Devil ki Daastaan - 28 in Hindi Women Focused by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Devil की दास्तान - 28

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Devil की दास्तान - 28

(शाम का वक्त है। हल्की बारिश हो रही है। सड़क किनारे एक पुरानी लकड़ी की बेंच पर सिमरन बैठी है।
उसका चेहरा भीगा हुआ है — बारिश से भी, और आँसुओं से भी।)

(उसके बाल बिखरे हुए हैं, होंठ काँप रहे हैं।
वो अपनी गोद में रखे छोटे बैग को कसकर पकड़े हुए है —
जैसे वही अब उसकी आख़िरी पहचान हो।)

सिमरन (धीरे-धीरे खुद से, रुँधी आवाज़ में) बोली - 
“कितना आसान था सब उनके लिए...
एक दिन में सब भूल गए... और मैं...”
(आँखों से आँसू गिरते हैं)
“मैं आज भी उनकी वही सिमरन हूँ... वही जो उनकी परवाह करती है...”

(पास से गाड़ियाँ निकलती हैं, कोई उसकी तरफ ध्यान नहीं देता।
वो उठती है, धीरे-धीरे कदम बढ़ाती है।
कदम भारी हैं, दिल टूटा हुआ है।)

(कुछ देर बाद — वो एक पुराने फ्लैट के सामने खड़ी है।
वो दरवाज़ा जिसे उसने सालों पहले छोड़ा था।)

(वो हाथ बढ़ाकर दरवाज़े को छूती है — जैसे कोई पुराना रिश्ता महसूस कर रही हो।)

सिमरन (धीरे से मुस्कुराकर) बोली - 
“यहीं से तो सब शुरू हुआ था...
और शायद... यहीं खत्म भी।”

(वो अंदर जाती है। कमरा पुराना, पर अभी भी उसकी यादों से भरा हुआ है।
दीवार पर वही फोटो टंगी है — जिसमें वो हँस रही थी, उस वक्त जब सब ठीक था।)

(सिमरन बिस्तर पर बैठ जाती है।
फोटो की तरफ देखती है और धीरे से बोलती है)

सिमरन बोली - 
“आपको याद नहीं...
पर मुझे सब याद है करण जी...
हर बात... हर पल...”

(उसकी आँखों से आँसू बहते हैं।
वो फिर धीरे से उठती है और आईने के सामने खड़ी होती है।)

सिमरन (धीरे से खुद से) बोली - 
“नहीं... मैं हार नहीं मानूँगी...
वो चाहे भूल गए हों, पर मैं उन्हें फिर से याद दिलाऊँगी...
क्योंकि मैं सिर्फ उसकी बीवी नहीं... उसकी आत्मा का हिस्सा हूँ।”

(वो अपनी पुरानी ऑफिस आईडी कार्ड उठाती है —
जिस पर लिखा है “ ai engineer Simran thakur – Personal employee to senior ai engineer (Karan shuryvanshi)”.)

(उसकी आँखों में एक नई चमक आ जाती है।)

सिमरन (मुस्कुराकर) बोली - 
“वो घर में नहीं पहचानते मुझे...
पर ऑफिस में तो जरूर मिलेंगे...
जहाँ मैं उनकी ‘पर्सनल एम्प्लॉयी’ थी...”

(वो बारिश में बाहर निकलती है, भीगी सड़कों पर चलते हुए।
उसके कदम धीमे हैं, लेकिन अब उनमें एक दृढ़ता है।)

“कभी-कभी मोहब्बत की राहें आसान नहीं होतीं...
पर जब दिल सच्चा हो — तो किस्मत भी झुक जाती है।”

( सिमरन ऑफिस बिल्डिंग के सामने खड़ी है,
जहाँ सब शुरू हुआ था... और अब वही उसकी मंज़िल है।)

सुबह का वक्त है। करण अपने घर के ड्राइंग रूम में बैठा है।
टेबल पर मोबाइल रखे हुए, माथे पर शिकनें हैं।)

फोन बजता है।
(स्क्रीन पर लिखा है — “Office HR Dept.”)

करण (थोड़ा झुंझलाकर) बोला - 
“हैलो… हाँ बोलो…”

(फोन के उस पार से कोई महिला आवाज़ आती है)

आवाज़ बोली - 
“Sir, आपको आज आना था न? Board meeting scheduled है at 11 AM.”

करण (हैरान होकर) बोला - 
“Office?... मैं… मैं office भी जाता था?”
(रुककर)
“मुझे कुछ याद क्यों नहीं आता…”

(वो माथा दबाता है, फिर गहरी सांस लेकर उठता है।)

करण (धीरे से खुद से) बोला - 
“शायद वहाँ जाने से कुछ याद आ जाए…”

ऑफिस बिल्डिंग

(Karan Suryavanshi का नाम बोर्ड पर चमक रहा है।
लोग आदर से झुकते हैं, पर करण की आँखों में सिर्फ उलझन है।)

(वो अपने केबिन में पहुँचता है। दरवाज़ा खोलते ही उसकी नज़र सामने वाले डेस्क पर पड़ती है —
जहाँ सिमरन फाइल्स में कुछ नोट कर रही होती है।)

(दोनों की नज़रें टकराती हैं —
कमरा जैसे कुछ पल के लिए जम जाता है।)

करण (गुस्से में, दबी आवाज़ में) बोला - 
“तुम… तुम यहाँ भी आ गईं?”

(सिमरन धीरे से खड़ी होती है, चेहरे पर हल्की मुस्कान लेकिन आवाज़ दृढ़)

सिमरन बोली - 
“‘यहाँ भी’ मतलब, मिस्टर सूर्यवंशी! oh sorry! मेरा मतलब sir?
मैं तो पहले से यहीं थी… आपकी पर्सनल एम्प्लॉयी के रूप में।”

(करण भौंहें चढ़ाता है, थोड़ा पीछे हटता है।)

करण बोला - 
“पर्सनल एम्प्लॉयी?...”

सिमरन (आँखों में सच्चाई लेकर) बोली - 
“जी हाँ… और अब सिर्फ आपकी एम्प्लॉयी नहीं…
आपकी लाइफ पार्टनर भी हूँ।
आपको अगर वो याद नहीं, तो कोई बात नहीं।
पर अपने काम से मैं कोई समझौता नहीं करूँगी,
ना तब किया था, ना अब करूँगी — sir।”

(उसके लहजे में वो पुरानी सिमरन की झलक थी —
जिससे करण कभी प्यार करता था।)

करण (हल्की हँसी के साथ, पर तंज भरे लहजे में) बोला - 
“वाह… बहुत कॉन्फिडेंट हो तुम, मिसेज़…
क्या नाम बताया तुमने?”

सिमरन (आँखों में आँसू छलकते हुए पर होंठ मुस्कुरा उठते हैं) वो बोली - 
“मिसेज़ सूर्यवंशी या आप बोलें तो मिस ठाकुर।”

(करण पल भर के लिए रुकता है — जैसे दिमाग़ में कुछ चुभ गया हो।
वो नाम सुनते ही चेहरा थोड़ा ढीला पड़ता है।
पर फिर सँभल जाता है।)

करण (कठोर स्वर में) बोला - 
“ठीक है, मिस ठाकुर…
जो करना है करो… बस मुझे परेशान मत करना।”

(वो फाइल उठाता है, अपनी कुर्सी पर बैठ जाता है।
पर उसकी आँखें एक पल को सिमरन की तरफ टिक जाती हैं —
कुछ अजीब-सा एहसास, जैसे दिल कुछ याद करने की कोशिश कर रहा हो।)

(सिमरन अपने डेस्क पर बैठती है, चुपचाप मुस्कुराती है —
जैसे खुद से कह रही हो)

सिमरन (धीरे से) बोली - 
“आप भूल गए हैं करण जी…
पर मैं आपको फिर से याद दिलाऊँगी कि हम कौन हैं… एक-दूसरे के लिए।”

( करण की आँखों में हल्का कंपन,
और सिमरन के चेहरे पर उम्मीद की झलक।)

ऑफिस का माहौल व्यस्त है — कर्मचारी आ जा रहे हैं, फोन बज रहे हैं।
करण अपनी कुर्सी पर बैठा है, पर दिमाग कहीं और भटका हुआ है।)

"कभी-कभी यादें गुलज़ार नहीं होतीं —
वो टुकड़ों में आती हैं, धँसी-धँसी, डराती हुई।
करण के दिमाग़ में आज वही काँच के टुकड़े ज्यों-त्यों कटते जा रहे थे।"

🔻 फ़्लैशबैक (टुकड़ों-टुकड़ों में)

इमेज 1: एक मासूम-सा चेहरा — गोल-मटोल, डरती हुई आँखें। कोई लड़की सिर झुका रही है।
आवाज़ (धीमी, सुसराई हुई): "Insaan ka khoon bahut meetha hota hai..."

इमेज 2: वही आदमी (करण?) अपनी कार चला रहा है। रात है। सड़क पर बूँदें टपक रही हैं। पीछे सीट पर कोई हल्का हिल-डुल रहा है। उस पर लाल धब्बे। लड़की डर कर चुप है।
आवाज़ (धुँधली, अपने-आप में): "Bas thoda sa… bas ek boond…"

इमेज 3: कार किसी के घर के बाहर रुकती है। दरवाज़े पर एक झलक — घर की खिड़की से रोशनी आती है। वो लड़की उतरती है, काँपते हुए कदम। एक हाथ उसे सहला कर रोकता है — पर चेहरा स्पष्ट नहीं दिखता।

(फ्लैशबैक जल्दी-तेज़ कटते हैं — चकमकाती लाल आँखें, दाँत, खून की बूंदें, फिर अँधेरी सड़क।)

(Present time....
ऑफिस। करण की सांसें तेज़ हैं। उसकी हथेलियाँ काँप रही हैं, वो उठता है और खिड़की की ओर चलता है।)

करण (अपने आप से, घबराहट में):
"ये क्या थे... मैं किससे बात कर रहा था...? कौन थी वो...? क्यों वो आवाज़ बार-बार मेरे कानों में गूँजती है — ‘insaan ka khoon meetha’...?"

(उसके हाथ सख्ती से कुर्सी के किनारे थम जाते हैं। उसकी नजरें कागज़ पर, कंप्यूटर स्क्रीन पर कुछ धुंधलका सा दिखती है — पर दिमाग़ कुछ याद नहीं कर पाता।)

"यादें आना और याद न रहना — दोनों का दर्द अलग होता है।
करण के भीतर एक अधूरा डर पल रहा था — कुछ उसने किया होगा, पर क्या?"

(सिमरन पास वाले डेस्क से उसकी तरफ देखती है। उसकी आँखों में चिंता है। वह धीरे-धीरे उसके पास आती है।)

सिमरन (धीमे, पर चिंता भरे स्वर में) बोली - 
"करण जी... आप ठीक तो हैं? आपके चेहरे पर कुछ... कुछ तो हुआ है।"

(करण झट से पलटता है — उसकी आँखों में वही धुँधलापन।)

करण (काँपते स्वर में) बोला - 
"नहीं... नहीं, मुझे कुछ भी याद नहीं आ रहा... बस... छोटे-छोटे टुकड़े— एक कार, एक डरती लड़की, खून... पर पूरा चेहरा नहीं... पूरा सच नहीं।"

सिमरन (धीरे से, सहानुभूति भरे स्वर में) बोली - 
"शायद... शायद वही आपको डराते हैं क्योंकि आपके दिल में उनका असर है।
बस शांत रहिए, हम साथ सब ठीक कर लेंगे।"

(करण का चेहरा कठोर हो जाता है। उसकी आँखों में एक अजीब सी ललचाहट झलकती है — और तुरन्त वह उसे दबा देता है।)

करण (कमकशी से मुस्कुराकर) बोला - 
"ठीक है... बस... काम पर वापस चलो।"

(करण अपने कमरे में बैठता है, दरवाज़ा बंद कर लेता है। कमरे में अँधेरा सा उतर आता है। वो आईने के सामने खड़ा होता है — अपना प्रतिबिंब देखता है, और दाँत पीसता हुआ कहता है:)

करण (धीरे से, अपने आप से) बोला - 
"कौन थी वो लड़की?... क्या मैंने कभी उसे चोट पहुँचाई थी?
क्यों मुझे आवाज़ आती है कि 'insaan ka khoon meetha hota hai' — और क्यों मेरे हाथ... मेरे हाथ खून के आदी हैं जैसे?"

(वो कुर्सी पर गिर बैठता है। आँखों से आँसू नहीं, मगर पसीना छलकता है।)

"यादें भले ही अधूरी हों, पर उनमें जो गंध हो — वो दिल से नहीं जाएगी।
करण उस गंध के पीछे भाग रहा था — पर खुद को खोज न पा रहा था।"

(करण खिड़की के पास खड़ा, बाहर देखता है — सड़क पर एक कार गुजरती है, रेड लाइट चमकती है, और कुछ क्षण के लिए उसे वही धड़कन फिर सुनाई देती है।
वो आँखें बंद करता है — पर कोई उत्तर नहीं मिलता।)

"उसके पास या तो सच का सामना करने का साहस था — या फिर भूल जाने की ज़हरली राहत।
पर वह वक्त अब तय करेगा कि वह किसे चुनेगा — अतीत की सच्चाई या वर्तमान की मोहब्बत।"

जब करण को ऐसा लगा कि उसे अकेले घर में बेचैनी होती है । तो वो सिमरन को अपने साथ अपने घर वापस ले आया।