Bayaan - Part 15 in Hindi Love Stories by Radha rani Jha books and stories PDF | Bayaan - Part 15

Featured Books
Categories
Share

Bayaan - Part 15

Part 15 

डायरी का अगला पन्ना खोलते ही मेरे मन में एक अजीब-सी घबराहट होने लगी। न जाने क्यों, अब मुझे हर नया पन्ना खोलने से पहले डर लगने लगा था। ऐसा लगता था कि इस डायरी में जो कुछ लिखा है, वह सिर्फ़ राधा रानी की कहानी नहीं है... बल्कि किसी तरह मेरे दिल को भी छू जाता है। मैं खुद को बार-बार समझाती कि यह सिर्फ़ एक कहानी है, लेकिन फिर भी न जाने क्यों इन पन्नों से खुद को अलग नहीं कर पा रही थी।

"दीपावली के कुछ दिन बाद..."

अब हमारी बातें रोज़ होने लगी थीं।

लेकिन एक परेशानी थी।

फोन मेरा नहीं था।

वह मम्मी का फोन था।

इसलिए मैं सिर्फ़ शाम लगभग छह बजे ही उनसे बात कर पाती थी।

बाकी पूरे दिन बस इंतज़ार।

इसी बीच मम्मी ने कहा कि हमें कुछ दिनों के लिए सिमरिया जाना है।

मैं बहुत खुश हो गई।

मुझे लगा...

वहाँ घर के काम कम होंगे।

थोड़ा समय मिलेगा।

और मैं अभिन्नव से खुलकर बात कर पाऊँगी।

मैंने उन्हें भी यही बताया।

उन्होंने भी खुशी जताई।

अगले दिन सुबह मैंने जल्दी उठकर स्नान किया।

सब काम निपटाए और चुपचाप फोन लेकर बैठ गई।

थोड़ी ही देर बाद उनका मैसेज आया।

उस दिन हमने घंटों बातें कीं।

पढ़ाई...

घर...

बचपन...

सपने...

और भविष्य।

बातों-बातों में मैंने उनसे एक वादा भी कर दिया।

"चाहे कुछ भी हो जाए... मैं आपको कभी छोड़कर नहीं जाऊँगी।"

उन्होंने सिर्फ़ एक दिल वाला इमोजी भेजा।

लेकिन शायद...

उन्हें भी मेरे इस वादे पर उतना ही भरोसा था जितना मुझे।

काश...

मुझे पता होता कि अगले ही दिन मेरी सबसे कठिन परीक्षा शुरू होने वाली है।

उस रात मैं पानी लेने के लिए बाहर गई थी।

फोन कमरे में ही रह गया।

उसी समय अभिन्नव का मैसेज आया।

मम्मी ने स्क्रीन पर उनका नाम देख लिया।

बस...

वहीं से सब बदल गया।

उन्होंने बिना कुछ पूछे मुझे बहुत डाँटा।

मैं कुछ समझा भी नहीं पाई।

मेरे घर का माहौल पहले से ही बहुत सख़्त था।

उस रात पहली बार मुझे लगा...

कि शायद अब सब खत्म हो जाएगा।

मैं अपने कमरे में जाकर बहुत रोई।

इतना रोई कि आँखें सूज गईं।

लेकिन किसी को मेरे आँसू दिखाई नहीं दिए।

अगली सुबह मैंने एक फैसला लिया।

मैं बचपन से ही भगवान में बहुत विश्वास करती थी।

उस दिन मैंने अपने गुरुजी से तुलसी की माला और मंत्र की दीक्षा ली।

उसी दिन से मैंने नियमित तिलक लगाना शुरू कर दिया।

भक्ति मुझे हमेशा से शांति देती थी।

शायद...

मैं अपने टूटे हुए मन को भगवान के सहारे संभालना चाहती थी।

उधर अभिन्नव लगातार मैसेज कर रहे थे।

हमारी चैट मैंने छिपा रखी थी।

लेकिन मैं यह भूल गई थी कि मम्मी के फिंगरप्रिंट से भी फोन खुल जाता है।

फिर भी...

मैंने उन्हें सच नहीं बताया।

आज सोचती हूँ...

अगर उस दिन सब सच बता देती...

तो शायद हमारी कहानी उसी दिन खत्म हो जाती।

मैंने सिर्फ़ इतना लिखा—

"मेरा बारहवीं तक इंतज़ार कर लीजिए। उसके बाद हम आराम से बात करेंगे।"

मैंने यह इसलिए कहा...

क्योंकि मैंने उनसे वादा किया था कि मैं उनका साथ कभी नहीं छोड़ूँगी।

लेकिन उस समय मेरे पास और कोई रास्ता भी नहीं था।

उन्होंने मेरी बात मानने की कोशिश की।

लेकिन शायद...

उनके लिए यह इंतज़ार आसान नहीं था।

इधर मम्मी हर समय मेरे आसपास रहती थीं।

जैसे ही मुझे थोड़ा समय मिलता...

मैं उन्हें जल्दी-जल्दी मैसेज करती।

और अचानक मम्मी आ जातीं।

मुझे मजबूर होकर उन्हें ब्लॉक करना पड़ता।

कुछ देर बाद फिर अनब्लॉक करती।

फिर दोबारा समझाती।

लेकिन हर बार कोई न कोई आ जाता।

मैं बहाने बनाने लगी।

"आज गुरुजी ने बुलाया है..."

"आज पूजा है..."

"आज समय नहीं मिलेगा..."

लगातार पाँच-छह दिनों तक मैं यही करती रही।

लेकिन सच यह था...

कि मैं झूठ बोलना नहीं चाहती थी।

मैं बस मजबूर थी।

उधर...

अभिन्नव पूरी तरह टूट चुके थे।

उन्हें कुछ भी सच पता नहीं था।

उन्हें लगता था...

कि अब गुरुजी...

पूजा...

और बाकी सब लोग उनसे ज़्यादा ज़रूरी हो गए हैं।

मैं उन्हें समय देती...

लेकिन उस समय पहुँच ही नहीं पाती।

वह घंटों मेरे एक मैसेज का इंतज़ार करते रहते।

और मैं...

कमरे में बैठी रोती रहती।

हम दोनों एक-दूसरे से नाराज़ नहीं थे।

हम दोनों बस अपनी-अपनी मजबूरियों में फँसे हुए थे।

धीरे-धीरे उनके मन में गलतफ़हमियाँ पैदा होने लगीं।

लेकिन फिर भी...

उन्होंने अपना अहंकार छोड़ दिया।

आनंद ने एक बार बताया था कि अगर कोई और लड़की होती...

तो अभिन्नव उसे उसी दिन ब्लॉक करके अपनी ज़िंदगी से निकाल देते।

लेकिन मेरे साथ उन्होंने ऐसा नहीं किया।

शायद पहली बार...

उन्होंने अपने अहंकार से ज़्यादा किसी इंसान को महत्व दिया था।

वह रोज़ मेरे एक मैसेज का इंतज़ार करते रहे।

और मैं...

रोज़ उनसे माफ़ी माँगने का मौका ढूँढ़ती रही।

कुछ दिनों बाद मैं वापस गाँव आ गई।

लेकिन मुश्किलें कम नहीं हुईं।

मम्मी ने सारी बात मेरी दूसरी बहन निकिता को भी बता दी थी।

अब घर में रोज़ ताने मिलते।

रोज़ डाँट पड़ती।

रोज़ मैं अकेले कमरे में जाकर रोती।

और उधर...

अभिन्नव अब भी यह नहीं जानते थे कि मेरी चुप्पी की असली वजह क्या थी।

मैं फिर से ट्यूशन जाने लगी।

रास्ते वही थे...

गाँव वही था...

लोग वही थे...

लेकिन ज़िंदगी बदल चुकी थी।

हम दोनों एक ही गाँव में रहकर भी...

एक-दूसरे से बात नहीं कर पा रहे थे।

दिन बीतते गए।

एक...

दो...

फिर पूरे आठ दिन।

हम दोनों सिर्फ़ एक-दूसरे के इंतज़ार में जी रहे थे।

मैंने अगला पन्ना पलटा...

लेकिन वहाँ सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—

"आठ दिनों की इस खामोशी के बाद..."

"जो हुआ, उसने हमारी मोहब्बत की सबसे बड़ी परीक्षा शुरू कर दी..."

"और उस दिन पहली बार मुझे लगा कि शायद किस्मत हमें मिलाने नहीं... आज़माने आई है..."

जारी रहेगा... 📖