दोनों आमने-सामने बैठ गए।
दुकान में रखी पुरानी लकड़ी की कुर्सियों पर दोनों
आमने-सामने बैठ गए।
अवंतिका ने बिना भूमिका बाँधे पूछा,
"आपकी कलाई पर जो निशान है... वही निशान काली कोठी की दीवारों पर भी बना है। वह क्या है?"
वीर ने अपनी कलाई की तरफ देखा।
जले हुए निशान पर उसकी उँगलियाँ कुछ पल ठहर गईं।
"इसे त्रिकाल बंधन कहते हैं।"
"मतलब?"
"यह बहुत पुराना चिन्ह है। कहा जाता है कि यह अतीत, वर्तमान और भविष्य को जोड़ने वाला प्रतीक है। जिसने इसे स्वीकार किया... उसका जीवन इस रहस्य से हमेशा के लिए जुड़ जाता है।"
"आपने यह कब बनवाया?"
वीर की आँखें कुछ पल के लिए झुक गईं।
"जिस दिन आरोही गायब हुई थी।"
"क्यों?"
"क्योंकि मुझे उसे ढूँढना है।"
उसकी आवाज़ शांत थी, लेकिन उसके भीतर का दर्द साफ महसूस हो रहा था।
"और इसके बिना... उस दुनिया तक पहुँचना मुश्किल है।"
अवंतिका कुछ पल चुप रही
"क्या सच में वहाँ पहुँचा जा सकता है?"
"एक रास्ता है।"
"कौन-सा?"
वीर ने सीधे उसकी आँखों में देखा।
"वीर ने उसकी आँखों में देखा।
"पहले मुझे बताइए... आपकी माँ का नाम क्या था?"
अवंतिका ने बिना सोचे जवाब दिया,
"सुमित्रा शर्मा।"
फिर वह कुछ पल रुकी।
"शादी से पहले... शायद उनका नाम सुमित्रा राठौड़ था। मैंने कभी पूछा नहीं।"
वीर के चेहरे का रंग जैसे एक पल में बदल गया।
"सुमित्रा... राठौड़?"
अवंतिका ने हैरानी से उसकी तरफ देखा।
"आप जानते हैं मेरी माँ को?"
वीर कुछ देर चुप रहा। फिर उसने धीरे से सिर हिलाया।
"मैंने उन्हें कभी नहीं देखा... लेकिन उनके बारे में बहुत सुना है।"
"किससे?"
"अपने बाबा से।"
अवंतिका की उत्सुकता और बढ़ गई।
"मेरे बाबा और आपके नाना बचपन के दोस्त थे। दोनों परिवारों का वर्षों पुराना साथ था। सुख-दुख, हर मुश्किल में वे एक-दूसरे के साथ खड़े रहते थे।"
"लेकिन माँ ने कभी इसका ज़िक्र नहीं किया..."
वीर ने गहरी साँस ली।
"क्योंकि जिस रात आपकी माँ चंदनगढ़ छोड़कर गई थीं... उसी रात दोनों परिवारों का रिश्ता भी हमेशा के लिए टूट गया।"
"क्या हुआ था उस रात?"
वीर कुछ पल तक खामोश रहा। उसकी आँखों में पुरानी यादों का दर्द साफ़ दिखाई दे रहा था।
"मुझे पूरी सच्चाई नहीं पता," उसने धीमे स्वर में कहा, "लेकिन बाबा हमेशा एक बात कहते थे..."
"क्या?"
"अगर सुमित्रा कभी वापस चंदनगढ़ आई... तो अधूरी कहानी फिर से शुरू हो जाएगी।"
अवंतिका के चेहरे का रंग उड़ गया।
"मतलब... माँ को पहले से सब पता था?"
वीर ने धीरे से सिर हिलाया।
"शायद... और शायद इसी वजह से उन्होंने कभी पीछे मुड़कर नहीं देखा।"
"तो अब?"
वीर ने पहली बार उसकी आँखों में सीधे देखते हुए कहा,
"अब तुम यहाँ हो... और मुझे लगता है कि वही कहानी फिर से शुरू हो चुकी है।"
"मतलब... माँ को सब पता था?"
"इतना ज़रूर था कि उन्हें चंदनगढ़ के उस रहस्य की जानकारी थी, जो आज भी ज़्यादातर लोगों से छिपा हुआ है।"
"और उन्होंने मुझे कभी कुछ नहीं बताया..."
"शायद वह चाहती थीं कि तुम कभी यहाँ वापस न आओ।"
दुकान में कुछ पल तक खामोशी छाई रही। बाहर हवा की हल्की आवाज़ सुनाई दे रही थी।
आख़िर अवंतिका ने पूछा,
"वीर... क्या तुम्हें पता है श्यामला आखिर है कौन?"
वीर ने धीरे से सिर हिलाया।
"नहीं... पूरा सच मुझे भी नहीं पता।"
"लेकिन तुमने कहा था..."
"मैंने जितना सुना है, उतना जानता हूँ।" वीर बोला। "बाकी बातें सिर्फ़ कहानियाँ हैं। कोई कहता है वह श्राप है, कोई कहता है अधूरी आत्मा। कोई उसे रानी चंद्रावती का दर्द मानता है। लेकिन सच क्या है... यह शायद सिर्फ़ काली कोठी जानती है।"
"और त्रिकाल बंधन?"
वीर ने अपनी कलाई पर बने निशान को देखा।
"यह उसी रहस्य से जुड़ा है। मेरे बाबा ने मेरे हाथ पर यह निशान बनाते समय सिर्फ़ एक बात कही थी..."
"क्या?"
"'अगर कभी सुमित्रा की बेटी चंदनगढ़ लौटे... तो उसे काली कोठी तक पहुँचाना। उसके बाद रास्ता वही चुनेगी।'"
अवंतिका की आँखें फैल गईं।
"उन्होंने ऐसा क्यों कहा?"
"यही तो मैं भी जानना चाहता हूँ।"
"तुम्हारे बाबा ने और कुछ नहीं बताया?"
"एक डायरी थी..." वीर ने धीमे स्वर में कहा। "लेकिन उसके कई पन्ने गायब हैं। जो बचे हैं, उनमें सिर्फ़ इशारे हैं... जवाब नहीं।"
"डायरी कहाँ है?"
"मेरे पास।"
अवंतिका तुरंत आगे झुकी।
"क्या मैं उसे देख सकती हूँ?"
"अभी नहीं।"
"क्यों?"
"क्योंकि उसके आख़िरी पन्ने पढ़ने से पहले हमें एक जगह जाना होगा।"
"कहाँ?"
वीर ने बिना पलक झपकाए उसकी ओर देखा।
"काली कोठी।"
"वहाँ क्या है?"
"डायरी में लिखा है कि तहखाने के नीचे एक बंद कमरा है। अगर वह कमरा खुल गया... तो शायद तुम्हारी माँ ने जो राज़ अपने साथ छिपा लिया था, वह भी सामने आ जाएगा।"
अवंतिका ने महसूस किया कि उसकी धड़कन तेज़ हो गई है।
अब यह सिर्फ़ एक रिपोर्ट नहीं थी।
यह उसकी माँ की अधूरी कहानी थी।
फिर आगे का हिस्सा ऐसे ही रह सकता है कि अवंतिका गेस्ट हाउस लौटती है, मेहर और चोटू को सब बताती है, और चारों रात में काली कोठी जाने का फैसला करते हैं।