old ship in Hindi Love Stories by Kuntal Sanjay Bhatt books and stories PDF | पुराना जहाज़

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पुराना जहाज़

पुराना जहाज़

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वह खाँसता हुआ, साँसों को जैसे खींचता हुआ नदी के किनारे यहाँ वहाँ घूमता रहता। उछलते हुए पानी की मस्तियाँ, नज़दीकी गाँव की हरियाली और आसमान के बदलते रँगों को घँटों निहारता रहता। किनारे पर लगाया गया वह पुराना, बिना काम का जहाज़ उसका पक्का साथी था।

"गोविंद भाऊ, काय झाल? इकडे काय शोधून राहता?" 

कभी कोई ऐसा पूछ लेता, तभी वह रूखे सूखे होठों पर छोटी सी मुस्कान ले आता और अपने दिल पर  ज़ुर्रियों वाले दोनों हाथ रख लेता।  पूरे दिन में एकबार वह पूरे जहाज़ को न देखे तो उसका दिन मानों बेकार सा लगता। कभी कभार उसके हाथ कोई टूटा पुराना झाडु लग जाये तो वह पूरे जहाज़ की सफाई कर देता। सफाई करने के बाद वहीं पे कहीं सो कर, अपने बीते हुए सुनहरे दिनों वाली दुनिया के सफ़र पे निकल पड़ता।

' वो मखमली स्पर्श, वो नीली सी शरबती आँखें! वो मेरे सारे अस्तित्व पर छा जाते हुए उसके हाथ। उसके हर चढ़ाव उतार पे सरकते हुए मेरे हाथ। कभी बारिश की बूँदों की सरगम तो कभी थरथर्राती शीत लहरें दोनों के अस्तित्व को जैसे एक दूसरे में घोल कर रख देती थी। वह हरेक पल का यह जहाज़ मूक साक्षी है। तो क्या हुआ गर वह भी मेरी तरह दुनिया के लिए एकदम से निठल्ला है पर यह मेरे लिए तो मेरी दुनिया है। '

"ए भाऊ.... ए... गोविंद भाऊ..खाली येजो.." वहाँ के किसी स्थानिक की आवाज़ ने कान के दरवाजों पर ज़ोरों की दस्तक दी। गोविंद अपनी पुरानी सपनों की दुनिया से ऐसे बाहर निकल कर आया जैसे किसी ने उसे वास्तविक धरती पे ला  पटका हो। वह धीमी गति से कदम बढ़ाते हुए, झुकीं हुई नज़रों से और यादों का बड़ा सा बख़्शा जैसे काँधे  पर रखा हो वैसे झूके शरीर को लेकर बाहर आया।

"जहाज़ विकला भाऊ..रिकामा जहाज़ कोण घेते? पण काल रात्रि एक मेमसाब आली आणि सौदा झाला, उद्या सकाळ पर्यंत घेऊन जाशील।" 

गोविंद ने  चौंक कर ऊपर देखा, उसकी छोटी छोटी ज़ुर्रियों वाली आँखें बरस पड़ी, ' अब..अब तो मैं बिलकुल अकेला! यह मेरा दिल करीबी जहाज़, यादोँ की सफर का एकमात्र साथी अब वह भी चला जायेगा। ' 

वह पूरी रात जहाज़ में घूमता रहा, उसका चप्पा चप्पा, हर कौना जैसे अपनी आँखों के साथ हर साँस में सँजोये रखना चाहता था! पिछले प्रहर उसको झपकी लग गई। थोड़ी ही देर में सूरजकी रोशनी आँखों पर आई , साथ में कुछ धीमी सी आवाजें उसके कान पर पड़ी। उसने अपनी पुरानी सी ऐनक उठाई और पुरानी सी आँखों पर लगाई और वह देखता ही रह गया! तभी कोई मनभावन लहर जहाज़ के साथ टकराई और बरसों से स्थिर खड़ा हुआ जहाज़ हिल पड़ा!

गोविंद ने देखा तो सामने उसकी दुनिया की हूबहू चेहरे वाली लड़की! वही कद काठी, वही रंग सिर्फ आँखों का फर्क! उसने ऐनक निकाल कर अपने मैले कुचैले कुर्ते से ठीक से पोंछी, वह उस भरम का मर्म समझना चाहता था पर कोई उसे समझाएगा ही क्यों? वह धीरे से जहाज़ से उतर ही रहा था कि वह मेमसाब ने आकर उसका हाथ पकड़ लिया! नीचे उतरते ही उसने आँखों में ओस बूँद भरते हुए मेमसाब के सामने दोनोँ हाथ जोडकर आभार प्रकट किया। उसने छोटी सी थैली  से बोतल निकाली और कुल्ला करके मुँह धो लिया और एक कोने में जा खड़ा हुआ। 

" हु इज़ ही?" मेमसाब ने चेहरे पे आश्चर्य मिश्रीत अजीब भाव से सवाल किया।

" ये हररोज़ यहाँ वहाँ टहलते रहते है, उनका घर यहाँ पास में ही है। उनको यह जहाज़ से बहुत लगाव है।" साथ में आए एक आदमी ने बताया।

"ओह ओके, तभी इनकी आँखें गीली हो गई थी। अच्छा, इनका नाम तो बताओ कोई।" 

"जी, गोविंद भाऊ..सच पूछो तो इस जहाज़ को यही साफ किया करते है।" 

" क्या बोला? गोविंद भाऊ…गोविंद शिंदे? "

"जी "

सुनते ही वो दौड़ के गोविंद के पास  पहुँच गई। "आप गोविंद अंकल हो न? मैं राधा की बेटी…!" 

इतना बोलना पूरा ही हुआ कि गोविंद हाथ ऊपर उठाते हुए रोते रोते बोला, "और कितनी कसौटियाँ लोगे भगवन ! यह मेमसाब तो सच में राधा की बेटी निकली, अब मैं उसे दिया गया वचन कैसे निभा पाउँगा?" वह इस तरह रोते रोते नीचे बैठकर सिसकने लगा। 

मेमसाब भी रोती हुई आँखों से उसके पास गई उसको दिलासा देते हुई बोली, " माँ ने आपको वचन मुक्त किया है अब आप मुझसे उनके बारे में कुछ भी जानना चाहो पुछ सकते हो। चलिए, जहाज़ में आपकी पसंदीदा जगह पर जा कर बैठतें हैं।" और उसको हाथ पकड़कर जहाज़ में ले गई। उनके साथ आये हुए बंदों को हाथ के ईशारे से वहीं खड़ा रहने को बोला।

वो दोनोँ जहाज़ के एक कोने में जाकर बैठ गए। अब मेमसाब गोविंद भाऊ का हाथ अपने हाथ में लेकर बोली, " बाबा, मी धनश्री राधा आणि…" 

"माझी पोरगी…माझ बाळ.." बोलके गोविंद रो पड़ा। 

फिर आँसू पोंछ कर पूछा , "राधा कैसी है? वो अब भी मुझे याद करती है?" 

"नहीं…क्योंकि वह कभी आपको भूली ही नही है। आपको वचन में बाँधकर उसने सोचा था, आप उसको और वह आपको भूलने में कामियाब रहोगे। पर ये हो न सका। उसने मुझे सारी बात बताई है बाबा।" 

"ओह…सारी की सारी बातें!" गोविंद का मुँह आश्चर्य से खुला रह गया। 

"हाँ, आपकी प्रेम कहानी के सारे पड़ाव, किस तरह से आप दोनोँ मिले, किस तरह से इज़हार हुआ, किस तरह फिर जुदा होना पड़ा, आई की दूसरी जगह शादी होने के बाद, चार साल माँ न बन पाने पर आप से मदद लेना और आपको पूरी ज़िंदगी के लिए वचन में बाँधकर खुद की और आपकी भली सोचना। " वह सब एक ही साँस में बोल गई! 

"ह्म्म्म, ये जो सारे वाक़ये तुम इतनी जल्दी बोल गई वो जीने में मुझे सालों लग गए है! तुम्हारी माँ को कभी मैंने दोषी नहि ठहराया पर तक़दीर का लिखा सोचकर सब अपना लिया।"

"समझती हूँ बाबा, और एक बात बताइए आपने फिर शादी क्यों नहीं की?"

"बस, यह वचन ही तो मैंने तेरी माँ को नहीं दिया था। बाकी तेरी माँ मेरे दिल के साथ मेरी जान भी निकाल ले जाती।"

"तो यह समझ लूँ कि आप अब भी मेरी माँ से उतना ही प्यार करते हो?" 

गोविंद थोड़ा हिचकिचाया उसने बात को दूसरा रुख़ देते हुए पूछा, " यह जहाज़ तुम क्यों खरीदना चाहती हो?" 

"माँ की इच्छापूर्ति के लिए। वह चाहती है कि यहाँ की, इस जहाज़ की यादोँ को तोड़ कर कोई अपना जहाँ न बसा ले। अब तक मुमकिन न था पर अब मेरे डैडी यानि कि मेरे माँ के पति का देहांत हो चूके पूरे दो साल हो चूके है।" 

"ओह! " गोविंद ने सिर्फ इतना बोलकर दुःख जताया।

"एक बात मानोगे मेरी? आप भी अकेले हो तो हमारे साथ…" 

"नाही…" बोलकर गोविंद खड़ा हो गया। 

"बाबा..बैठिये सब देख रहे हैं…" 

गोविंद ने चारों ओर नज़र घुमाई और चुपचाप बैठ गया। 

"आप क्यों नही आना चाहते हो? ऐसी जिंदगी क्यों जी रहे हो? हमारे साथ रहोगे तो .."

"संपल? अगर तुम बोल चुकी हो तो मैं तुम्हें अपने घर ले जाना चाहता हूँ। आओगी?" 

"हाँ…हाँ क्यों नहीं?" 

फिर उसने ड्राईवर को गाड़ी निकाल ने को बोला और…और…गाड़ी एक बड़े से घर पे आकर रुकवाई गई! 

गोविंद को देख वॉचमेन भागा भागा आया और गेट खोला। 

धनश्री भौंचक्की हो कर देख रही थी। गेट खुलते ही सुंदर सा बागीचा दिखा। घरमें जाते ही पुरानी स्टाईल का फर्नीचर नई सजावट वाला दिखा। दीवारों पर अदभुत तैलचित्र दिखें सब में रँगों के साथ जैसे दर्द घोला गया हो! और नीचे नाम देखा, "गोविंद शिंदे R" ।

वो यंत्रवत गोविंद के पीछे एक कमरे से दूसरे कमरे की ओर चलती रही। हर जगह गोविंद की कला दिख रही थी और साथ में उसकी धनपात्रता भी छलक रही थी! वह सोचमें पड़ गई..' तो फिर…तो फिर…वह जहाज़ पे पूरे दिन टहलना..यह मैला कुचैला कुर्ता! '

"अब बोलो..मुझे तुम्हारे घर क्यों आना चाहिए? अब तो मुझे आदत हो चुकी है तुम्हारी माँ को यूँही चाहने की, तो इतने साल बाद मैं अपनी आदत क्यों बदलूँ? और देख इस कुर्ते को हम जब आख़िरी बार मिले थे तब पहना था, मैंने आज तक नहीं धोया है! मैं जब जब जहाज़ में जाता हूँ यही पहनकर जाता हूँ समझ रही हो न क्यों?" 

"ह्म्म्म" धनश्री अभी शॉक से बाहर नही निकल पाई थी।

"एक बात अपनी माँ से कह देना, मैं तब जितनी ख़ुद्दारी रखता था। आज भी रखता हूँ। सिर्फ़ एक बदलाव आया है आज मेरे पास ढेरों पैसे हैं तब मेरे पास नहीं थे। तेरे पोलिटीशयन नानाजी ने मुझे "घर जवाई" बनाके तलवे चाटने की ऑफ़र दी थी मैंने नहि मानी और तेरी माँ किसी बड़े से व्योपारी से ब्याही गई।" 

"मुझे सब पता है बाबा तभी तो आई लव यू न।" कहकर धनश्री गोविंद से लिपट गई।

गोविंद उसका सिर सहलाते हुए बोला, " वह पुराना जहाज़ मेरी जिंदगी है बाळा, अगर यह भी तेरी माँ को चाहिए तो खुशी से ले जाओ।" 

"आप गलत समझ रहे हो, इस जहाज़ को ओर कोई न ले जाए इस लिए माँ ने बोला था ' यह मेरी सुनहरी यादों का खज़ाना है उसे खरीद लो और उसी जगह रहने दो, मैं थोड़े दिन वहाँ रहना चाहती हूँ।' अब समझे?" 

थोड़े दिनों में पुराने जहाज़की  मरम्मत और रंग का काम शुरू हुआ। और गोविंद ने दूसरे शहर जाने की फ़्लाइट ले ली।

कुंतल संजय भट्ट

              सूरत