Marital rape in Hindi Women Focused by Kapil Tiwari books and stories PDF | वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप)

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वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप)

वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप): बदलते सामाजिक परिवेश और कानूनी पेचीदगियों का एक विश्लेषण।

वैवाहिक बलात्कार (मैरिटल रेप) का सीधा अर्थ है—जब कोई पति अपनी पत्नी की सहमति के बिना, उसके साथ जबरदस्ती शारीरिक संबंध बनाता है या इसके लिए बल का प्रयोग करता है। सभ्य समाज में इसे किसी भी रूप में उचित नहीं ठहराया जा सकता। हालिया रिपोर्ट्स एक चौंकाने वाला तथ्य सामने लाती हैं कि महिलाओं को अन्य बाहरी व्यक्तियों की तुलना में खुद के पति से 17 गुना अधिक यौन हिंसा (sexual violence) का खतरा या भय रहता है। इसके मूल में पुरुष की वह रूढ़िवादी सोच है, जहाँ वह अपनी पत्नी को अपनी 'निजी संपत्ति' समझने लगता है और यह मान लेता है कि उसे उसके साथ कुछ भी करने का अधिकार प्राप्त है। दूसरी ओर, पत्नियाँ भी कई बार न चाहते हुए भी मूक सहमति दे देती हैं; क्योंकि उन्हें लगता है कि पति को हर हाल में खुश रखना उनका कर्तव्य है, या फिर उनके मन में यह डर होता है कि पति और ससुराल के अलावा उनका इस दुनिया में है ही कौन?

🏠 आर्थिक निर्भरता और 'घर की चारदीवारी' का चक्रव्यूह🏠

भारत में आज भी अधिकांश महिलाएँ 'होममेकर' या गृहणी हैं। हमारे समाज ने एक ऐसा ताना-बाना बुन दिया है जिसमें पुरुष बाहर काम करेगा, पैसा कमाएगा और रहना-खाना देगा; जबकि महिला सिर्फ घर, बच्चे और किचन संभालेगी। (शॉर्ट फिल्म 'जूस' इसी कड़वी सच्चाई को बखूबी बयां करती है)। इस श्रम-विभाजन के कारण पुरुष खुद को घर का 'प्रधान' या स्वामी समझने लगता है। महिलाओं के पास उसका कहना मानने के अलावा कोई और उपाय नहीं बचता, क्योंकि हमने उन्हें आर्थिक रूप से स्वतंत्र होने ही नहीं दिया—न तो उन्हें बाहर निकलने दिया, न कोई हुनर (स्किल) सीखने दी और न ही बैंक खातों में उनकी अपनी कोई जमा-पूंजी होने दी।

समय के साथ जब बच्चे हो जाते हैं, तो इस शोषण के खिलाफ आवाज उठाना और भी कठिन हो जाता है। महिलाओं को डर होता है कि यदि उन्होंने आवाज उठाई और 'पति देव' रूठ गए या उन्होंने घर से निकाल दिया, तो वे कहाँ जाएंगी? पूरा समाज उन्हीं को दोषी ठहराएगा। यहाँ तक कि माता-पिता भी ढाढस बंधाने के बजाय कहेंगे—"जो भाग्य और किस्मत में लिखा था, वही मिला, अब वहीं निभाओ।" समाज ने स्त्री की इस मजबूरी को जैसे खुद ही निर्मित किया है।

एक चिंताजनक विरोधाभास: देश में एक तरफ महिला शिक्षा का स्तर तो बढ़ रहा है, लेकिन दूसरी तरफ कामकाजी महिलाओं की दर घट रही है। रिपोर्ट्स बताती हैं कि वर्ष 1990 में जितनी महिलाएँ कार्यबल (labor force) का हिस्सा थीं, आज वैसी स्थिति नहीं है। आखिर ये शिक्षित महिलाएँ कहाँ गईं? सच तो यह है कि उन्हें पढ़ा-लिखाकर भी किचन और बेडरूम तक ही सीमित कर दिया गया। आज जितने किसान प्रतिवर्ष आत्महत्या कर रहे हैं, लगभग उतनी ही गृहणियाँ भी आत्महत्या कर रही हैं, लेकिन इस गंभीर मुद्दे पर कोई बात नहीं करना चाहता; क्योंकि इस पर बात करने का मतलब होगा समाज के मुंह पर एक करारा थप्पड़।

ऊपर से आर्थिक नियंत्रण का यह आलम है कि पति कहता है—"तुम घर में रहो, पैसे मैं लाऊंगा, तुम बस संभाल कर रखना, लेकिन खर्च वहीं करना जहाँ मैं कहूं।" यह अधिकार विहीनता स्त्री को महज एक बैंक लॉकर बनाकर छोड़ देती है। यही कारण है कि आंकड़े बताते हैं कि भारत में होने वाली यौन हिंसा और रेप की घटनाओं में 96% मामलों में अपराधी कोई अजनबी नहीं, बल्कि पीड़ित के जाने-पहचाने लोग ही होते हैं।

📝 सहमति (कंसेंट) और राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (NFHS) के आंकड़े 📝

 राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में मैरिटल रेप के 99.1% मामलों में महिलाएँ शिकायत दर्ज ही नहीं कराती हैं, क्योंकि उनके सामने परिवार को खोने का डर होता है। इसी रिपोर्ट में शामिल लगभग 93% महिलाओं ने यह स्वीकार किया है कि उनके पति ने कभी न कभी उनकी मर्जी के खिलाफ (बिना सहमति के) उनके साथ शारीरिक संबंध बनाए हैं।

कानून और जागरूकता के संदर्भ में यह समझना बेहद जरूरी है कि कुछ विशेष परिस्थितियों में यदि महिला या लड़की शारीरिक संबंध के लिए 'हाँ' कह भी दे, तो भी कानूनन उसे 'वैध सहमति' (Valid Consent) नहीं माना जाएगा:

1• अल्पायु होना: यदि लड़की की उम्र 18 वर्ष से कम है, तो उसकी सहमति का कोई कानूनी मूल्य नहीं है (पोक्सो एक्ट के तहत यह सीधा अपराध है)।

2• नशे की हालत: यदि लड़की नशे या किसी ऐसी दवा के प्रभाव में है जहाँ वह सही-गलत का निर्णय लेने की स्थिति में न हो, तो उसकी हाँ को सहमति नहीं माना जाएगा।

3• पहचान का धोखा: यदि किसी लड़की से झूठ बोलकर या भ्रामक रूप से यह विश्वास दिलाया जाए कि सामने वाला व्यक्ति उसका पति है (जबकि वह नहीं है), तो इस धोखे के तहत दी गई सहमति अमान्य होगी।

4• मूक प्रतिरोध या सामाजिक दबाव: यदि संबंध बनाते समय लड़की सामाजिक डर, लोक-लाज या किसी दबाव के कारण हाथ-पैर नहीं चलाती या हिंसक विरोध नहीं कर पाती, तो इसका मतलब यह कतई नहीं है कि उसकी सहमति थी।

🔍कानूनी पेचीदगियाँ और साक्ष्य प्रस्तुत करने की चुनौतियाँ🔎

वैवाहिक बलात्कार को पूरी तरह आपराधिक श्रेणी में डालने के मार्ग में भारतीय न्याय व्यवस्था और समाज के सामने कुछ बेहद बारीक और जटिल व्यावहारिक प्रश्न हैं:

• सहमति और मजबूरी का धुंधलापन: वैवाहिक जीवन में सहमति (Consent) और मजबूरी के बीच की रेखा बहुत पतली होती है। उदाहरण के लिए, यदि पति संबंध बनाने की इच्छा जताता है और पत्नी मना कर देती है, लेकिन बाद में पति उसे भावनात्मक रूप से (इमोशनली) मना लेता है और पत्नी 'ठीक है' कह देती है—तो बंद कमरे की इस स्थिति में यह तय कर पाना लगभग असंभव है कि यह पत्नी की वास्तविक सहमति थी या केवल उसकी मजबूरी।

• संबंध के दौरान मन बदलना: यदि पत्नी ने शुरुआत में सहमति दे दी, लेकिन संबंध बनाने की प्रक्रिया के दौरान उसका मन बदल गया और वह पीछे हटना चाहती है, मगर पति के लिए उस चरम स्थिति में तुरंत रुक पाना संभव न हो—तो क्या इसे बलात्कार माना जाएगा? यह समाज और कानून के सामने एक बड़ा यक्ष प्रश्न है।

• साक्ष्यों (Evidence) का अभाव: चूंकि यह घटना किसी तीसरे व्यक्ति के सामने नहीं, बल्कि दो लोगों के बीच एक बंद कमरे में घटित होती है, इसलिए इसमें कोई प्रत्यक्षदर्शी नहीं होता। कोर्ट के लिए यह तय करना बेहद पेचीदा हो जाता है कि कौन सच बोल रहा है और कौन निजी रंजिश के तहत झूठ।

• परिवार के बिखरने का खतरा: मान लिया जाए कि पत्नी ने शिकायत की और अपराध सिद्ध भी हो गया, जिसके बाद पति को 10 या 20 वर्ष के लिए जेल भेज दिया गया। चूंकि अधिकांश गृहणियाँ आर्थिक रूप से पति की सैलरी पर ही निर्भर हैं, ऐसे में पति के जेल जाने के बाद उस परिवार और बच्चों का भरण-पोषण कैसे होगा? राज्य के पास इतने संसाधन नहीं हैं कि वह ऐसे सभी परिवारों का खर्च उठा सके।

• अज्ञानता और सुधार की गुंजाइश: ग्रामीण और कम पढ़े-लिखे क्षेत्रों में पुरुषों को अक्सर यह अहसास ही नहीं होता कि जो वे कर रहे हैं वह 'वैध अधिकार' नहीं बल्कि 'वैवाहिक बलात्कार' है। यदि उन्हें सीधे लंबी जेल की सजा दे दी जाए, तो उस रिश्ते के सुधरने की सारी गुंजाइशें खत्म हो जाती हैं। जेल से लौटने के बाद वह पुरुष कभी भी उस पत्नी के साथ प्रेमपूर्वक नहीं रह पाएगा, क्योंकि वह इस बात को कभी नहीं भूल सकेगा कि उसकी पत्नी ने उसे जेल भिजवाया था। कानून का मकसद अपराधियों को सजा देना है, लेकिन यहाँ अनजाने में पूरा परिवार ही तबाह हो जाता है। स्वयं पत्नियाँ भी यह नहीं चाहतीं कि उनके पति को इतनी लंबी सजा मिले, क्योंकि अंततः बात उनके और बच्चों के अस्तित्व पर आ जाती है। यही कारण है कि माननीय सुप्रीम कोर्ट के लिए भी इस पर कोई एकतरफा सख्त कानून बनाना अब तक संभव नहीं हो पाया है।

👥समाधान और मध्यमार्ग के कुछ व्यावहारिक सुझाव👥

इस जटिल समस्या का समाधान केवल सीधे जेल भेजने में नहीं, बल्कि कुछ सुधारात्मक और मध्यमार्ग अपनाने में है:

1. विशेष ट्रिब्यूनल (अधिकरण) की स्थापना

यदि मामला अत्यधिक क्रूर या हिंसक प्रकृति का नहीं है, तो ऐसे केसों को सीधे आपराधिक अदालतों में भेजने के बजाय 'पारिवारिक ट्रिब्यूनल्स' में भेजा जाना चाहिए। इस अधिकरण में मनोवैज्ञानिक, काउंसलर्स और परिवार के समझदार विशेषज्ञ होने चाहिए। यहाँ पति को कानूनी चेतावनी, काउंसिलिंग, काउंसलिंग के साथ कुछ हफ्तों या महीनों की प्रतीकात्मक सजा या डर दिखाकर सुधरने का मौका दिया जाना चाहिए। यदि पति अज्ञानतावश ऐसा कर रहा था, तो उसे कानूनन शिक्षित किया जाए। हाँ, यदि मामले में गंभीर शारीरिक हिंसा या बर्बरता शामिल हो, तो सजा की अवधि को अपराध के अनुपात में बढ़ाया जाना चाहिए।

2. शारीरिक आवश्यकताओं (Sexual Needs) के अंतर को समझना

हमें इस कड़वी सच्चाई को भी स्वीकार करना होगा कि हर व्यक्ति (पति या पत्नी) की शारीरिक आवश्यकताएं अलग-अलग हो सकती हैं। विवाह के समय दोनों पक्ष कहीं न कहीं यह मानकर चलते हैं कि उनकी इस सहज आवश्यकता की पूर्ति इस संस्था के भीतर गरिमापूर्ण तरीके से होगी। लेकिन यदि विवाह के बाद कोई एक पक्ष हमेशा के लिए संबंधों से पूरी तरह मुंह मोड़ ले, तो दूसरे पक्ष के सामने क्या विकल्प बचता है? इसी व्यावहारिक पहलू को देखते हुए अदालतों ने भी माना है कि यदि पति-पत्नी बिना किसी उचित कारण के 6 महीने या उससे अधिक समय तक आपस में शारीरिक संबंध नहीं बनाते हैं, तो यह मानसिक क्रूरता की श्रेणी में आता है और इसके आधार पर वे विवाह के बंधन से अलग (तलाक) हो सकते हैं।

3. रूढ़िवादिता का त्याग और जागरूकता

सबसे बेहतर यही है कि दोनों पक्ष आपस में बैठकर संवाद करें। यदि वैचारिक और शारीरिक स्तर पर कुछ भी ठीक नहीं हो पा रहा है, तो जबरदस्ती उस घुटन भरे रिश्ते को ढोने के बजाय सम्मानजनक तरीके से विवाह से बाहर निकल जाना (तलाक ले लेना) ज्यादा बेहतर विकल्प है। हमें इस रूढ़िवादी सोच को छोड़ना होगा कि "शादी हो गई तो अब मरते दम तक चाहे जो हो, साथ ही रहना है।" एक हिंसक, गलत और दमनकारी पुरुष या महिला के साथ रहने से कहीं ज्यादा सुकून अकेले सम्मान से जीने में हैं।

☘️ समाजशास्त्र के झरोखे से: 21वीं सदी में विवाह संस्था का बदलता स्वरूप 🍀

समाजशास्त्र के अनुसार, विवाह के उद्देश्य समय और काल के साथ बदलते रहते हैं। आज समाज में लगभग 16.66% शादियाँ ऐसी हैं जहाँ दोनों के बीच कोई वास्तविक शारीरिक या भावनात्मक संबंध नहीं है; वे केवल सामाजिक और पारिवारिक दबाव के कारण दुनिया को दिखाने के लिए पति-पत्नी के रूप में एक छत के नीचे रह रहे हैं। ऐसी शादियों का कोई मानवीय अर्थ नहीं रह जाता।

परंपरागत रूप से समाज में विवाह के पांच प्रमुख स्तंभ माने गए हैं:

1• वैध यौन संबंध की स्थापना
2• संतानोत्पत्ति (वंश आगे बढ़ाना)
3• आर्थिक और सामाजिक सुरक्षा (मिलकर जीवन जीना)
4• वृद्ध माता-पिता की देखभाल और सहारा बनना
5• जीवन के सफर में एक स्थायी और विश्वसनीय साथी का मिलना

परंतु 21वीं सदी में विज्ञान, तकनीक और आर्थिक स्वतंत्रता ने इन सभी आवश्यकताओं के लिए विवाह के इतर भी ठोस विकल्प खड़े कर दिए हैं। यही कारण है कि आज युवा पीढ़ी में अकेले रहने (Singlehood) या पारंपरिक विवाह न करने का चलन बढ़ रहा है, क्योंकि जो चीजें पहले केवल विवाह से मिलती थीं, अब वे बिना विवाह के भी सुलभ हैं:

• लिव-इन रिलेशनशिप (Live-in Relationship): शारीरिक और भावनात्मक जरूरतों के लिए अब लोग बिना शादी के आपसी सहमति से साथ रह रहे हैं। भारत के माननीय सर्वोच्च न्यायालय ने भी इसे जीवन और स्वतंत्रता के संवैधानिक अधिकार (Article 21) के तहत वैध माना है।

• तकनीक और संतानोत्पत्ति: अब बच्चे पैदा करने के लिए पारंपरिक गर्भधारण अनिवार्य नहीं रह गया है। सेरोगेसी (Surrogacy) और एडॉप्शन (गोद लेना) जैसे विकल्प मौजूद हैं, जिससे महिलाओं को करियर में ब्रेक या प्रसव की पीड़ा से गुजरे बिना भी संतान सुख मिल रहा है। विज्ञान अब इससे भी आगे बढ़कर 'लैब-ग्रोन बेबी' (Ectogenesis/कृत्रिम गर्भ) की दिशा में काम कर रहा है, जहाँ भविष्य में माता-पिता के स्पर्म और ओवम से बिना किसी मानवीय कोख के भी बच्चा जन्म ले सकेगा।

• आत्मनिर्भरता और सामाजिक मित्र: आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर होने के कारण अब महिलाओं या पुरुषों को सुरक्षा के लिए किसी बैसाखी की जरूरत नहीं है। वहीं, माता-पिता की सेवा का दायित्व केवल बहुओं पर डालना न्यायसंगत नहीं है, बेटा-बेटी खुद भी इसे पूरा कर सकते हैं। बुढ़ापे में साथी की कमी को दोस्त और मजबूत सोशल नेटवर्क पूरा कर रहे हैं।

⚖️वर्तमान कानूनी स्थिति⚖️

उल्लेखनीय है कि भारतीय न्याय व्यवस्था में भी इस विषय पर गहन मंथन चल रहा है। सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) के समक्ष मैरिटल रेप को पूरी तरह आपराधिक श्रेणी में लाने की याचिकाएं विचाराधीन हैं। अदालत और सरकार दोनों ही इस बात को लेकर बेहद सतर्क हैं कि एक तरफ जहां पीड़ित महिलाओं को न्याय मिलना जरूरी है, वहीं दूसरी तरफ इस कानून के संभावित दुरुपयोग और परिवार टूटने की पेचीदगियों से समाज को कैसे बचाया जाए। यही कारण है कि देश को अब एक ऐसे संतुलित मध्यमार्ग की तलाश है जो सुरक्षा भी दे और संस्था को बिखरने से भी बचाए।

💮निष्कर्ष: शादियों का आर्थिक तमाशा बनाम आपसी समझदारी💮

आज का हमारा समाज इस मामले में थोड़ा अजीब और विरोधाभासों से भरा है। भारत में 60% से अधिक शादियाँ कर्ज (लोन) लेकर की जाती हैं, जिसे चुकाते-चुकाते लड़की के पिता की कमर टूट जाती है। एक औसत भारतीय नागरिक अपने जीवनभर की कमाई का लगभग 20% हिस्सा केवल शादियों के दिखावे, धर्म और सामाजिक रस्मों-रिवाजों के आडंबर में उड़ा देता है। त्रासदी यह है कि कई बार इस भव्य आयोजन में लड़का-लड़की की वास्तविक सहमति तक नहीं पूछी जाती; बस उन्हें सात फेरों में बांधकर जिंदगी भर के लिए छोड़ दिया जाता है। और जब बाद में उनके बीच संबंध बिगड़ने लगते हैं, तो यह तमाशा देखने वाला समाज गायब हो जाता है; तब केवल उन दोनों की आपसी समझदारी, बोध , विवेक और मानसिक परिपक्वता ही काम आती है।

हाल ही में ओडिशा उच्च न्यायालय (Orissa High Court) ने 3 जुलाई को जस्टिस आर.के. पटनायक की पीठ के माध्यम से एक ऐतिहासिक और व्यावहारिक फैसला सुनाया, जो रिश्तों की इसी पेचीदगी को स्पष्ट करता है। अदालत ने कहा कि:

"यदि किसी रिश्ते की शुरुआत दोस्ती से होती है, जो धीरे-धीरे आगे बढ़ती है और पुरुष द्वारा शादी का वादा करने पर दोनों आपसी सहमति से शारीरिक संबंध बनाते हैं; मगर बाद में किन्हीं कारणों से रिश्ते में खटास आ जाती है और पुरुष शादी नहीं कर पाता, तो पहले से बने उन आपसी संबंधों को 'बलात्कार' (रेप) नहीं माना जा सकता। ऐसे मामलों में आरोपी के खिलाफ बलात्कार संबंधी आपराधिक कानून का इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए।"

यह फैसला साफ करता है कि हर टूटते रिश्ते या आपसी सहमति के बाद उपजे विवाद को आपराधिक रंग देना कानूनन सही नहीं है। वैवाहिक बलात्कार हो या सहमति से बने संबंधों में दरार—अंतिम समाधान केवल कड़े कानूनों की किताबों में नहीं, बल्कि स्त्री-पुरुष को समान दर्जा देने, दोनों की उच्चतम संभावना को साकार करने, ज्ञान, बोध , कौशल के आधार पर रिश्तों की नींव रखने, स्वतंत्र बनाने और समाज में रूढ़िवादिता को छोड़कर आपसी समझदारी , विवेक युक्त ईमानदारी, खुद को समझने और संवाद को बढ़ावा देने में ही निहित है।

~ कपिल तिवारी”यथार्थ”