Money Vs Me - Part 7 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 7

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Money Vs Me - Part 7

संजना ने जो एड्रेस हमें दिया था, वहाँ पहुँचते ही हमारी गाड़ी एक बेहद पॉश और आलीशान सोसाइटी के सामने आकर रुकी। ऊँची-ऊँची इमारतों और शानदार बंगलों से घिरी उस सोसाइटी का रुतबा दूर से ही महसूस किया जा सकता था। लेकिन जैसे ही हमारी नज़र उस खास बंगले पर पड़ी, जिसके सामने गाड़ी रुकी थी, हम कुछ पल के लिए स्तब्ध रह गए।

वो कोई साधारण बंगला नहीं था, बल्कि किसी राजा-महाराजा के महल से कम नहीं लग रहा था। उसकी भव्यता, उसकी चमक-दमक और उसकी शान देखते ही बनती थी। बंगले की ऊँची संगमरमर से बनी दीवारें, खूबसूरत डिज़ाइन वाला विशाल मुख्य द्वार और चारों तरफ फैली हरियाली उसकी अमीरी की गवाही दे रही थीं।

उस बंगले को देखते ही कुलदीप सेठ के चेहरे का रंग उड़ गया। उनकी आँखें हैरत से फैल गई थीं और माथे पर चिंता की हल्की लकीरें उभर आई थीं। वो कभी बंगले को देखते, कभी एड्रेस वाली पर्ची को और फिर मेरी तरफ।

"य... यही एड्रेस है ना?" उन्होंने हिचकिचाते हुए पूछा।

उनकी आवाज़ में साफ़-साफ़ घबराहट झलक रही थी।

मैंने उनकी तरफ देखा और होंठों के किनारों पर उभरती मुस्कान को बड़ी मुश्किल से दबाया। उनकी बिगड़ती हालत देखकर मेरे अंदर का शरारती इंसान खूब मज़े ले रहा था। मैं जानता था कि इस वक्त उनके दिमाग में न जाने कितने सवाल दौड़ रहे होंगे।

गाड़ी से उतरकर हम धीरे-धीरे बंगले के मुख्य द्वार की ओर बढ़े। जैसे-जैसे हम आगे बढ़ रहे थे, वैसे-वैसे उस जगह की शानो-शौकत और भी स्पष्ट होती जा रही थी।

मुख्य गेट किसी पाँच सितारा होटल के प्रवेश द्वार जैसा भव्य था। गेट के दोनों ओर दो हट्टे-कट्टे वर्दीधारी गार्ड अपनी आधुनिक राइफलों के साथ पूरी सतर्कता से खड़े थे। उनकी निगाहें किसी शिकारी बाज़ की तरह तेज़ थीं।

हमें अपनी ओर आते देख उनमें से एक गार्ड ने दूर से ही हाथ उठाकर रुकने का इशारा किया। उसकी उस हरकत ने मेरे अंदर हल्की झुंझलाहट पैदा कर दी।

"वाह भाई...!" मैंने मन ही मन सोचा, "हमें देखते ही गेट खोलकर सम्मान से अंदर ले जाना चाहिए था, और ये साहब ऐसे पूछताछ कर रहे हैं जैसे हम कोई संदिग्ध व्यक्ति हों।"

गार्ड हमारे सामने आकर रुका और कठोर स्वर में बोला,

"जी, कौन हैं आप लोग?"

मैं कुछ कहता, उससे पहले ही कुलदीप सेठ ने मेरी तरफ देखा, मानो जवाब देने की जिम्मेदारी मेरी हो।

मैंने बिना देर किए कहा,

"हम... संजू बेबी के गेस्ट हैं।"

असल में मुझे कहना था कि हम मीरा जी के मेहमान हैं, लेकिन पता नहीं क्यों उस पल मेरे मुँह से संजना का नाम निकल गया।

और जैसे ही "संजू बेबी" शब्द गार्ड के कानों में पड़े, दोनों गार्डों का व्यवहार पल भर में बदल गया।

उनके चेहरों पर अचानक सम्मान के भाव आ गए।

एक गार्ड तुरंत पीछे हटा और गेट के पास लगे इंटरकॉम का बटन दबाया।

"मैडम... संजना बेबी से मिलने कुछ गेस्ट आए हैं।"

कुछ क्षण तक वह दूसरी तरफ की बात सुनता रहा।

"जी मैडम... ओके मैडम... ठीक है।"

कॉल समाप्त होते ही उसने बिना एक सेकंड गंवाए अपने पास मौजूद इलेक्ट्रॉनिक कंट्रोल पैनल पर एक बटन दबाया।

अगले ही पल हल्की सी यांत्रिक आवाज़ गूँजी।

"टिक..."

और फिर विशाल लोहे का गेट धीरे-धीरे खुलने लगा।

जैसे किसी राजमहल के द्वार किसी विशेष मेहमान के स्वागत में खोले जा रहे हों।

"आप लोग अंदर आ सकते हैं।"

गार्ड ने सम्मान से सिर झुकाकर कहा और स्वयं हमारे साथ चल पड़ा।

लेकिन उस समय मेरा ध्यान उसकी बातों पर नहीं था।

मेरी नज़र तो गेट के पार दिखाई दे रहे उस स्वर्ग जैसे नज़ारे पर अटक गई थी।

गेट के पूरी तरह खुलते ही जो दृश्य मेरी आँखों के सामने आया, उसे देखकर मैं कुछ क्षणों के लिए साँस लेना तक भूल गया।

"हे भगवान...!"

मेरे मन से अनायास ही निकला।

अंदर का नज़ारा किसी लग्ज़री रिसॉर्ट या किसी अरबपति के निजी महल जैसा था।

दोनों तरफ दूर-दूर तक फैले हुए हरे-भरे लॉन, जिनकी घास इतनी सलीके से कटी हुई थी मानो हर पत्ती को हाथ से तराशा गया हो। बीच-बीच में विदेशी फूलों की रंग-बिरंगी क्यारियाँ वातावरण में एक मोहक खुशबू घोल रही थीं।

संगमरमर से बना चौड़ा रास्ता सीधे मुख्य भवन की ओर जा रहा था, जिसके दोनों ओर कलात्मक फव्वारे लगे हुए थे। उन फव्वारों से उठती पानी की चमकती बूँदें सूरज की रोशनी में मोतियों की तरह झिलमिला रही थीं।

और सामने...

सामने खड़ा था वह अद्भुत बंगला।

सफेद संगमरमर से बना हुआ, ऊँचे-ऊँचे खंभों पर टिका, विशाल काँच की दीवारों और शानदार बालकनियों से सजा हुआ।

उसकी भव्यता ऐसी थी कि पहली नज़र में कोई भी उसे बंगला नहीं, बल्कि किसी फिल्मी सुपरस्टार या उद्योगपति का निजी महल समझ बैठता।

मैं बस खामोशी से उस नज़ारे को देखता रह गया।

उस पल मुझे सचमुच ऐसा महसूस हो रहा था जैसे मैं किसी दूसरी ही दुनिया में कदम रख चुका हूँ।
 

एक पल के लिए तो इतनी शानो-शौकत देखकर मेरा भी दिल घबरा गया। अपनी औकात से कहीं बढ़कर ऐसा वैभव और रईसी देखकर मैं भी कुछ देर के लिए सहम गया था। मन में तो यहाँ तक ख्याल आया कि कुलदीप सेठ का हाथ पकड़ूँ और चुपचाप वापस बाहर की तरफ निकल जाऊँ।

लेकिन अगले ही पल मैंने खुद को संभाल लिया।

"नहीं... नहीं। इसी दिन के लिए तो मैंने इतनी मेहनत की है। इतने सपने देखे हैं। अब यहाँ तक आकर पीछे हटने का कोई मतलब नहीं है।"

मैंने मन ही मन खुद को समझाया।

आज रिश्ता तय हो जाएगा और फिर कुछ ही दिनों में शादी भी हो जाएगी।

उसके बाद...

मेरे चेहरे पर अपने आप मुस्कान आ गई।

आखिर मीरा का बाप इतना बड़ा अमीर आदमी है। अपनी बेटी को खाली हाथ तो विदा नहीं करेगा। और कौन जाने, अपनी इकलौती बेटी को अपने से दूर भेजना ही न चाहे। हो सकता है शादी के बाद हमें इसी बंगले में अपने साथ रख ले और मुझे घर-जमाई बना ले।

यह सोचकर मेरे मन में एक अजीब-सी खुशी दौड़ गई।

"वाह... कितना आसान है सब कुछ!"

मैं जागती आँखों से अपने सुनहरे भविष्य के सपने देख रहा था। और कहते भी हैं कि जागती आँखों से देखे गए सपने ही एक दिन सच होते हैं।

मैं अपने ही ख्यालों में खोया हुआ था कि तभी गार्ड की आवाज़ सुनाई दी।

"सर, इधर आइए।"

उसकी आवाज़ सुनकर मैं अपने सपनों की दुनिया से बाहर आया।

मैंने सोचा था कि अब वह हमें सीधे बंगले के अंदर ले जाएगा, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। बंगले के मुख्य हिस्से में ले जाने की बजाय वह हमें साइड में बने एक बड़े से गेस्ट रूम तक ले आया।

दरवाज़ा खोलकर उसने कहा,

"आप लोग यहाँ बैठिए। बड़ी मैडम और संजू बेबी यहीं आकर आपसे मिलेंगी।"

इतना कहकर वह चला गया।

मैंने कमरे के अंदर नज़र दौड़ाई।

गेस्ट रूम भी किसी आम गेस्ट रूम जैसा नहीं था। कमरा काफी बड़ा और खूबसूरती से सजाया गया था। महंगे फर्नीचर, चमचमाता इंटीरियर और हर चीज़ में रईसी साफ दिखाई दे रही थी।

फिर भी मेरे मन में एक सवाल बार-बार उठ रहा था।

हम तो यहाँ रिश्ते की बात करने आए थे। ऐसे में हमें बंगले के ड्रॉइंग रूम में होना चाहिए था। आखिर मेहमानों का स्वागत वहीं किया जाता है।

लेकिन फिर मैंने खुद को समझाया।

"बड़े लोगों की बातें भी बड़ी होती हैं। उनके तौर-तरीके आम लोगों की समझ से बाहर ही होते हैं।"

यह सोचकर मैंने ज्यादा दिमाग लगाना ठीक नहीं समझा।

मैं कुलदीप सेठ के साथ जाकर एक मुलायम सोफे पर बैठ गया और बड़ी मैडम और संजू के आने का इंतज़ार करने लगा। अब मेरे दिल की धड़कनें पहले से कुछ ज्यादा तेज़ हो चुकी थीं, क्योंकि मुझे लग रहा था कि अगले कुछ मिनटों में मेरी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला होने वाला है।

और फिर अचानक मुझे मीरा का ख़याल आ गया।

बस उसका ख़याल आते ही मेरे चेहरे पर एक हल्की-सी मुस्कान फैल गई। कुछ देर पहले तक जो सपने दौलत, बंगले और रईसी के इर्द-गिर्द घूम रहे थे, अब उनमें मीरा भी शामिल हो चुकी थी।

उसकी खूबसूरत आँखें, मासूम मुस्कान और वो प्यारा-सा चेहरा मेरी आँखों के सामने घूमने लगा। मैं सोचने लगा कि शायद कुछ ही दिनों बाद वही लड़की मेरी पत्नी कहलाएगी।

यह ख्याल आते ही मेरे मन में एक अजीब-सी खुशी भर गई।

मैं कल्पनाओं की दुनिया में खोता चला गया।

कभी खुद को मीरा के साथ इस विशाल बंगले के लॉन में टहलते हुए देखता, तो कभी उसकी हँसी की गूँज अपने कानों में महसूस करता। कभी सोचता कि सुबह उठते ही सबसे पहले उसका चेहरा देखूँगा, तो कभी कल्पना करता कि शाम को काम से लौटने पर वह मुस्कुराते हुए मेरा इंतज़ार कर रही होगी।

धीरे-धीरे मेरे सपने और भी रंगीन होते चले गए।

अब उनमें सिर्फ़ दौलत और ऐशो-आराम नहीं था, बल्कि मीरा का साथ भी था। उसकी मौजूदगी उन सपनों को और भी खूबसूरत बना रही थी।

मैं सोफे पर बैठा-बैठा जागती आँखों से अपने आने वाले दिनों की तस्वीरें बनाने लगा। हर तस्वीर में मीरा थी, उसकी मुस्कान थी और एक खुशहाल जिंदगी का सपना था।

इतना खो गया था मैं उन ख्यालों में कि कुछ पलों के लिए भूल ही गया कि मैं कहाँ बैठा हूँ और किस इंतज़ार में हूँ।

मुझे होश तब आया जब बाहर से आती कदमों की हल्की आहट मेरे कानों में पड़ी। लगता था जिस पल का इंतज़ार था, वह अब ज्यादा दूर नहीं था।