Devil ki Daastaan - 23 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 23

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Devil की दास्तान - 23

(तेज़ हवाएँ चल रही हैं।
आसमान में बिजली चमक रही है।
सिमरन करण के पास खड़ी है — उसके चेहरे पर डर की लकीरें हैं।
करण की आँखें लाल हो रही हैं, वो कुछ महसूस कर रहा है।)

सिमरन (काँपती आवाज़ में) बोली - 
“करण जी... ये सब क्या हो रहा है?...
ये हवाएँ... ये सन्नाटा... फिर वही डर जैसा...”

(करण धीरे से बोलता है, उसकी आवाज़ भारी और गंभीर है।)

करण बोला - 
“मैं जानता हूँ ये कौन है...”

(सिमरन उसकी ओर देखती है, उलझन में।)

सिमरन बोली - 
“ क कौन?... कौन है करण जी?”

(करण की आँखें धीरे-धीरे चमक उठती हैं — लाल रोशनी फैल जाती है।
वो गहरी साँस लेकर बोलता है:)

करण (दाँत भींचकर) बोला - 
“वही... चुड़ैल...
जिसने तुम्हारी शादी से पहले तुम पर हमला किया था...
जिसे मैंने उस रात भगा दिया था...”

(सिमरन के चेहरे पर डर उतर आता है। उसकी आँखों में वो पुरानी याद झलकती है —
वो रात, जब वो दूसरी बार मौत के करीब पहुँची थी।)

सिमरन (काँपती आवाज़ में) बोलो - 
“मतलब... वो मर नहीं पाई?...”

करण (ग़ुस्से से) बोला - 
“नहीं... वो सिर्फ़ भागी थी...
अब लौटी है... बदला लेने के लिए!”

(तभी एक तेज़ झोंका आता है —
पेड़ों की डालियाँ टूटने लगती हैं, आसमान लाल हो उठता है।
हवा में एक काली परछाई घूमती है और धीरे-धीरे सिमरन के सामने आकर ठहर जाती है।)

(वो चुड़ैल — वही पुराना चेहरा, बिखरे बाल, आँखों से निकलती लाल आग।
उसकी हँसी जंगल में गूंज उठती है।)

चुड़ैल (हँसते हुए, कर्कश आवाज़ में) बोली - 
“तो आखिर मिल ही गए...
मेरा अधूरा बदला पूरा करने!”

(सिमरन डर के मारे करण के पीछे छिप जाती है।
करण आगे बढ़ता है, उसकी आँखों में ग़ुस्सा है।)

करण (गरजकर) बोला - 
“मैंने तुम्हे उस रात भी रोका था...
आज फिर कह रहा हूँ — सिमरन से दूर रहो!”

(चुड़ैल उसकी तरफ़ तिरछी मुस्कान के साथ देखती है।)

चुड़ैल (धीरे, ज़हरीले लहज़े में) बोली - 
“तुम्हारे अंदर का शैतान तो अब इंसान बनता जा रहा है करण
उस रात में मैने तुमसे यही बोला था कि इस लड़की का आधा आधा खून बांट लेंगे। तब तुमने बोला था मैं अपना शिकार किसी के साथ नही बांटता। और अभि उसी शिकार से शादी भी कर ली।...
पर याद रख — तेरी नसों में अब भी अंधेरा बहता है...
और मैं उस अंधेरे की रानी हूँ।”

(करण गुर्राता है, उसकी आँखों से लाल चमक निकलती है।
हवा में बिजली कड़कती है।)

करण (चीखते हुए) बोला - 
“तुम चाहे रानी हो या राक्षसी...
पर सिमरन अब मेरी दुनिया है!”

(चुड़ैल हँसती है — हवा में घूमती है और अचानक उसकी परछाई कई हिस्सों में बँट जाती है —
हर दिशा से एक-एक चुड़ैल की आकृति उभरने लगती है।)

सिमरन (डरते हुए) बोली - 
“करण जी... ये क्या हो रहा है?”

करण (दाँत भींचते हुए) बोला - 
“वो अपने रूप बाँट रही है...
अब ये लड़ाई आसान नहीं होगी…”

आसमान में लाल बादल, हवा में गूंजती चुड़ैल की हँसी,
और करण की आँखों में जलती आग —
दोनों के बीच अब शुरू होने वाला है —
“प्यार और प्रेत” का सबसे भयानक युद्ध...)

बिजलियाँ कड़क रही हैं।
हवा में राख और धुएँ का मिश्रण उड़ रहा है।
चुड़ैल हवा में तैर रही है — उसके हाथों में काला धुआँ घूम रहा है।
सिमरन करण के पीछे खड़ी काँप रही है।)

चुड़ैल (कर्कश हँसी के साथ) बोली - 
“कहा था न करण...
तुम्हारा अंधेरा कभी नहीं मिटेगा...
मैं वही लौटी हूँ — तुम्हारे भीतर के शैतान को जगाने!”

(वो अपने हाथ उठाती है, और ज़मीन हिलने लगती है।
काले धुएँ की लहरें करण के चारों ओर घूमने लगती हैं।)

सिमरन (चीखते हुए) बोली - 
“नहीं!! करण जी!! भागिए यहाँ से!!”

(करण उसे पीछे धकेलता है।)

करण (दर्द भरी आवाज़ में) बोला - 
“सिमरन... पीछे हटो! आज मैं इसे खत्म कर दूँगा!”

(चुड़ैल अचानक एक मंत्र बोलती है —)

चुड़ैल (मंत्र उच्चारण में) बोली - 
“काली छाया, मेरे शब्दों की लपट बन जा,
शैतान की नसों में फिर से ज़हर भर जा!”

(काले धुएँ की एक तेज़ लहर करण के सीने में जा घुसती है।
वो ज़मीन पर गिर पड़ता है। उसकी आँखें एक पल को बंद हो जाती हैं।
सिमरन भागकर उसके पास आती है।)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
“करण जी! कुछ बोलिए... प्लीज़ कुछ बोलिए!”

(करण धीरे-धीरे अपनी आँखें खोलता है ।
उसकी साँसें भारी और गहरी हैं।
उसका चेहरा डरावना होता जा रहा है।)

चुड़ैल (हँसते हुए) बोली - 
“देखा?... ये है असली करण...
मेरा शैतान... मेरी रचना!”

(सिमरन पीछे हटती है, डर से काँप रही है।)

सिमरन बोली - 
“नहीं... तू तुम झूठ बोल रही हो...
मेरे करण जी ऐसे नहीं हैं...”

(करण उठता है, लेकिन अब उसकी चाल अलग है।
उसके चेहरे पर इंसानियत नहीं, क्रोध और अंधेरा है।
वो चुड़ैल की ओर देखता है, मगर आवाज़ भारी और ठंडी है।)

करण बोला - 
“मैं... कौन हूँ?... इंसान?... या शैतान?...”

(सिमरन उसके पास आती है, आँसू भरे चेहरे से उसके गाल छूती है।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“आप वही हो... जिसने मुझे मौत से बचाया था...
आप वही हो, जिसने भगवान से मेरी ज़िंदगी माँगी थी...
आप शैतान नहीं — मेरे करण जी हो...”

(चुड़ैल ग़ुस्से से चीखती है।)

चुड़ैल बोली - 
“उसका दिल मत जगाओ, सिमरन!!
वो जितना तुमसे जुड़ेगा, उतनी उसकी आत्मा टूटेगी!”

(सिमरन चिल्लाती है —)

सिमरन (आवाज़ ऊँची करते हुए) बोली - 
“फिर टूट जाने दो!
प्यार का मतलब ही तो यही है — खुद को मिटा देना किसी के लिए!”

(चुड़ैल ग़ुस्से में आग की लपटें छोड़ती है।
सिमरन करण के सामने खड़ी हो जाती है —
लपटें उस पर गिरती हैं, मगर करण उसके सामने आकर सब रोक लेता है।)

करण (गरजते हुए) बोला - 
“बस!!! बहुत हो गया!!!”

(वो ज़मीन पर मुक्का मारता है — बिजली गिरती है।
चुड़ैल कुछ पीछे हटती है।
करण के शरीर से दो रंग की आभा निकलती है —
एक लाल (शैतान की), और एक सफेद (मानव की)।
दोनों आपस में टकरा रही हैं।)

करण (दर्द में चिल्लाते हुए) बोला - 
“मैं अब न तुम्हारा हूँ...
न इस इंसानी लड़की का ..."


(एक तेज़ प्रकाश फैलता है — चुड़ैल चीखती है और गायब हो जाती है।
सिमरन ज़मीन पर बैठ जाती है, और करण बेहोश होकर गिर पड़ता है।
हवा शांत हो जाती है...
सिर्फ़ सिमरन की सिसकियाँ गूंजती हैं।)

.रात के आखिरी पहर।
मंदिर के बाहर धीमी हवा चल रही है।
सिमरन ज़मीन पर बैठी है, करण का सिर उसकी गोद में है।
उसकी आँखें अब भी बंद हैं।
चारों ओर राख और टूटे पत्ते बिखरे हुए हैं।)

(धीरे-धीरे करण की उँगलियाँ हिलती हैं।
उसकी साँसें तेज़ होती हैं।
सिमरन खुश होकर बोल उठती है —)

सिमरन (रोते हुए) बोली - 
“करण जी! आपको होश आ गया! भगवान का शुक्र है!”

(करण धीरे-धीरे आँखें खोलता है।
उसकी आँखें अब सामान्य नहीं —
गहरे लाल, जैसे आग में तपे हुए हों।
उसका चेहरा कठोर और भावहीन है।)

सिमरन (डरते हुए) बोली - 
“करण जी...?”

(करण कुछ नहीं बोलता।
वो उसे घूरता है — जैसे उसे पहचानने की कोशिश कर रहा हो।)

करण (ठंडी, भारी आवाज़ में) बोला - 
“तुम कौन हो?... और मैं यहाँ क्यों हूँ?”

(सिमरन की मुस्कान रुक जाती है।
वो अचंभित रह जाती है।)

सिमरन (टूटे स्वर में) बोली - 
“करण जी... मैं सिमरन हूँ... आपकी सिमरन... आपकी पत्नी...”

(करण पीछे हटता है, उसके चेहरे पर गुस्सा उभर आता है।)

करण (गर्जना करते हुए) बोला - 
“झूठ मत बोलो!
मैं किसी इंसान को नहीं जानता!
मैं... शैतान हूँ... इंसानों से मेरा कोई नाता नहीं!
शादी तो दूर की बात।”

(सिमरन के हाथ काँप जाते हैं।
उसकी आँखों में आँसू भर आते हैं।)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“नहीं करण जी... आप ऐसे नहीं थे...
आपने मेरे लिए मौत से लड़ाई लड़ी थी...
आपने भगवान से मेरी ज़िंदगी माँगी थी...”

(करण हँसता है — पर वो हँसी ठंडी और खौफनाक है।)

करण बोला - 
“भगवान?... वो मेरे दुश्मन हैं...
तुम्हें पता नहीं है क्या हम शैतानों को मंदिर में घुसते ही करेंट लगता है।
अब मैं वही करूँगा जिसके लिए पैदा हुआ था — विनाश।”

(वो अपनी मुट्ठी बंद करता है —
ज़मीन में दरारें पड़ जाती हैं।
पेड़ों की शाखाएँ हिलने लगती हैं।)

सिमरन (आँसू पोंछते हुए) बोली - 
“आपको याद आएगा करण जी...
आपको सब याद आएगा... हमारा प्यार, हमारी बातें, सबकुछ...”

(वो उसकी तरफ़ बढ़ती है —
करण एक झटके में उसका हाथ पकड़ लेता है, इतनी ज़ोर से कि सिमरन कराह उठती है।)

करण (क्रोध में) बोला - 
“पास मत आना!
तुम्हारी जैसी कमजोरियाँ ही मुझे कमज़ोर नहीं बना सकती हैं!”

(वो उसका हाथ झटक देता है।
सिमरन ज़मीन पर गिर पड़ती है।)

“वो जो किसी के लिए दुनिया से लड़ गया था,
आज उसी को पहचान नहीं पा रहा था...
प्यार की जगह अब उसके दिल में बस आग थी —
विनाश की, नफ़रत की...”

(सिमरन धीरे से ज़मीन से उठती है, काँपती हुई आवाज़ में बोलती
है —)

सिमरन बोली - 
“अगर आपके अंदर अब भी ज़रा-सी इंसानियत बाकी है...
तो मैं उसे वापस लाऊँगी...
चाहे इसके लिए मुझे फिर से मरना ही क्यों न पड़े।”

(करण उसकी तरफ़ मुड़ता है —
उसकी आँखों में अंधेरा और चमक दोनों हैं।)

करण (ठंडी हँसी के साथ) बोला - 
“मरने की आदत डाल लो, सिमरन...
क्योंकि अब जो ज़िंदा है — वो करण नहीं, एक शैतान है।”

(वो हवा में कूदकर उड़ जाता है,
चारों ओर राख और आँधी छा जाती है।
सिमरन अकेली रह जाती है, उसके आँसू हवा में उड़ते हैं।)