Amrut Vaani in Hindi Motivational Stories by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 12

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अमृत वाणी - संत वाणी - 12

हम अक्सर अपनी असफलताओं के लिए अपनी किस्मत या अपनी मेहनत को दोष देते हैं। लेकिन क्या आप जानते हैं कि आपके आस-पास मौजूद लोग और विचार आपके जीवन की दिशा तय कर रहे हैं? संत तुलसीदास जी ने इस बात को प्रकृति के एक बेहद खूबसूरत उदाहरण से समझाया है :

“कदली, सीप, भुजंग मुख, स्वाति एक गुन तीन।
जैसी संगति बैठिए, तैसो ही फल दीन॥”
— संत तुलसीदास

(स्वाति नक्षत्र की बूंद तो एक ही होती है, लेकिन अलग-अलग संगति के कारण उसके तीन रूप हो जाते हैं। यदि वह केले के पेड़ पर गिरे तो कपूर, सीप में गिरे तो मोती, और सांप के मुंह में गिरे तो जहर बन जाती है। ठीक इसी प्रकार, मनुष्य जैसी संगति में बैठता है, उसे वैसा ही फल प्राप्त होता है।)

इस बात को पढ़कर लोग अक्सर एक अजीब विरोधाभास में उलझ जाते हैं। वे सोचते हैं कि तुलसीदास जी यहाँ भाग्य या चमत्कारों की बात कर रहे हैं। या फिर कुछ लोग यह मान लेते हैं कि हमें बुरे लोगों से इतनी नफरत करनी चाहिए कि समाज से ही कट जाना चाहिए।

लेकिन यहाँ कोई अंधविश्वास या नफरत नहीं है। यह तो इस ब्रह्मांड का सबसे बड़ा ‘एनर्जी लॉ’ (Energy Law) है। तुलसीदास जी डरा नहीं रहे, बल्कि हमें हमारे परिवेश के प्रति जागरूक कर रहे हैं।

प्रकृति का अद्भुत विज्ञान और उदाहरण
स्वाति नक्षत्र में आसमान से गिरने वाली पानी की बूंद तो एक ही होती है, उसका अपना कोई रंग या रूप नहीं होता। लेकिन उसका भविष्य इस बात पर निर्भर करता है कि वह गिरी कहाँ है :
यदि वह बूंद केले (कदली) पर गिरती है, तो कपूर बन जाती है। 
यदि वही बूंद सीप के मुंह में जाती है, तो एक कीमती मोती बन जाती है। 
और यदि वही बूंद सांप (भुजंग) के मुंह में चली जाए, तो प्राणघातक जहर बन जाती है।

पानी की बूंद वही थी, लेकिन संगति बदलते ही उसका मूल्य और उसका स्वभाव पूरी तरह बदल गया।

यही बात विज्ञान भी साबित करता है। न्यूरोसाइंस में इसे ‘मिरर न्यूरॉन्स’ (Mirror Neurons) कहा जाता है। जब आप लगातार नकारात्मक, निराश या दूसरों की बुराई करने वाले लोगों के बीच उठते-बैठते हैं, तो आपका दिमाग बिना आपकी मर्ज़ी के उनकी आदतों और तनाव को सोखने लगता है। आप चाहकर भी सकारात्मक नहीं रह पाते। इसके विपरीत, यदि आप ऊर्जावान और ज्ञानी लोगों के साथ बैठते हैं, तो आपकी मानसिक क्षमता अपने आप बढ़ने लगती है।

मन की शंका का सीधा समाधान
अब यहाँ एक व्यावहारिक सवाल उठता है : “हम नौकरी करते हैं, बिजनेस करते हैं या कॉलेज जाते हैं; वहाँ हमें हर तरह के लोग मिलते हैं। हम चाहकर भी बुरे या नकारात्मक लोगों से दूर नहीं भाग सकते। तो फिर हम इस नियम का पालन कैसे करें?”

तुलसीदास जी यह नहीं कह रहे कि आप नौकरी छोड़ दें या लोगों से लड़ना शुरू कर दें। संगति दो तरह की होती है—एक शारीरिक और दूसरी मानसिक। आप शारीरिक रूप से किसी के भी पास बैठे हों, लेकिन आपके मानसिक विचार किसके साथ जुड़े हैं, यह मायने रखता है।

यदि आपके पास अच्छी संगति के लोग नहीं हैं, तो महान संतों की किताबें, अच्छे पॉडकास्ट या सकारात्मक विचार ही आपकी संगति बन सकते हैं। जब आपका आंतरिक सुरक्षा कवच मजबूत होगा, तो बाहर की नकारात्मकता आपके भीतर प्रवेश नहीं कर पाएगी। जैसे कीचड़ में रहकर भी कमल अपनी पवित्रता नहीं खोता।

आज के जीवन के लिए व्यावहारिक सूत्र
★ अपनी डिजिटल संगति बदलें : सुबह उठते ही सोशल मीडिया पर ट्रोलिंग, क्राइम न्यूज़ या नकारात्मक रील्स देखना बंद करें। वह आपके दिन की पहली और सबसे खराब संगति है।

★ गॉसिप से दूरी : जो व्यक्ति आपके सामने किसी तीसरे की बुराई कर रहा है, वह निश्चित रूप से दूसरों के सामने आपकी भी बुराई करता होगा। ऐसे लोगों को अपनी ‘इनर सर्कल’ से तुरंत बाहर करें।

★ ऊर्जा का दान : कोशिश करें कि जब कोई आपसे मिले, तो वह आपकी संगति से कुछ सकारात्मक लेकर जाए, न कि मानसिक तनाव।