेरा दिल गदगद कर दिया। आज मैं बहुत खुश हूँ बैटा ।
इंद्रजीत संपूर्णा के माथे पर हाथ फैरते हूए कहता है--
> बैटा क्या तुम ये जानना नही चाहोगे के लड़का का नाम क्या है ?
संपूर्णा बिना कुछ कहे ही अपने सर को झुकाए रहती है। इंद्रजीत फिर कहता है--
> बैटा जिस लड़के को हमने तुम्हारे लिए चुना है उसका नाम आलोक है तुम्हारे एकांश भाई का दोस्त ।
आलोक का नाम सुनते ही संपूर्णा का चैहरा खुशी से लाल हो जाता है। संपूर्णा अपनी खुशी को छिपा नही पा रही थी इसिलिए संपूर्णा सर्मा के वहां से दौड़कर भाग जाती है। सभी संपूर्णा की चेहरे की खुशी दैखकर समझ जाता है के संपूर्णा इस रिश्ते से बहुत खुश है।
To be continue....999