Money Vs Me - Part 10 in Hindi Human Science by fiza saifi books and stories PDF | Money Vs Me - Part 10

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Money Vs Me - Part 10

घर आकर मैं कुछ देर कुलदीप सेठ के साथ बैठा रहा। उनके होंठों पर जैसे एक ही बात अटक गई थी—“मीरा बहुत अच्छी लड़की है... सगाई की तारीख कब की रखनी है?” वो लगातार मुझसे बातें किए जा रहे थे और मैं बस खामोश बैठा सुनता रहा। बड़ी मुश्किल से मेरे होंठ हिले और मैं इतना ही कह पाया, “सोचकर बताता हूँ...”

यह कहकर मैं लगभग भागता हुआ अपने कमरे में आ गया। ऐसा लग रहा था जैसे मेरा अपना दिमाग मुझ पर ठहाके लगा रहा हो। मैं इतना बड़ा बेवकूफ कैसे हो सकता था? बिना मीरा के बारे में पूरी सच्चाई जाने, मैंने बात को शादी तक पहुँचने ही कैसे दिया?

अगले ही पल मैं खुद पर कड़वी हँसी हँस पड़ा। मुझे पहले ही समझ जाना चाहिए था कि कोई अमीरज़ादी इतनी आसानी से एक फटीचर इंसान के प्यार में नहीं पड़ती। हालांकि मेरी भी क्या गलती थी? मीरा की सहेलियाँ उसे अपने पैसों पर ऐश करवाती थीं। महंगे कपड़े, ब्रांडेड सैंडल, खूबसूरत पर्स—सब कुछ वहीं से आता था। उसे देखकर कौन कह सकता था कि उसकी असलियत कुछ और है? वो तो बिल्कुल उन्हीं के स्टेटस की लगती थी।

यह सोचकर मेरा खून खौलने लगा। इतने दिनों की मेहनत... इतने सारे सपने... सब एक पल में राख हो गए थे। मैं बस हाथ मलता रह गया।

बेचैनी से कमरे में चक्कर काट रहा था कि तभी मेरा फोन बज उठा। स्क्रीन पर मीरा का नाम चमक रहा था। मैंने उसे नफरत भरी निगाहों से देखा और बिना कॉल उठाए फोन साइलेंट करके एक तरफ फेंक दिया।

नहीं... मैं इस बोझ को अपनी ज़िंदगी का हिस्सा नहीं बना सकता था। यह शादी नहीं, मेरी अपनी बर्बादी होती। अब मीरा मेरे किस काम की थी? मुझे न शादी का कोई शौक था, न किसी पर एहसान करने का। मैं खुद अपनी ज़िंदगी सँभालने के लायक नहीं था, फिर किसी और की ज़िम्मेदारी अपने कंधों पर कैसे उठा लेता?

नहीं... आज के बाद मीरा और मेरे रास्ते हमेशा के लिए अलग थे।

मैं पूरी रात बेचैनी में कमरे में टहलता रहा। मीरा की कॉल बार-बार आती रही, और हर बार अनसुनी रह गई। आखिरकार मैंने फोन पूरी तरह साइलेंट कर दिया। रात गहरा चुकी थी, और उसी अंधेरे में मैंने एक फैसला कर लिया—

इस मुसीबत से छुटकारा पाने का सिर्फ एक ही रास्ता था...

मुझे यहाँ से जाना होगा।

बहुत दूर...

किसी ऐसे शहर में, जहाँ मीरा की याद भी मेरा पीछा न कर सके।

ट्रेन धीरे-धीरे प्लेटफ़ॉर्म को पीछे छोड़ चुकी थी और रात पहले से भी ज़्यादा गहरी होती जा रही थी। खिड़की के बाहर अँधेरे में भागती पटरियों को देखते हुए ऐसा लग रहा था जैसे मैं उस शहर से जुड़ी अपनी हर याद को एक-एक करके पीछे छोड़ता जा रहा हूँ।

कुलदीप सेठ...

उनका रेस्टोरेंट...

मेरी नौकरी...

और यहाँ तक कि मीरा भी।

मेरी ज़िंदगी की पहली बड़ी कोशिश, जिस पर मैंने इतने सपने टाँक दिए थे, बुरी तरह नाकाम साबित हुई थी। मीरा का ख़याल आते ही मेरे भीतर फिर से गुस्से की लहर उठ खड़ी होती। मुझे लगता था उसने अपनी असलियत छिपाकर मेरे साथ धोखा किया था। शायद अगर मैं सच पहले जान जाता तो कभी इस रिश्ते के बारे में सोचता भी नहीं।

मैंने झुँझलाकर नज़रें फेर लीं।

अब इन बातों को सोचने से भी क्या हासिल होने वाला था?

मैंने अपना बैग सिर के नीचे रखा और सीट पर लेट गया। सफ़र लंबा था और रात काफ़ी हो चुकी थी। इस वक़्त मेरा मन किसी नए सवाल या नई चिंता को जगह देने के लिए तैयार नहीं था। मैं बस सो जाना चाहता था... कुछ घंटों के लिए ही सही, दुनिया और उसकी परेशानियों से दूर।

मुझे इस बात से कोई मतलब नहीं था कि सुबह कुलदीप सेठ मुझे ढूँढ़ेंगे या नहीं। मैंने उनका कुछ नहीं लिया था, न ही उन पर मेरा कोई कर्ज़ था। यह सोचकर भी मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ रहा था कि रेस्टोरेंट का हिसाब-किताब कौन संभालेगा या मेरे अचानक गायब हो जाने से वहाँ क्या परेशानी खड़ी होगी।

और मीरा...

उसके बारे में सोचकर भी मैंने अपने दिल को सख़्त कर लिया था।

अगर मेरे यूँ चले जाने से उसे दुख होगा, तो होने दो।

आख़िर उसने भी तो मुझे धोखा दिया था... कम से कम मैं यही मान चुका था।

इन्हीं उलझे हुए ख़यालों और सीने में दबे गुस्से के साथ मैंने आँखें बंद कर लीं। ट्रेन अँधेरे को चीरती हुई अपनी मंज़िल की ओर बढ़ती रही, और मैं अनजाने सफ़र की थकान में कब नींद की आगोश में चला गया, मुझे खुद भी पता नहीं चला।
 
 

कोई मुझे लगातार झकझोर रहा था। मैंने भारी पलकों से आँखें खोलीं तो कुछ पल तक समझ ही नहीं पाया कि मैं कहाँ हूँ। दिमाग अब भी नींद के धुँधलके में डूबा हुआ था।

जब नज़रें साफ़ हुईं तो देखा कि ट्रेन किसी स्टेशन पर खड़ी थी।

न जाने कब से।

डिब्बा लगभग खाली हो चुका था। पुराने यात्री उतर चुके थे और नए यात्री अपनी-अपनी सीटें ढूँढ़ते हुए अंदर आ रहे थे। ऐसा लग रहा था जैसे ट्रेन अपने अगले चक्कर के लिए तैयार खड़ी हो।

मैं कितनी देर सोता रहा था, इसका मुझे अंदाज़ा भी नहीं था।

"अरे बेटा, उठो भी! क्या पूरी ज़िंदगी ट्रेन में घूमने का इरादा है?"

एक बूढ़े आदमी की खीझभरी आवाज़ मेरे कानों में पड़ी।

"कहाँ जाना है तुम्हें? उठो, ये मेरी सीट है।"

मैंने सिर उठाकर उसे घूरकर देखा। जवाब में उसने भी मुझे वैसी ही तीखी नज़र से देखा।

"ऐसे क्या देख रहे हो? चलो उठो!"

मैं बिना कुछ बोले अपनी सीट से उठा, बैग कंधे पर डाला और चुपचाप ट्रेन से नीचे उतर गया। पीछे से उस बूढ़े की बड़बड़ाहट अब भी सुनाई दे रही थी—

"पता नहीं कहाँ-कहाँ से चले आते हैं..."

मैंने ध्यान नहीं दिया।

प्लेटफ़ॉर्म पर काफ़ी चहल-पहल थी। लोगों की भीड़, कुलियों की आवाज़ें, चाय वालों की पुकार और ट्रेनों की सीटी—पूरा स्टेशन ज़िंदगी से भरा हुआ था। दिन काफ़ी चढ़ चुका था।

आदतन मैंने समय देखने के लिए अपनी कलाई पर नज़र डाली...

और अगले ही पल मेरा दिल धक से रह गया।

घड़ी वहाँ थी ही नहीं।

एकाएक मेरे भीतर घबराहट दौड़ गई।

मैंने तुरंत अपनी जेब में हाथ डाला।

खाली।

दूसरी जेब टटोली।

वह भी खाली।

मेरी साँस जैसे अटक गई।

फोन...

गायब।

पर्स...

वह भी नहीं था।

कुछ पल मैं वहीं पत्थर की तरह खड़ा रह गया।

फिर एक कड़वी हँसी मेरे होंठों पर आ गई।

वाह...

क्या कमाल की बेफिक्री थी मेरी।

पूरी रात ट्रेन में इस तरह सोया रहा जैसे दुनिया का सबसे निश्चिंत इंसान हूँ। चोरों ने फोन ले लिया, पर्स ले लिया, घड़ी तक उतार ली... और मुझे खबर तक नहीं हुई।

बस एक बैग बचा था।

शायद इसलिए क्योंकि उसे मैं सिर के नीचे दबाकर सोया था।

लेकिन उसका भी क्या फायदा?

उसमें सिर्फ कुछ कपड़े थे। न पैसे, न कोई ज़रूरी सामान।

यानी इस अजनबी शहर में मैं लगभग खाली हाथ खड़ा था।

न जेब में एक रुपया।

न किसी का पता।

न किसी से कोई पहचान।

मैंने गहरी साँस ली और स्टेशन के बाहर की तरफ़ कदम बढ़ा दिए।

अब जब किस्मत मुझे यहाँ तक घसीट लाई थी, तो आगे का रास्ता भी शायद वही तय करने वाली थी।

लेकिन एक बात तय थी—

मेरी मुश्किलें अभी शुरू हुई थीं।