The Wings of Time and the Teachings of the Father in Hindi Moral Stories by Anant Dhish Aman books and stories PDF | समय के पंख और पिता की सीख

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समय के पंख और पिता की सीख

बचपन की स्मृतियाँ अक्सर जीवन के किसी मोड़ पर अचानक लौट आती हैं और फिर मन को उन गलियों में ले जाती हैं जहाँ से हमारे व्यक्तित्व की यात्रा शुरू हुई थी।आज जब मैं अपने जीवन के अनेक उतार-चढ़ावों को पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो मुझे अपने बचपन की एक छोटी-सी घटना बहुत गहराई से याद आती है।

मैं दूसरी कक्षा में पढ़ता था। हमारी पाठ्यपुस्तक में "समय" नाम की एक कहानी थी। कहानी तो अपनी जगह थी, लेकिन उससे भी अधिक मेरा ध्यान उसके साथ बने एक चित्र ने खींचा था। उस चित्र में एक विचित्र आकृति दिखाई गई थी—सिर के आगे कुछ बाल थे और पैरों में पंख लगे हुए थे। बालमन के लिए वह चित्र किसी पहेली से कम नहीं था। मैं उसे देर तक देखता रहा और अंततः अपनी जिज्ञासा लेकर पिताजी के पास पहुँचा।

मैंने पूछा, "पिताजी, यह कैसा चित्र है? इसके सिर पर थोड़े-से बाल क्यों हैं और पैरों में पंख क्यों लगे हैं?"पिताजी ने बड़े धैर्य से मेरी ओर देखा और कहा, "बेटा, यह समय का चित्र है। समय के सिर के आगे बाल इसलिए बनाए गए हैं कि जब वह सामने से आए, तो उसे पकड़ लिया जाए। लेकिन पीछे उसका सिर गंजा होता है, इसलिए एक बार निकल जाने के बाद उसे पकड़ा नहीं जा सकता। और उसके पैरों में पंख इसलिए हैं क्योंकि समय कभी रुकता नहीं, वह हमेशा उड़ता रहता है।

"उनकी यह बात सुनकर मैं कुछ देर तक उस चित्र को देखता रहा। उस समय शायद मैं उस सीख की गहराई को पूरी तरह नहीं समझ पाया था, लेकिन वह बात मेरे मन में कहीं स्थायी रूप से अंकित हो गई। वर्षों बीत गए, कक्षाएँ बदलीं, शहर बदले, परिस्थितियाँ बदलीं, लेकिन पिताजी के वे शब्द कभी नहीं बदले।आज सुबह ही पिताजी से फोन पर बात हुई थी। हमेशा की तरह उन्होंने आशीर्वाद दिया, कुशलक्षेम पूछा और जीवन में आगे बढ़ते रहने की प्रेरणा दी।

बातचीत समाप्त हो गई, लेकिन दिन भर उनके शब्द मेरे भीतर गूँजते रहे। फोन रखते समय मैं उनसे यह नहीं कह पाया कि उनकी एक छोटी-सी सीख ने मेरे पूरे जीवन की दिशा तय कर दी। शायद कुछ बातें कहने से अधिक महसूस करने के लिए होती हैं।जब मैं अपने जीवन की यात्रा पर दृष्टि डालता हूँ, तो पाता हूँ कि समय ने मुझे बहुत कुछ सिखाया है। 

समय ने मुझे कभी आराम की गोद में अधिक देर तक नहीं बैठने दिया। परिस्थितियों की आँधियाँ आईं, संघर्षों के बादल छाए, कई बार रास्ते धुँधले दिखाई दिए, लेकिन समय ने मुझे भटकने नहीं दिया। उसने हर कठिन मोड़ पर मुझे एक नई दिशा दिखाई।मैं यह दावा नहीं करता कि मेरी यात्रा आसान रही है। ऐसे भी दिन आए जब जेब लगभग खाली थी। लगातार पाँच वर्षों तक मैंने आर्थिक अभावों के साथ जीवन बिताया। कई इच्छाएँ थीं जिन्हें पूरा नहीं कर सकता था। कई सपने थे जिन्हें केवल आँखों में सजाकर रखना पड़ता था। लेकिन उन वर्षों ने मुझे एक अमूल्य शिक्षा दी—जीवन केवल पैसों से नहीं चलता, बल्कि विश्वास, धैर्य और संकल्प से चलता है।

मैंने देखा कि जो व्यक्ति केवल धन के पीछे भागता है, वह अक्सर जीवन की सुंदरता खो देता है। मैंने धन को लक्ष्य नहीं, बल्कि साधन माना। शायद यही कारण है कि जब अवसर आए, तो मैं उन्हें पहचान सका। मैंने समय को सामने से पकड़ने का प्रयास किया, जैसा पिताजी ने सिखाया था। परिणामस्वरूप जो चाहा, उसे पाने का साहस और क्षमता दोनों विकसित होती गईं।

मुझे हमेशा ऐसा लगा कि मैं अपनी उम्र से कुछ कदम आगे चलने का प्रयास करता रहा हूँ। जहाँ मेरे हमउम्र लोग केवल वर्तमान को देख रहे थे, वहाँ मैं भविष्य की तैयारी में लगा रहता था। कई बार लोगों ने मेरे निर्णयों को समझा नहीं, कई बार मेरी सोच पर प्रश्न उठाए, लेकिन मैंने अपने भीतर के विश्वास को कमजोर नहीं होने दिया।इन सबके बीच यदि कोई शक्ति मेरे साथ सबसे अधिक खड़ी रही, तो वह थी प्रेम की शक्ति। विशेष रूप से माता पिता का प्रेम।

जीवन में समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, संबंधों की परिभाषाएँ बदल जाती हैं, लेकिन सच्चा प्रेम मनुष्य को भीतर से मजबूत बनाता है। मैंने अनुभव किया है कि समय का परिवर्तन उतना पीड़ादायक नहीं होता, जितना प्रेम का बदल जाना होता है। जब प्रेम स्थिर रहता है, तब कठिन से कठिन समय भी कट जाता है। लेकिन यदि प्रेम ही डगमगा जाए, तो उजला समय भी अंधकारमय लगने लगता है।

आज मैं जिस स्थान पर खड़ा हूँ, वहाँ पहुँचने में मेरे प्रयासों का योगदान अवश्य है, लेकिन उससे कहीं अधिक योगदान उन संस्कारों का है जो मुझे अपने पिता से मिले। उनका विश्वास, उनका स्नेह, उनकी सीख और उनका आशीर्वाद मेरे जीवन की सबसे बड़ी पूँजी हैं।मैंने जीवन में अनेक लोगों को आते-जाते देखा। कुछ साथ चले, कुछ रास्ते बदलकर चले गए। कुछ ने सहयोग दिया, कुछ ने परीक्षा ली। लेकिन मैंने कभी किसी को अपने आत्मविश्वास से खेलने की अनुमति नहीं दी। मैंने अपने जीवन की पतवार स्वयं संभाले रखी। और समय को भी यह अवसर नहीं दिया कि वह मुझे पराजित कर सके।आज जब पीछे मुड़कर देखता हूँ, तो ऐसा लगता है कि समय अब मेरे विरुद्ध नहीं, मेरे साथ चल रहा है। जैसे कोई पुराना मित्र, जो मेरी यात्रा का साक्षी रहा हो। वह मुझे आगे बढ़ने के लिए प्रेरित करता है और हर दिन यह याद दिलाता है कि अभी भी बहुत कुछ करना बाकी है।पिताजी की वह छोटी-सी सीख आज भी मेरे जीवन का सबसे बड़ा सूत्र है—समय को हमेशा सामने से पकड़ो, क्योंकि एक बार वह निकल गया तो फिर लौटकर नहीं आता।

और शायद इसी कारण आज भी मैं हर नए दिन का स्वागत उसी उत्साह से करता हूँ, जैसे कोई यात्री अपनी अगली मंजिल की ओर पहला कदम बढ़ाता है।समय बदलता है, परिस्थितियाँ बदलती हैं, संसार बदलता है; लेकिन पिता की सीख और प्रेम मनुष्य के जीवन में वह दीपक हैं, जिनकी रोशनी कभी कम नहीं होती।— अनंत धीश अमन