Part 17
"अगले चार महीने..."
ये चार महीने मेरी ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत भी थे...
और सबसे मुश्किल भी।
क्योंकि मेरी हर सुबह उनके "गुड मॉर्निंग" से शुरू होती थी और हर रात उनके "सो जाओ, देर हो गई है" पर खत्म होती थी।
मेरी खुशी अब किसी जगह या किसी चीज़ में नहीं थी...
मेरी खुशी सिर्फ़ अभिन्नव से बात करने में थी।
लेकिन इन्हीं चार महीनों में मैंने उनका एक ऐसा रूप भी देखा...
जिससे मैं पहले कभी नहीं मिली थी।
अभिन्नव को बहुत गुस्सा आता था।
इतना ज़्यादा कि गुस्से में वो कई बार ऐसी बातें बोल देते थे...
जो सीधे मेरे दिल पर जाकर लगती थीं।
कई बार मैं पूरी रात सिर्फ़ उनकी कही हुई बातों के बारे में सोचती रहती।
मेरी आँखों से आँसू बहते रहते...
लेकिन अगले दिन जब उनका मैसेज आता...
तो मैं ऐसे बात करती जैसे कुछ हुआ ही न हो।
उन्होंने कभी महसूस भी नहीं किया कि उनकी कुछ बातें मुझे कितना चोट पहुँचाती थीं।
और शायद...
मैंने कभी उन्हें महसूस होने भी नहीं दिया।
क्योंकि मुझे डर था...
अगर मैंने उनकी हर गलती गिनानी शुरू कर दी...
तो कहीं हमारे रिश्ते में दूरियाँ न आ जाएँ।
मैंने हमेशा यही सोचा...
अगर प्यार किया है...
तो उनके गुस्से को भी अपनाना पड़ेगा।
इसलिए मैं चुप रहती थी।
उनकी हर नाराज़गी...
हर डाँट...
हर कड़वी बात...
बस मुस्कुराकर सुन लेती थी।
शायद...
यही मेरी सबसे बड़ी गलती भी थी।
और सबसे बड़ा प्यार भी।
इन चार महीनों में हमने बहुत सारी खूबसूरत यादें भी बनाई।
कभी घंटों बातें करना...
कभी बिना किसी वजह के हँसना...
कभी एक-दूसरे के भविष्य के बारे में सपने देखना...
धीरे-धीरे हमारा रिश्ता पहले से भी ज़्यादा गहरा होता जा रहा था।
अब मुझे लगता था...
शायद सच में भगवान ने हमें एक-दूसरे के लिए ही बनाया है।
लेकिन...
किस्मत अभी भी चुप नहीं बैठी थी।
20 अप्रैल को मेरी तीसरी बहन सुमन की शादी थी।
पूरा घर शादी की तैयारियों में लगा हुआ था।
मैं भी सुबह से रात तक उसी में व्यस्त रहती।
मेहँदी...
हल्दी...
खरीदारी...
रिश्तेदार...
घर में हर तरफ़ खुशियों का माहौल था।
लेकिन शादी से कुछ ही दिन पहले...
सुमन दीदी ने भी मम्मी को हमारे बारे में बता दिया।
और बस...
एक बार फिर मेरी ज़िंदगी उसी मोड़ पर आकर खड़ी हो गई...
जहाँ से मैं बहुत मुश्किल से बाहर निकली थी।
फिर वही डाँट...
वही ताने...
वही शक...
और वही सवाल।
इस बार पहले से भी ज़्यादा।
परिवार के हर सदस्य की बातें सुननी पड़ती थीं।
कई बार तो मुझे लगता...
शायद मेरी गलती सिर्फ़ इतनी थी कि मैंने किसी से सच्चा प्यार कर लिया।
लेकिन...
इतना सब होने के बाद भी...
मैंने एक पल के लिए भी अभिन्नव का साथ छोड़ने का नहीं सोचा।
क्योंकि मैंने उनसे वादा किया था...
और मैं अपने वादे कभी नहीं तोड़ती।
धीरे-धीरे शादी का दिन भी आ गया।
हल्दी हुई।
मेहँदी लगी।
बारात आई।
सात फेरे हुए।
और आखिरकार...
सुमन दीदी की विदाई भी हो गई।
इन सबमें एक कमी थी...
अभिन्नव कहीं भी नहीं आए।
पहले मुझे थोड़ा बुरा लगा।
लेकिन फिर मैंने खुद को समझाया।
वो आते भी कैसे?
इतनी बातें होने के बाद उनका आना सही भी नहीं होता।
कई बार...
प्यार साथ होने का नाम नहीं...
समझदारी का नाम भी होता है।
कुछ दिनों बाद मेरा ग्यारहवीं में एडमिशन हो गया।
मैंने साइंस स्ट्रीम चुनी।
अब पढ़ाई पहले से ज़्यादा कठिन होने वाली थी।
इसी वजह से मम्मी-पापा ने मेरे लिए पहली बार मेरा अपना फोन खरीदा।
मैं बहुत खुश थी।
मुझे लगा...
अब शायद सब आसान हो जाएगा।
लेकिन...
उसी रात सब बदल गया।
हम सब एक साथ बैठे हुए थे।
तभी मम्मी ने पापा को हमारे बारे में सब बता दिया।
मेरे पापा बहुत गुस्से वाले थे।
उस रात उन्होंने मुझे जितना डाँटा...
उतना शायद पहले कभी नहीं डाँटा था।
उनकी हर बात मेरे दिल में तीर की तरह चुभ रही थी।
मैं लगातार दो दिनों तक रोती रही।
पहली बार मेरे मन में एक सवाल आया...
"काश मैं अभिन्नव से कभी मिली ही न होती..."
लेकिन...
यह सवाल सिर्फ़ दर्द का था।
दिल का नहीं।
क्योंकि मेरा दिल आज भी सिर्फ़ उन्हीं के पास था।
कुछ दिनों तक घर का माहौल बहुत खराब रहा।
मैं पूरी तरह टूट चुकी थी।
मुझे लगने लगा था...
शायद अब मेरी ज़िंदगी कभी पहले जैसी नहीं होगी।
लेकिन समय...
हर घाव पर थोड़ा-थोड़ा मरहम लगा ही देता है।
धीरे-धीरे मम्मी-पापा का भरोसा मुझ पर वापस आने लगा।
उन्हें पता था...
मैं अपने भाई-बहनों में पढ़ाई में सबसे अच्छी थी।
और पापा का हमेशा से सपना था...
कि मैं ज़िंदगी में कुछ बड़ा करूँ।
मैंने भी उनके भरोसे को टूटने नहीं दिया।
मैं पहले से भी ज़्यादा मेहनत से पढ़ने लगी।
अब मेरे पास अपना फोन था।
हम बहुत संभलकर बात करते।
अब पहले की तरह बार-बार ब्लॉक करने की ज़रूरत नहीं पड़ती थी।
सब कुछ धीरे-धीरे सामान्य होने लगा।
हमारा प्यार भी...
पहले से कहीं ज़्यादा गहरा होता जा रहा था।
अब हम सिर्फ़ एक-दूसरे को पसंद नहीं करते थे...
हम एक-दूसरे की आदत बन चुके थे।
यहाँ तक पढ़ते-पढ़ते मैं भी मुस्कुरा उठी।
शायद...
इतनी मुश्किलों के बाद आखिरकार राधा और अभिन्नव की ज़िंदगी में शांति लौट आई थी।
लेकिन जैसे ही मैंने अगला पन्ना पलटा...
सबसे नीचे सिर्फ़ एक पंक्ति लिखी थी—
"मुझे क्या पता था कि अब हमारी ज़िंदगी का सबसे बड़ा फैसला हमारा इंतज़ार कर रहा था..."
"और उस फैसले के बाद हमारी कहानी पहले जैसी कभी नहीं रहने वाली थी..."
जारी रहेगा...