Amrut Vaani in Hindi Philosophy by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 10

Featured Books
Categories
Share

अमृत वाणी - संत वाणी - 10

“हर जीव के भीतर साक्षात नारायण का वास है, इसलिए किसी भी प्राणी को छोटा या अछूत समझना ईश्वर का अपमान है।”

शंकरदेव जी ने 15वीं-16वीं शताब्दी में असम में एक महान सांस्कृतिक और आध्यात्मिक क्रांति की शुरुआत की थी। उन्होंने ‘एकशरण नाम धर्म’ का प्रचार किया, जिसका मूल आधार ही यही था कि परमेश्वर एक हैं और उनकी बनाई इस दुनिया में सभी बराबर हैं।

गहरे अर्थ की व्याख्या
महाप्रभु शंकरदेव जी कहते हैं कि परमात्मा केवल मंदिरों की मूर्तियों या आसमान में ही नहीं बैठे हैं। वे इस संसार के हर एक जीव—चाहे वह एक अमीर व्यक्ति हो, एक गरीब मजदूर हो, या कोई मूक पशु-पक्षी हो—सबके हृदय में ‘नारायण’ (ईश्वर) के रूप में निवास करते हैं। इसलिए, यदि हम जाति, धर्म, रंग या गरीबी के आधार पर किसी इंसान से नफ़रत करते हैं, उसे अपने से छोटा समझते हैं या उसका तिरस्कार करते हैं, तो हम अनजाने में उसके भीतर बैठे साक्षात भगवान का अपमान कर रहे होते हैं।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप अपने दैनिक जीवन के एक बहुत ही सीधे उदाहरण से समझ सकते हैं।

मान लीजिए आपके घर की साफ़-सफ़ाई करने वाला कोई छोटा कर्मचारी या आपकी कॉलोनी का कचरा उठाने वाला सफ़ाईकर्मी सुबह आता है।

पहला रास्ता (अहंकार का) : आप उससे बहुत दूर खड़े होकर, कड़क आवाज़ में बात करते हैं। उसे पीने के लिए पानी भी देना हो, तो किसी टूटे-फूटे बर्तन में दूर से फेंक कर देते हैं। आपने सोचा कि वह ‘छोटा’ और ‘गंदा’ है, इसलिए आपने ऐसा किया।

श्रीमंत शंकरदेव जी का रास्ता : आप यह समझते हैं कि सुबह उठकर आपके घर और समाज की गंदगी साफ़ करने वाला वह व्यक्ति साक्षात नारायण की ही सेवा कर रहा है। आप उससे मुस्कुराकर बात करते हैं, उसे पूरा सम्मान देते हैं और आदर सहित उसे साफ़ बर्तन में पानी या चाय देते हैं।

वह सफ़ाईकर्मी भले ही बाहरी रूप से मिट्टी में काम करता हो, लेकिन उसके भीतर की आत्मा उतनी ही पवित्र है जितनी आपकी। उसे सम्मान देकर आपने सीधे भगवान नारायण को प्रसन्न कर लिया।

विरोधाभास का समाधान
“क्या इसका यह मतलब है कि जो लोग समाज में अपराध करते हैं, चोरी करते हैं या दूसरों को नुकसान पहुँचाते हैं, हमें उन्हें भी भगवान मानकर उनके आगे झुक जाना चाहिए? क्या हमें गलत का विरोध नहीं करना चाहिए?”

महाप्रभु शंकरदेव जी यहाँ गलत आदतों या अपराधों का समर्थन करने को बिल्कुल नहीं कह रहे हैं। वे हमें ‘जीव और उसके कर्म’ का अंतर समझा रहे हैं। यदि कोई व्यक्ति गलत काम कर रहा है, तो कानून और समाज के नियमों के अनुसार उसकी गलती का विरोध करना हमारा कर्तव्य है। लेकिन किसी के ‘कर्म की गलती’ की वजह से उसकी पूरी जाति, उसके रंग या उसकी गरीबी को निशाना बनाना और उसे ‘अछूत’ घोषित कर देना अधर्म है। न्याय हमेशा शांत और निष्पक्ष होकर किया जाता है, नफ़रत और ऊंच-नीच के घमंड से नहीं।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ समदृष्टि (Equality) : अपने मन से जातिवाद, प्रांतीयता (क्षेत्रवाद) और अमीरी-गरीबी के भेदभाव को पूरी तरह निकाल फेंकें। हर व्यक्ति की मेहनत की कद्र करें।

★ पशु-पक्षियों के प्रति दया : चूंकि हर जीव में नारायण हैं, इसलिए अपने घर की छत पर पक्षियों के लिए पानी रखना, सड़क के बेसहारा कुत्तों या गाय को रोटी देना भी साक्षात ईश्वर की पूजा है।

★ मोबाइल का उपयोग : आज सोशल मीडिया पर बहुत बार अलग-अलग जातियों, धर्मों या राज्यों के लोगों का मज़ाक उड़ाया जाता है या उनके खिलाफ नफ़रत फैलाई जाती है। ‘संतों की अमृत वाणी’ का पालन करते हुए, अपने मोबाइल से कभी भी कोई ऐसी रील, मीम या पोस्ट शेयर न करें जो इंसानों के बीच दूरी बढ़ाती हो। इंटरनेट पर केवल वही बातें आगे बढ़ाएं जो समाज को जोड़ती हों।

आज का विचार:
“ईश्वर की बनाई इस धरती पर कोई भी इंसान छोटा या पराया नहीं है। जब हम हर चेहरे में भगवान की छवि देखने लगते हैं, तब हमारा पूरा जीवन ही एक पवित्र तीर्थ बन जाता है।” 🙏