mahakal darshan in Hindi Travel stories by Vandna Sharma books and stories PDF | महाकाल दर्शन यात्रा

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महाकाल दर्शन यात्रा

डॉ वंदना शर्मा पांडव नगर new delhi 

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*यात्रा-संस्मरण: दिल्ली से महाकाल की यात्रा 

*लेखिका: डॉ वंदना शर्मा*

*"सैर कर दुनिया की ग़ाफ़िल, ज़िन्दगानी फिर कहाँ*  

*ज़िन्दगानी गर रही, तो नौजवानी फिर कहाँ"*

21 मार्च 2026 को नई दिल्ली रेलवे स्टेशन से उज्जैन के लिए हमारी ट्रेन थी - मालवा एक्सप्रेस। ट्रेन का पहुँचने का समय था सवा आठ बजे लेकिन आई स्टेशन पर नौ बजे। एक घंटा लेट हो चुकी थी हमारी ट्रेन। 

मन में कौतूहल था, उत्कंठ लालसा थी महाकाल के दर्शन की। दिल्ली से उज्जैन लगभग 900 Km है। कभी सपने में भी नहीं सोचा था इतनी जल्दी महाकाल के दर्शन करने का सौभाग्य प्राप्त होगा। मेरी बड़ी भाभी भी महाकाल की भक्त हैं, उन्होंने ऐसे ही अचानक एक दिन पूछ लिया महाकाल के दर्शन करने चलोगी ।और मैंने तुरंत हाँ कर दी। बस ऐसे बनी योजना इस यात्रा की।

मैं अपने बड़े भैया (गुरुदत्त) और बड़ी भाभी जी (नीतू शर्मा) की आभारी हूँ, उनके स्नेह और सहयोग से मेरी यह यात्रा आनंदपूर्ण सफल हुई। हम (मैं और मेरा बेटा श्रीश नई दिल्ली से चढ़े, कोच में भाभी और मेरी भतीजी (गार्गी, जाह्नवी) हमें पलकें बिछाए इंतज़ार करती मिली। मेरा भतीजा ओम शर्मा। कुल मिलाकर हम 6 व्यक्ति चल पड़े अपनी तीर्थ यात्रा पर महाकाल के दर्शन करने। *जय महाकाल।*

ट्रेन क्योंकि रात की थी तो आधा सफ़र सोने में, बातें करने में व्यतीत हो गया। सुबह आठ बजे से खिड़की से बाहर देखा तो कहीं दूर तक फैले सूखे पहाड़, कहीं हरे-भरे खेत, कहीं आती-जाती भीड़ तो कहीं टकटकी लगाए ट्रेन को निहारते जाते मासूम बच्चे। 12:30 दोपहर हम ट्रेन से उतरे उज्जैन की धरती पर।

सबसे पहले वहाँ की हवा में महाकाल को महसूस किया, उज्जैन की धरती को माथे से लगाया और स्टेशन से निकलकर पहुँचे अपने होटल। वहाँ हम सब नहाकर पूरी ऊर्जा के साथ निकले महाकाल दर्शन के लिए। महाकाल लोक के सामने गली में ही होटल था। तो पैदल ही पहुँच गए महाकाल लोक। वहाँ पहुँचते ही एक अद्भुत ऊर्जा का अनुभव हुआ। महाकाल की कृपा थी हम पर। उस समय अधिक भीड़ नहीं थी, ना हमें लाइन में लगना पड़ा, ना इंतज़ार करना पड़ा। आसानी से दर्शन हो गए।

महाकाल के दर्शन के बाद महाकाल लोक घूमा। उस दिन धूप तेज थी, हम सबका प्यास व भूख से बुरा हाल था। तो हम शीघ्र ही महाकाल लोक से बाहर आ गए, सोचा शाम को आकर पुनः घूम लेंगे। हमने सुना था मध्यप्रदेश का नाश्ता पोहा और जलेबी बहुत प्रसिद्ध है। लेकिन महाकाल लोक के सामने सड़क पर लगभग 1 Km क्षेत्र में जो दुकानें थीं, अफसोस, किसी भी दुकान का पोहा अच्छा न लगा। बस उबले हुए पोहे पर नमकीन डाल कर दी थी। खाते ही मुँह से बस यही निकला, "इससे अच्छा तो हमारी दिल्ली में मिलता है।" हमारी दिल्ली में पोहा बहुत ही स्वादिष्ट, राई में छौंक लगा साथ में हरी हरी मिर्च के आचार के साथ - बारीक कटी प्याज़, मूँगफली के दाने और उस पर हरी धनिया। वाह मज़ा आ गया।

मैंने गूगल पर चेक किया उज्जैन में बढ़िया पोहा कहाँ मिलता है, वह जगह उस स्थान से बहुत दूर थी। पोहा खाने जाते तो आधा दिन उसी में लग जाता जबकि हमें काल भैरव दर्शन करने भी जाना था। तो हमने वहाँ से ऑटो रिक्शा लिया काल भैरव मंदिर तक के लिए और पोहा खाने का कार्यक्रम अगली बार। रिक्शे में बैठकर उज्जैन की सैर करना एक सुखद अनुभव था, क्योंकि रिक्शा कम गति से चलता है। उज्जैन की गलियों में एक अलग ही सुकून था, जो दिल्ली के ट्रैफिक और भीड़-भाड़ से दूर उज्जैन की सड़कों में शांत लगी।

काल भैरव मंदिर उज्जैन शहर से लगभग 4-5 Km की दूरी पर शिप्रा नदी के तट पर स्थित है, जिसके लिए महाकाल लोक से सीधे सुलभ हैं।

महाकाल लोक से काल भैरव मंदिर की दूरी लगभग 8 Km है। बस, ऑटो, कैब या पर्सनल गाड़ी से आमतौर पर 15 से 20 मिनट लगते हैं। यह मंदिर शिप्रा नदी के तट पर भैरवगढ़ इलाके में स्थित है। महाकाल परिसर से कार्तिक मेला मैदान होते हुए रास्ता काल भैरव मंदिर तक जाता है। हमने महाकाल परिसर के बाहर से ही ई-रिक्शा की क्योंकि हमें वहाँ की कोई जानकारी नहीं थी। चूँकि ई-रिक्शा धीरे-धीरे चलती है तो रास्ते में पड़ने वाले सभी मंदिरों और नजारों के दर्शन आसानी से हो जाते हैं।

उज्जैन में ऐसी मान्यता है कि महाकाल के दर्शन के बाद काल भैरव जी के दर्शन करना अनिवार्य है। उज्जैन में महाकाल लोक से काल भैरव जाने का रास्ता बहुत सुन्दर और सुकून भरा है। रास्ते में कई प्रमुख और ऐतिहासिक मंदिर पड़ते हैं। चौबीस खंबा मंदिर शिप्रा नदी के तट पर रास्ते में पड़ने वाला प्राचीन मंदिर है जो अपनी अनूठी वास्तुकला और ऐतिहासिक महत्व के लिए जाना जाता है।

काल भैरव मंदिर का निर्माण राजा भद्रसेन ने काल भैरव के सपने में दिये गए आदेश के अनुसार करवाया था। नागर शैली में निर्मित गर्भगृह में भगवान काल भैरव की प्रतिमा स्थापित है। रिक्शा से उज्जैन के दर्शन बड़े मनोहारी थे। रस्ते में एक मंदिर सिंहेश्वर महादेव मंदिर पड़ा महाकाल की लीला देखो आते समय और जाते समय दोनों बार रिक्शा वहीं रुकी कुछ देर के लिए ही सही शायद ईश्वर चाहते हो पहले उस मंदिर से आशीर्वाद मिले। लगभग चार बजे पहुंचे काल भैरव मंदिर। वहां बहुत भीड़ थी। लगभग दो घंटे लाइन में लगे रहे तब जाकर काल भैरव जी के दर्शन हुए। वहां से लौटकर हम माता हरसिद्धि के मंदिर गए। वहां विश्व प्रसिद्ध आरती देखी माता के दर्शन किए और रात्रि दस बजे अपने होटल पहुंचे। होटल पहुंचकर अगले दिन के टैक्सी बुक की क्योंकि अगली सुबह जाना था ओंकारेश्वर मंदिर। अगली सुबह जल्दी ही लगभग 3 बजे उठकर सबने नहाने का कार्यक्रम खत्म किया और टैक्सी वाले को फोन किया। सुबह का मौसम सुहावना था। ठंडी हवा चल रही थी। अभी 4.30 ही बजे थे सूर्योदय नहीं हुआ था। टैक्सी वाले भैया को बोलकर महाकाल के भजन सुनते हुए यात्रा प्रारंभ की। बोलो जय महाकाल 🙏 भजन सुनते हुए और रास्ते में पड़ते कुदरत के नजारे कहीं खूबसूरत पहाड़ कहीं नदियां का पानी रास्ता कब कट गया पता ही नहीं चला। लगभग साढ़े आठ बजे पहुंचे हम मां नर्मदा के घाट पर। बहुत ही सुन्दर दृश्य थे और व्यवस्था भी बहुत अच्छी थी। साफ सफाई बहुत थी। नर्मदा का पावन जल और प्रशाशन की अच्छी व्यवस्था। आनंद ही आ गया। महिलाओं के लिए अलग अलग केबिन भी बने थे वस्त्र पहनने के लिए। पुलिस की भी अच्छी व्यवस्था थी। मां नर्मदा में नहाकर हमने पूजा की और ओंकारेश्वर मंदिर की ओर चल पड़े।

मध्य प्रदेश के खंडवा जिले में नर्मदा नदी के बीच 'मानधाता' या 'शिवपुरी' द्वीप पर स्थित ओंकारेश्वर मंदिर देश के 12 ज्योतिर्लिंगों में से चौथा ज्योतिर्लिंग है। यह स्थान अपनी प्राकृतिक 'ॐ' (Om) की आकृति और रहस्यमयी मान्यताओं के लिए दुनियाभर में प्रसिद्ध है।

इस प्राचीन और पवित्र तीर्थ की कहानी और मान्यताएं कई पौराणिक कथाओं से जुड़ी हैं:

*1. राजा मानधाता की तपस्या और प्राकट्य कथा*  

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भगवान राम के पूर्वज इक्ष्वाकु वंश के चक्रवर्ती सम्राट राजा मानधाता ने इस द्वीप पर कठोर तपस्या की थी। उनकी भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव प्रकट हुए और उन्हें वरदान दिया कि वे इसी स्थान पर ज्योतिर्लिंग के रूप में सदा वास करेंगे। राजा के नाम पर ही इस स्थान को 'मानधाता पर्वत' भी कहा जाता है।

*2. विंध्य पर्वत का अहंकार और वरदान*  

एक अन्य कथा के अनुसार, विंध्याचल पर्वत (विंध्य) के मन में एक बार अहंकार आ गया। अपने अहंकार का प्रायश्चित करने के लिए उन्होंने भगवान शिव की पूजा की और पवित्र ज्यामितीय पैटर्न (यंत्र) और रेत-मिट्टी से एक शिवलिंग बनाया। भगवान शिव उनकी भक्ति से प्रसन्न हुए और दो रूपों— *ओंकारेश्वर* (ओंकार पर्वत पर) और *अमलेश्वर* (नर्मदा के दूसरे तट पर)—में प्रकट होकर वरदान दिया।

*3. ओंकारेश्वर और ममलेश्वर की महिमा*  

यह दुनिया का एकमात्र ऐसा ज्योतिर्लिंग है जो दो भागों में विभाजित है। यहाँ मुख्य ओंकारेश्वर लिंग के साथ-साथ नर्मदा के दूसरे तट पर स्थित *ममलेश्वर (अमलेश्वर)* महादेव के दर्शन भी किए जाते हैं। मान्यता है कि इन दोनों मंदिरों में दर्शन करने के बाद ही ज्योतिर्लिंग की यात्रा पूर्ण होती है।

*4. भगवान शिव का शयन रहस्य*  

यह सबसे बड़ी और अनूठी मान्यता है कि तीनों लोकों का भ्रमण करने के बाद, भगवान शिव प्रतिदिन रात को माता पार्वती के साथ ओंकारेश्वर धाम में विश्राम करने आते हैं। रात को शयन आरती के बाद मंदिर के कपाट बंद कर दिए जाते हैं और गर्भगृह में भगवान के लिए सेज सजाई जाती है। ऐसी मान्यता है कि सुबह जब पुजारी कपाट खोलते हैं, तो वहाँ चौसर (पासे) और अन्य सामग्री बिखरी हुई मिलती है, जिसे देखकर लगता है कि स्वयं महादेव रात में यहाँ चौसर खेलते हैं।

*मंदिर का ऐतिहासिक महत्व*  

इतिहास के पन्नों में दर्ज जानकारी के अनुसार, वर्तमान भव्य मंदिर का निर्माण 11वीं सदी में मालवा के परमार राजाओं ने करवाया था। इसके बाद 18वीं सदी में मराठा शासकों, विशेषकर रानी अहिल्याबाई होलकर ने इसका जीर्णोद्धार और विस्तार करवाया।

---बहुत सुंदर मंदिर बना हुआ था। ज्यादा भीड़ नहीं थी उस समय जब हम गए। बारह मंजिल भवन की थी। सभी श्रद्धालु पंक्ति बनाकर चल रहे थे। पंक्ति में लगे हुए भी हम तो मां नर्मदा को ही निहार रहे थे। बहुत सुंदर दर्शन किए। फिर पुल पारकर ममलेश्वर महादेव के दर्शन किए। लगभग दो बजे हम खाना खाने एक ढाबे पर रुके और खाना खाकर कुछ शॉपिंग की।करीब साढ़े तीन बजे हम वहां से चले उज्जैन के लिए। रात्रि 9बज गए हमें वापसी में। थकान के कारण कहीं और घूमने की अब हिम्मत नहीं थी। खाना खाकर अपने होटल पहुंचे और सो गए। अगली सुबह फिर तैयार हो कर उज्जैन के बाकी मंदिर घूमने। चिंतामणि गणेश मंदिर, मंगल नाथ मंदिर, बड़े गणेश जी का मंदिर, संदीपनी आश्रम, गढ़कालिका मंदिर और रास्ते में पड़ते वाले सभी छोटे बड़े मंदिर के दर्शन के बाद लगभग 1.30 भागते दौड़ते स्टेशन पहुंचे क्योंकि हमारी ट्रेन थी दो बजे की। उज्जैन से दिल्ली के लिए। सीट मिल गई थी। और हम महाकाल की यादों में खोए कब सो गए पता नहीं चला। जय महाकाल 🙏