Ishq Tera Mera - 5 in Hindi Love Stories by Bella books and stories PDF | इश्क़ तेरा मेरा - 5

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इश्क़ तेरा मेरा - 5



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*एक दर्द-ए-दिल की शुरुआत* 

*"जिसे मैंने पलकों पर बिठाया, वो आज दुश्मन की गोद में उसकी बेटी खिला रही थी"*

पार्टी की चमक-धमक के बीच, अभि ने जैसे ही कदम रखा, उसकी सांसें थम गईं। सामने स्टेज पर *शौर्य सिंघानिया* के साथ *प्रज्ञा* खड़ी थी, और उनकी उंगली थामे एक नन्ही सी बच्ची - *रिया*। 

अभि के पैरों तले जमीन खिसक गई। सीना चीर देने वाला मंजर था। अगर दोस्त *रितेश* ने कंधा ना थामा होता, तो अभि वहीं ढेर हो जाता। 

प्रज्ञा की नजरें सिर्फ अभि पर टिकी थीं। वो आंखों से कुछ कह रही थी, पर लब खामोश थे। उधर अभि की आंखें खून की तरह लाल हो चुकी थीं। प्रज्ञा से ज्यादा उसे खुद से नफरत हो रही थी। *"मेरी प्रज्ञा इतनी बदल कैसे गई?"* 

गुस्सा, बेबसी और शराब... तीनों ने मिलकर अभि को हैवान बना दिया। नशे में चूर होकर वो चिल्लाया, "बेवफा!" और सीधा शौर्य के गिरेबान पर जा पहुंचा। पार्टी में हंगामा मच गया। पर प्रज्ञा? वो बुत बनी खड़ी रही। चेहरे पर ना दर्द, ना शर्म। जैसे अभि उसके लिए कोई अजनबी हो।

*रात का सन्नाटा और माँ का आँचल* 
उस रात दो लोग सो नहीं सके। प्रज्ञा की बंद आंखों में भी सिर्फ अभि का टूटा हुआ चेहरा नाच रहा था। तकिया भीग चुका था। 

दूसरी तरफ, अभि सुबह होते ही अपनी *माँ* की गोद में सिर रखकर बच्चों की तरह बिलख पड़ा। 

_"माँ, भगवान ने मुझसे सब क्यों छीन लिया? मेरी प्रज्ञा... वो शौर्य के पास क्यों चली गई? मैंने तो उसे पूजा था माँ!"_ 

उसी पल अभि के दिल से मोहब्बत मर गई। उसकी जगह ले ली... *सिर्फ नफरत ने।*

*हॉस्पिटल के बाहर: एक आखिरी सवाल* 
अगली सुबह प्रज्ञा बेटी रिया को स्कूल छोड़कर हॉस्पिटल जा रही थी। तभी सामने अभि की गाड़ी आकर रुकी। अभि तूफान की तरह उतरा और उसकी कलाई पकड़ ली।

_"हमारे प्यार में क्या कमी थी, प्रज्ञा? बोल! क्यों थामा तूने उस शौर्य का हाथ?"_ 

प्रज्ञा ने हाथ झटक दिया। आवाज में बर्फ थी, _"जल्दी बोलो, मुझे देर हो रही है।"_ 

अभि ने जहर बुझा तीर चलाया, _"बता... क्या रिया... तेरी और शौर्य की बेटी है?"_ 

एक पल का सन्नाटा। फिर प्रज्ञा के होंठों से निकला सिर्फ एक शब्द - *"हाँ"*। 
और वो बिना पीछे देखे ऑटो में बैठकर चली गई।

*इंतकाम की आग* 
अभि वहीं सड़क पर घुटनों के बल गिरकर फूट-फूट कर रोने लगा। जाते हुए प्रज्ञा ने पलटकर देखा जरूर... उसकी आंखों में समंदर था। पर उसकी मजबूरी ने उसके कदम रोक लिए।

ऑफिस पहुंचते ही अभि का रोना बंद हो चुका था। आंखों में अब आंसू नहीं, अंगारे थे। उसने रितेश से कहा: 
_"आज के बाद शौर्य ही नहीं... प्रज्ञा भी मेरी दुश्मन है। मैं सिंघानिया खानदान को मिट्टी में मिला दूंगा। और प्रज्ञा? उसे मैं हर रोज तिल-तिल करके रुलाऊंगा! कसम खाता हूँ!"_ 

अभि ने बिजनेस, पैसा, सब भुला दिया। अब उसका एक ही मकसद था - प्रज्ञा की बर्बादी। वो पूरी दुनिया के सामने चिल्लाकर कहता, *"प्रज्ञा मेरी पत्नी है! सिर्फ मेरी!"*


पर असलियत कुछ और थी। शौर्य को प्रज्ञा से कोई मतलब नहीं था। उसने शादी सिर्फ बाप के करोड़ों के दबाव में की थी। शौर्य और उसकी माँ, प्रज्ञा से नफरत करते थे। और प्रज्ञा? उसके दिल में शौर्य के लिए प्यार का एक कतरा भी नहीं था। 

*सवाल अब ये है: अगर नफरत ही थी, तो प्रज्ञा ने शौर्य से शादी का इतना बड़ा बलिदान क्यों दिया? क्या रिया वाकई शौर्य की बेटी है... या अभि की? और क्या अभि की नफरत उसकी मोहब्बत को मार पाएगी?*

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