50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 17 in Hindi Drama by Priya Chaudhary books and stories PDF | 50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 17

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50 दिन का सन्नाटा - एपिसोड 17

(अस्पताल के उस वीआईपी वार्ड में सन्नाटा इतना गहरा है कि केवल केबिन की घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही है। बाहर बारिश फिर से शुरू हो चुकी है, जो खिड़की पर जोर-जोर से थपथपा रही है। आर्यन के कदम केबिन के अंदर धीमे-धीमे पड़ रहे हैं।)
आर्यन की नज़रें मेज पर रखी उस बंदूक और आयशा की तस्वीर के बीच झूल रही थीं। तस्वीर के नीचे लिखा वह वाक्य—"तुम्हारी बेटी, मेरी आखिरी मोहरा"—आर्यन की नसों में बिजली की तरह दौड़ गया। उसे अब डर नहीं लग रहा था; डर की जगह अब एक ऐसी ठंडी आग ने ले ली थी, जो सब कुछ भस्म करने के लिए तैयार थी।
सीन 1: छाया का खेल
केबिन के कोने से एक धीमी, कर्कश हँसी सुनाई दी। परछाईं में से एक आकृति उभरकर सामने आई—वह आर्यन के पिता, विक्रम मल्होत्रा थे। वे एक व्हीलचेयर पर बैठे थे, लेकिन उनकी आँखें वैसी ही तेज़ थीं जैसे बीस साल पहले हुआ करती थीं। उन्होंने अपने हाथ में एक रिमोट पकड़ रखा था।
"स्वागत है आर्यन," विक्रम मल्होत्रा ने धीमी आवाज़ में कहा। "तुम यहाँ तक पहुँचे, यह देखकर खुशी हुई। तुम वही कर रहे हो जो मैंने सिखाया था—हमेशा सच की तह तक जाना, चाहे कीमत कुछ भी हो।"
आर्यन ने बंदूक उठाई और सीधे अपने पिता की तरफ तान दी। "मेरी बेटी कहाँ है, विक्रम? अगर उसे एक खरोंच भी आई, तो मैं तुम्हें यहाँ इसी वक्त खत्म कर दूँगा।"
विक्रम मल्होत्रा ज़ोर-ज़ोर से हँसने लगे, और उनकी हँसी खाँसी में बदल गई। "तुम मुझे मारोगे? क्या तुम कातिल बनोगे? यह वही पुरानी स्क्रिप्ट है जो तुम हर बार खेलते हो। अगर तुम मुझे मारोगे, तो तुम मेरे जैसे बन जाओगे। और अगर तुम नहीं मारोगे, तो तुम कभी अपनी बेटी को नहीं ढूँढ पाओगे क्योंकि उसकी लोकेशन मेरे दिल की धड़कन से जुड़ी है।"
सीन 2: 35वां दिन—मानसिक यातना का चरम
आर्यन ने देखा कि विक्रम मल्होत्रा की कलाई पर एक डिजिटल मॉनिटर बंधा था। वह मॉनिटर सीधा उनके दिल की धड़कनों को दिखा रहा था।
"यह देखो, आर्यन," विक्रम ने इशारा किया। "यह मेरी धड़कन है। अगर यह रुकी, तो अस्पताल के बेसमेंट में लगा वह विस्फोटक सिस्टम ट्रिगर हो जाएगा, जहाँ आयशा को रखा गया है। तुम मुझे मार नहीं सकते, और तुम मुझे यहाँ से ले भी नहीं जा सकते।"
आर्यन के लिए यह एक असंभव स्थिति थी। बीस साल तक उसने जिसे अपना शत्रु माना—समीर, रंजना, यहाँ तक कि अपनी परछाइयों को—वे सब तो सिर्फ मोहरे थे। असली खिलाड़ी तो यही बैठा था, जिसने आर्यन को ही उसकी अपनी बर्बादी का ज़िम्मेदार बनाने का नाटक रचा था।
सीन 3: अतीत के पन्नों का हिसाब
"क्यों?" आर्यन ने चिल्लाकर पूछा। "क्यों किया यह सब? क्यों अपनी ही औलाद को नफरत के साए में पाला?"
विक्रम मल्होत्रा ने गहरी सांस ली। "साम्राज्य चलाने के लिए भावनाएं कमज़ोरी होती हैं, आर्यन। मैंने तुम्हें एक कातिल इसलिए बनाया ताकि तुम दुनिया पर राज कर सको। तुमने मेरी बात नहीं मानी, तुमने माया से प्यार किया। तुमने वही किया जो एक कमज़ोर इंसान करता है। यह सब सन्नाटा, ये हवेली के भ्रम... ये सब तुम्हारी उस कमज़ोरी को खत्म करने के लिए थे।"
आर्यन को समझ आया कि उसके पूरे जीवन का 'सन्नाटा' उसके पिता का एक साइकोलॉजिकल एक्सपेरिमेंट था।
सीन 4: 35वें दिन की चाल
आर्यन ने बंदूक नीचे गिरा दी। उसने विक्रम के सामने झुककर कहा, "पिताजी, आप सही कहते थे। भावनाएं कमज़ोरी होती हैं। और शायद इसीलिए, आज मैं वो करूँगा जो आप कभी नहीं सोच पाए।"
आर्यन ने अपनी जेब से वह 'कागज की बनी चाबी' निकाली, जो अब असली लोहे की चाबी में बदल चुकी थी। उसने उसे रिमोट के की-होल में डाला और मोड़ दिया। विक्रम चौंक गए।
"तुमने यह कैसे किया? यह तो सिर्फ एक खेल था!"
आर्यन ने मुस्कुराते हुए कहा, "आपने मुझे सब कुछ सिखाया, लेकिन एक चीज़ भूल गए—इंसान जब अपना सब कुछ खो देता है, तब वह डरना बंद कर देता है। मैंने इस पूरे अस्पताल की सुरक्षा को पहले ही हैक कर लिया है। मैंने आयशा को वहाँ से हटा दिया है। वो यहाँ नहीं है।"
सीन 5: सन्नाटे का अंत
विक्रम मल्होत्रा का चेहरा पीला पड़ गया। उन्होंने घबराकर मॉनिटर देखा। धड़कनें अब भी चल रही थीं, लेकिन उन्होंने देखा कि आर्यन का एक साथी—समीर—वहाँ पहुंच चुका था। आयशा सुरक्षित थी।
"तुमने मुझे मात दे दी?" विक्रम फुसफुसाए।
आर्यन ने बंदूक उठाई, लेकिन इस बार अपने पिता पर नहीं, बल्कि उस शीशे पर जो उसे उसके पिता से अलग कर रहा था। धड़ाम! शीशा चकनाचूर हो गया। आर्यन ने अपने पिता के हाथ से रिमोट छीना और उसे तोड़ दिया।
"सजा आपको जेल नहीं, बल्कि वह सन्नाटा देगा जिसे आप सालों से मुझे देने की कोशिश कर रहे थे। आज से, आप इस हॉस्पिटल की चारदीवारी में रहेंगे, जहाँ कोई आपकी बात सुनने वाला नहीं होगा। आप अकेले होंगे, बिल्कुल वैसे ही जैसे आपने मुझे रहने पर मजबूर किया था।"
सीन 6: 35 दिन पूरे
विक्रम मल्होत्रा चिल्लाते रह गए, लेकिन आर्यन बाहर निकल चुका था। बाहर आयशा खड़ी थी। उसकी आँखों में आंसू थे, लेकिन इस बार वे डर के नहीं, बल्कि मुक्ति के थे। उसने अपने पिता के गले लगकर कहा, "पापा, सब खत्म हो गया।"
आर्यन ने आकाश की ओर देखा। 35 दिन पूरे हो चुके थे। 15 दिन अभी भी शेष थे। उसने अपनी नोटबुक में 35वां पन्ना लिखा: "सन्नाटा अब मेरी आवाज़ है। मैंने अपने पिता को नहीं, अपने अंदर के उस कातिल को हराया है जो मुझे बनने के लिए मजबूर किया गया था।"
नैरेटर: 35 दिन बीत चुके हैं। आर्यन का सच, उसका बदला, उसका प्रायश्चित—सब एक मोड़ पर आ गया है। लेकिन अभी भी 15 दिन बाकी हैं। वह '50 दिन का सन्नाटा' जो उसे मिला था, क्या वह वाकई उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी सीख थी?
(सस्पेंस पॉइंट: आर्यन और आयशा जब कार में बैठकर वहाँ से निकल रहे थे, तो आर्यन ने कार के मिरर में देखा कि वह हॉस्पिटल उसी वक्त एक धमाके के साथ जल रहा था। अंदर से कोई नहीं निकला। क्या उसके पिता ने वाकई खुद को खत्म कर लिया, या यह भी एक और 'अंतिम चाल' थी? आर्यन की जेब में एक और लिफाफा गिरा—उस पर लिखा था: "खेल अभी शुरू हुआ है, आर्यन।")
लेखक: प्रिया
आर्यन अब एक ऐसी सच्चाई की ओर बढ़ रहा है जो 50 दिन के बाद भी उसे पीछा नहीं छोड़ेगी। पिता का अंत या नई शुरुआत? सस्पेंस जारी है..