Water Sprite in Hindi Spiritual Stories by Makvana Bhavek books and stories PDF | जल-छाया

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जल-छाया

जल-छाया

हिमालय की गोद में बसा कुमाऊँ का छोटा सा गाँव धारकोट, जहाँ सुबह की हवा में देवदार की खुशबू घुली रहती थी और शाम ढलते ही पहाड़ों पर एक अजीब सा सन्नाटा उतर आता था। यहाँ के लोग मानते थे कि यह सिर्फ़ देवताओं की भूमि नहीं, बल्कि अधूरी आत्माओं का भी ठिकाना है। गाँव में जब भी किसी पर “छाया” पड़ती, लोग एक ही नाम लेते "पंडित चक्रधर जोशी।"

चक्रधर जोशी उस इलाके के प्रसिद्ध बजरिया (ओझा) थे। भभूत, मंत्र और देव-आह्वान से वे ऐसी शक्तियों को भी शांत कर देते थे, जिनसे आम लोग डरकर भाग जाते। उम्र ढलने लगी तो उन्होंने अपनी विद्या अपने बेटे सूर्यकांत, जिसे घर में सब सूर्या कहते थे, को सौंप दी। सूर्या मन से इस राह पर नहीं था, लेकिन पिता का वचन और देव-आज्ञा टाली नहीं जाती, इसलिए उसने यह विद्या सीख ली।

कुछ ही समय में सूर्या भी अपने पिता जैसा निपुण हो गया। एक दिन पड़ोस के गाँव भैंसर से लोग उसे बुलाने आए। उनकी बहू कई दिनों से अजीब हरकतें कर रही थी। कभी हँसती, कभी रोती, कभी किसी पर झपट पड़ती। सूर्या उनके साथ चला गया। जैसे ही वह घर के अंदर पहुँचा, बहू जो अभी तक चुप पड़ी थी, अचानक उठ बैठी। उसकी आँखें लाल हो गईं, बाल बिखर गए और वह चीखते हुए सूर्या की तरफ़ दौड़ी “भाग जा यहाँ से… ये देह अब मेरी है!”

सूर्या समझ गया कि यह कोई साधारण बीमारी नहीं। उसने अपने झोले से भभूत और चावल निकाले, मंत्र पढ़ते हुए उसकी तरफ़ फेंके और कठोर आवाज़ में बोला “कौन है तू? क्यों इसे सताती है?” थोड़ी देर तक तड़पने के बाद वह आवाज़ बदली और बोली “मैं तिमल (अंजीर) के पेड़ की मसाण हूँ… अधूरी मर गई… शांति नहीं मिली… ये औरत रो रही थी, मुझे जगा दिया… इसलिए इसके पीछे आ गई।” सूर्या ने विधि-विधान से पूजा करवाई, उसे शांत किया और वापस भेज दिया।

काम खत्म कर सूर्या पहाड़ी पगडंडी से अपने गाँव लौटने लगा। रास्ते में उसे प्यास लगी तो वह एक धार (प्राकृतिक पानी का सोता) पर रुक गया। पानी साफ़ और ठंडा था। उसने झुककर पानी पिया और फिर यूँ ही अपना चेहरा पानी में देखने लगा। पहाड़ों में बुजुर्ग कहते हैं "बहते पानी में अपना प्रतिबिंब नहीं देखना चाहिए, वहाँ जल-छायाएँ रहती हैं।" लेकिन उस दिन सूर्या यह बात भूल गया।

जैसे ही वह आगे बढ़ा, उसे अजीब सा अहसास होने लगा कि कोई उसके पीछे चल रहा है। कभी एक काली बिल्ली उसका रास्ता काटती, कभी कोई परछाईं उसके साथ चलती दिखती। सूर्या रुक गया। उसने मंत्र पढ़ा और चावल हवा में फेंके। तभी सामने एक आकृति उभरी - एक जल-छाया।

उसकी आँखों में गहराई थी, जैसे वर्षों का इंतज़ार हो। उसने धीमे स्वर में कहा “मैं तुम्हें नुकसान नहीं पहुँचाऊँगी… मैं तुमसे ब्याह करना चाहती हूँ।”

 सूर्या चौंक गया। उसने उसे समझाया कि यह संभव नहीं-वह प्रेत है, और वो मनुष्य। लेकिन वह नहीं मानी। तब सूर्या ने उसे टालने के लिए कहा “अगर तू मनुष्य शरीर ले सके, तभी मैं सोच सकता हूँ।”

सूर्या को लगा कि अब वह चली जाएगी, पर कुछ दिन बाद जब वह अपने घर पहुँचा, तो उसने देखा कि उसकी ईजा (माँ) अजीब हरकतें कर रही है। सूर्या तुरंत समझ गया-वही जल-छाया। उसने मंत्र पढ़ा, तो वह बोली-“वचन निभा… नहीं तो तेरे कुल को चैन से नहीं रहने दूँगी।” मजबूर होकर सूर्या उसके साथ चला गया।

जंगल में एक लावारिस स्त्री की देह पड़ी थी। जल-छाया उसमें समा गई। अब वह एक सुंदर लेकिन मौन स्त्री बन चुकी थी। सूर्या ने उससे गंधर्व विवाह किया और उसका नाम रखा "मांसा"।

मांसा अब एक साधारण स्त्री की तरह घर में रहने लगी, लेकिन वह बोल नहीं सकती थी। उसके भीतर की कुछ अलौकिक शक्तियाँ अभी भी बाकी थीं - वह थकती नहीं थी, सर्दी-गर्मी का असर उस पर नहीं होता था और घर का हर काम बिना रुके करती थी। सबसे बड़ी बात - वह सूर्या से बहुत प्रेम करती थी। बिना बोले भी उसका हर ख्याल रखती थी। धीरे-धीरे सूर्या भी उसे सच्चे मन से अपनाने लगा।

समय बीता, उनके दो बच्चे हुए और सब कुछ सामान्य लगने लगा। लेकिन सूर्या की ईजा को शक होने लगा। एक दिन उसने मसाले पीसने वाला सिल-बट्टा छिपा दिया। मांसा उसे ढूँढती रही, क्योंकि उसके लिए काम अधूरा छोड़ना संभव नहीं था। सूर्या के घर आने का समय हो रहा था और खाना तैयार नहीं था, तो वह बेचैन हो गई। अंत में मजबूरी में वह अपनी सास के पास गई और पहली बार बोलने की कोशिश की “ब… बट्टा…”

जैसे ही उसके मुँह से आवाज़ निकली, उसका शरीर वहीं गिर पड़ा। वह देह उसकी नहीं थी, और बोलना उसकी आखिरी मर्यादा थी। उसी पल वह उस शरीर को छोड़कर मुक्त हो गई।

जब सूर्या घर आया और उसे सच्चाई पता चली, तो उसकी आँखों में आँसू थे। उसने अपना प्रेम खो दिया था, लेकिन एक आत्मा को मुक्ति मिली थी। बाद में उसने सबको सच्चाई बता दी कि मांसा कोई साधारण स्त्री नहीं, बल्कि एक जल-छाया थी।

समय बीतता गया, लेकिन आज भी उस इलाके में लोग कहते हैं कि कभी-कभी धार के पास एक परछाईं दिखती है - शांत, स्थिर… जैसे अब भी किसी का इंतज़ार कर रही हो।