Devil ki Daastaan in Hindi Drama by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 21

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Devil की दास्तान - 21

(मंदिर के बाहर सुबह की हल्की किरणें फैल रही हैं।
रात का अँधेरा धीरे-धीरे मिट चुका है। 
करण मंदिर की सीढ़ियों पर बैठा है, सिमरन उसकी गोद में शांत पड़ी हुई है।
करण की आँखों में अब भी आँसू हैं, पर उनमें एक उम्मीद की चमक है।)

(अचानक सिमरन की उँगलियाँ हिलती हैं।
उसकी साँसें गहरी होती हैं, और वो धीरे-धीरे आँखें खोलती है।)

सिमरन (धीरे, मासूम आवाज़ में) बोली - 
“... क करण जी?...”

(करण चौक उठता है। उसकी आँखों से आँसू बह पड़ते हैं।
वो सिमरन को गले से कसकर लगा लेता है।)

करण (टूटे, पर खुश स्वर में) बोला - 
“सिमरन!... तुम... तुम ज़िंदा हो!... भगवान ने मेरी सुन ली!...”

(सिमरन कमज़ोरी से मुस्कुराती है। उसके चेहरे पर वही मासूमियत है,
जो करण ने पहली बार देखी थी।)

सिमरन (धीरे से): बोला - 
“मैं... ठीक हूँ करण जी...”

(करण उसे और कसकर सीने से लगाता है, उसकी आँखों में सच्चा प्रेम और सुकून झलकता है।
वो सिमरन के बालों को सहलाते हुए कहता है —)

करण (गहरी आवाज़ में) बोला - 
“तुमने साबित कर दिया सिमरन...
कि इंसानों से कोई नहीं जीत सकता...
चाहे वो कितना भी शक्तिशाली क्यों न हो…”

(सिमरन हल्की मुस्कान देती है, उसकी आँखों में आँसू हैं, पर उनमें डर नहीं है। करण ने अपना कोट उतार दिया था।)

करण (धीरे, भावनाओं से भरे स्वर में) बोला - 
“इंसान नाम की ये चीज़...
वो हर शैतान को झुका सकती है…
तुमने मुझे हरा दिया सिमरन...
मैं हार गया तुमसे...”

(वो हल्का रुकता है, मुस्कुराता है, उसकी लाल आँखों में अब दर्द नहीं — बस शांति है।)

करण (धीरे से) बोला - 
“हाँ... मैं हार गया...
पर इस हार में भी मैंने जीत ली है…”

(सिमरन मुस्कुराती है, उसके हाथ करण के चेहरे पर जाते हैं।
वो उसके आँसू पोंछती है।)

सिमरन (धीरे, प्यार से) बोली - 
“कभी-कभी... हार ही सबसे बड़ी जीत होती है करण जी...”

(करण उसकी ओर देखता है,
उसके चेहरे पर सूरज की पहली किरण पड़ती है, जो उसे और पवित्र बना देती है।)

“वो जो कभी राक्षस था,
आज इंसान बन चुका था...
क्योंकि एक इंसान के दिल ने उसे प्यार करना सिखा दिया था…”

(मंदिर की घंटी अपने आप बजने लगती है।
करण सिमरन के माथे को चूमता है —
और दोनों सूरज की रोशनी में खो जाते हैं।)

( करण सिमरन को अपनी बाँहों में उठाए हुए सड़क पर चल रहा है।
उसका चेहरा थका हुआ है, पर आँखों में सिर्फ एक ही डर — कहीं सिमरन फिर से उसे छोड़ न दे।
उसके कदम लड़खड़ा रहे हैं, पर उसका दिल मजबूत है। सिमरन कमजोरी से बेहोश हो गई थी।)

करण (धीरे से, खुद से) बोला - 
“कुछ नहीं होगा तुम्हें सिमरन...
अब मैं तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…”

(घर पहुँचकर करण उसे बिस्तर पर लिटा देता है।
सिमरन बेहोश है, उसका चेहरा पीला पड़ चुका है।
करण तुरंत फोन उठाता है।)

करण (घबराते हुए) बोला - 
“डॉक्टर! प्लीज़ जल्दी आइए… उसे होश नहीं आ रहा!”

(थोड़ी देर में डॉक्टर आ जाती है — एक दयालु महिला।
वो सिमरन की नब्ज़ देखती है, कुछ टेस्ट करती है और फिर करण की तरफ देखती है।)

डॉक्टर बोली - 
“चिंता मत कीजिए। बस थोड़ी सी खून की कमी है।
अगर ये अच्छा खाना खाएंगी और आराम करेंगी,
तो दो दिन में बिल्कुल ठीक हो जाएंगी।”

(करण राहत की साँस लेता है। उसके चेहरे पर हल्की मुस्कान लौटती है।)

करण (धीरे, खुद से) बोला - 
“भगवान का शुक्र है…”

(डॉक्टर चली जाती है। करण सिमरन के पास बैठता है,
उसका हाथ थामे हुए। वो धीरे से उसके बालों को सहलाता है।)

करण (धीरे से) बोला - 
“अब कभी तुम्हें कुछ नहीं होने दूँगा…
कभी नहीं…”

(थोड़ी देर बाद सिमरन की उँगलियाँ हिलती हैं।
वो धीरे से आँखें खोलती है। उसकी नज़र करण पर पड़ती है।
वो खुद को उसकी बाँहों में पाती है।)

सिमरन (धीरे, शर्माते हुए) बोली - 
“करण जी… मैं… मैं आपकी बाहों में…”

(करण मुस्कुराता है, उसकी आँखों में प्यार झलकता है।)

करण (मुस्कराते हुए) बोला - 
“हाँ… और यही सबसे सुरक्षित जगह है तुम्हारे लिए…”

(सिमरन हल्के से मुस्कुरा देती है, पर फिर चेहरा लाल पड़ जाता है।
वो नज़रें झुका लेती है, बाल चेहरे पर गिर जाते हैं।
करण उसकी तरफ देखता है, जैसे पहली बार उसे देख रहा हो।)

करण (धीरे, प्यार से) बोला - 
“तुम्हारी ये मुस्कान… मेरी सबसे बड़ी दवा है, सिमरन।”

(सिमरन शर्माकर उसकी छाती पर सिर रख देती है।
दोनों की साँसें एक लय में चलने लगती हैं।
बाहर बारिश की बूँदें खिड़की पर गिरने लगती हैं — जैसे ज़िंदगी फिर से लौट आई हो।)

“कभी-कभी मौत से भी बड़ी जीत होती है —
किसी का लौट आना, किसी का फिर से मुस्कुराना…”

(सुबह की हल्की धूप खिड़की से अंदर आ रही है।
कमरे में सन्नाटा है — बस पंछियों की चहचहाहट सुनाई दे रही है।
सिमरन बिस्तर पर बैठी है, उसके चेहरे पर अब थोड़ा रंग लौट आया है।
करण उसके लिए सूप लेकर आता है।)

करण (मुस्कुराते हुए) बोला - 
“डॉक्टर ने कहा था अच्छा खाना खाना है…
तो आज मैं खुद बना कर लाया हूँ।”

(सिमरन मुस्कुराती है, उसके होंठों पर हल्की सी शरारत झलकती है।)

सिमरन बोली - 
“आपने?
आप तो कहते थे आपको रसोई में कुछ नहीं आता।”

करण (हँसते हुए) बोला - 
“तुम्हारे लिए तो आग में भी उतर सकता हूँ,
तो रसोई क्या चीज़ है… 
और वैसे भी तुमसे भी अच्छा खाना बना लेता हूं मैं।”

(सिमरन हल्के से हँस देती है।
करण सूप का कटोरा उसके सामने रखता है,
धीरे-धीरे चम्मच से उसे पिलाता है।
दोनों के बीच कुछ पल के लिए खामोशी है — लेकिन बहुत प्यारी खामोशी।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“करण जी… अगर मैं उस रात नहीं बचती तो?”

(करण थोड़ा रुकता है, उसकी आँखें गहरी हो जाती हैं।)

करण बोला - 
“तो शायद मैं भी नहीं रहता…
क्योंकि मेरी दुनिया तुम हो सिमरन।
अब अगर तुम्हारे बिना जीना पड़ा…
तो वो ज़िंदगी नहीं, सज़ा होगी।”

(सिमरन की आँखें भर आती हैं। वो उसका हाथ थाम लेती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“तो वादा करिए करण जी…
अब कभी किसी को चोट नहीं पहुँचाओगे आप।
कभी अपने गुस्से को खुद पर हावी नहीं होने दोगे आप।”

(करण उसकी आँखों में देखता है — गहरी, सच्ची और भरी हुई भावनाओं से।)

करण (गंभीर स्वर में) बोला - 
“वादा करता हूँ सिमरन।
अब ये शक्ति सिर्फ तुम्हारी भलाई और लोगों की रक्षा के लिए इस्तेमाल होगी।
कभी किसी बुराई के लिए नहीं…”

(सिमरन हल्के से मुस्कुरा देती है,
उसके चेहरे पर एक सुकून है — जैसे अब उसे किसी चीज़ का डर नहीं।
करण उसके माथे को चूम लेता है।)

“प्यार ने उसे इंसान बनाया था,
और इंसान ने उसे खुद से बड़ा बना दिया था…”

(अचानक खिड़की के बाहर से ठंडी हवा का तेज़ झोंका आता है।
पर्दे उड़ने लगते हैं। करण की नज़र बाहर जाती है —
दूर जंगल की तरफ काली परछाईं सी हिलती दिखती है।)

करण (धीरे से बुदबुदाता है) - 
“वो… लौट आया है…”

(सिमरन घबराई सी उसकी तरफ देखती है।)

सिमरन बोली - 
“क कौन करण जी?”

(करण का चेहरा सख्त हो जाता है,
आँखों में हल्की सी लाल चमक झलकती है।)

करण (धीरे, दृढ़ आवाज़ में) बोला - 
“वही... जिससे मैंने कभी जंग जीती थी,
पर उसने हार मानी नहीं...
अंधकार फिर लौट आया है, सिमरन।”

(कैमरा धीरे-धीरे बाहर ज़ूम होता है —
जंगल की ओर, जहाँ पेड़ों के बीच एक डरावनी आकृति धुँधले में दिखाई देती है,
और उसकी आँखें लाल चमकती हैं...)

“जहाँ प्यार होता है… वहाँ अंधकार उसे मिटाने की कोशिश ज़रूर करता है…”