Amrut Vaani in Hindi Motivational Stories by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 26

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अमृत वाणी - संत वाणी - 26

संत श्रीसाईं बाबा की यह वाणी किसी भी जीव की भूख को शांत करने और अपनी क्षमता के अनुसार दान करने का सच्चा मार्ग समझाती है।

“जो भूखा है उसे पहले भोजन दो, फिर मुझे भोग लगाओ।
यदि तुम किसी जरूरतमंद को दुत्कारते हो, तो तुम मुझे दुत्कारते हो।”

साईं बाबा कहते हैं कि यदि तुम्हारे द्वार पर कोई भूखा या लाचार व्यक्ति आता है, तो मंदिर में आकर मेरी मूर्ति के आगे छप्पन भोग लगाने से पहले उस भूखे इंसान का पेट भरो। यदि तुम अपने जीवन में किसी गरीब या असहाय जीव का अनादर करते हो या उसे अपने दरवाजे से खाली हाथ भगा देते हो, तो समझो कि तुमने साक्षात मुझे अपने द्वार से दुत्कार कर भगा दिया है।

अक्सर लोग इन बातों को सुनकर सोचते हैं कि क्या भगवान की पूजा करना, व्रत रखना या मंदिरों में प्रसाद चढ़ाना गलत बात है? लेकिन साईं बाबा यहाँ भक्ति या पूजा-पाठ का विरोध नहीं कर रहे हैं, बल्कि वे हमें यह समझा रहे हैं कि असली भक्ति किसी मूर्ति के सामने आंखें बंद करने से पहले अपनी आंखें खोलकर समाज के दुखों को देखने में है। इस संसार में जब कोई व्यक्ति बहुत संपन्न हो जाता है, तो वह मंदिरों में सोने के मुकुट और कीमती थालियां तो चढ़ाता है, लेकिन अपने घर के बाहर बैठे भिखारी को देखकर मुंह फेर लेता है। बाबा कहते हैं कि अमीर बनकर मंदिरों में दिखावा करना बहुत आसान है, पर किसी भूखे को देखकर अपने हिस्से की रोटी उसके साथ बांटना ही आपके जीवन की असली वेल्यू तय करता है।

गहरे अर्थ की व्याख्या
सिर्फ बाहरी रूप से माला जपना या खुद को बहुत बड़ा भक्त दिखाना मन को एक झूठी संतुष्टि देता है। लेकिन जब तक हमारे भीतर करुणा और दया का भाव जागृत नहीं होता, तब तक वह सारी पूजा-पाठ अधूरी और बेअसर रहती है। जो व्यक्ति समाज में बड़ी-बड़ी धार्मिक यात्राएं करता है लेकिन अपने रोजमर्रा के जीवन में किसी लाचार की मजबूरी का उपहास उड़ाता है, उसकी वह भक्ति परमात्मा के दरबार में कभी स्वीकार नहीं होती। जब मनुष्य अपने भीतर के अहंकार को छोड़कर हर जीव में उसी एक ईश्वर का अंश देखने लगता है और बिना किसी भेदभाव के सेवा करता है, तभी उसे शिरडी या किसी भी तीर्थ पर जाए बिना घर बैठे ही परम आनंद की प्राप्ति हो जाती है।

व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप एक बहुत ही सरल और दैनिक जीवन के उदाहरण से समझ सकते हैं। आपके पास एक ऐसा समृद्ध परिवार आता है जो हर गुरुवार को साईं बाबा के मंदिर में जाकर क्विंटलों से बूंदी के लड्डू बांटता है, कीमती चादरें चढ़ाता है और बाबा की पालकी के आगे घंटों नाचता है। लेकिन वही परिवार जब अपने घर लौटता है, तो कड़ाके की ठंड में कांप रहे अपनी ही कॉलोनी के बूढ़े चौकीदार को एक पुरानी शॉल या चाय तक देने से मना कर देता है। उनका यह मंदिर का दान उस चौकीदार के प्रति दिखाई गई निष्ठुरता को कभी छुपा नहीं सकता। लोग और उनका खुद का विवेक उनके इस दिखावे के पीछे छिपे उस खोखलेपन को तुरंत पहचान लेते हैं और उनका यह आचरण उनकी भक्ति को झूठा साबित कर देता है।

ठीक इसी तरह, शिरडी साईं बाबा के साक्षात् जीवन का एक बहुत ही सुंदर प्रसंग आता है। शिरडी में एक महिला हर गुरुवार बाबा के लिए बड़े चाव से पूरनपोली (एक प्रकार की मीठी रोटी) बनाती थी। एक दिन जब वह बाबा के पास जा रही थी, तो रास्ते में उसे एक बहुत ही बीमार और भूखा कुत्ता मिला जो भूख से तड़प रहा था। महिला को उस पर दया आ गई और उसने बाबा के लिए बनाई हुई सारी रोटियां उस कुत्ते को खिला दीं। बाद में जब वह खाली हाथ रोती हुई बाबा के पास पहुंची और माफ़ी मांगने लगी, तो बाबा खिलखिलाकर हंस पड़े और बोले कि बेटी, आज तेरा भोग मुझे मिल गया और मेरा पेट पूरी तरह भर गया है। जब महिला ने हैरान होकर पूछा कि बाबा आप तो यहाँ बैठे थे, आपको भोग कैसे मिला? तब बाबा ने कहा कि उस भूखे कुत्ते के रूप में साक्षात् मैं ही था। हर जीव के भीतर छिपी भूख और प्यास मेरी ही भूख-प्यास है। इसे ही सेवा की सच्ची शुद्धता कहते हैं।

विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका आ सकती है कि क्या फिर हमें केवल समाज सेवा ही करनी चाहिए और ईश्वर की पूजा-अर्चना बिल्कुल बंद कर देनी चाहिए? साईं बाबा साधना या प्रार्थना करने से मना नहीं करते। वह सिर्फ यह समझा रहे हैं कि आपकी पूजा तब तक अधूरी है, जब तक आप सृष्टि के कण-कण में भगवान को न देख सकें। धार्मिक होने का मतलब दुनिया से अलग होना नहीं है। असली धार्मिक व्यक्ति वह है, जो मंदिर के गर्भगृह में बैठे भगवान को पूजने के साथ-साथ सड़क पर बैठे उस गरीब नारायण की सेवा करना भी जानता है।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति को केवल उसकी लंबी-लंबी प्रार्थनाओं या धार्मिक आयोजनों से बड़ा भक्त न समझें। चाहे कोई समाज में कितना भी बड़ा आध्यात्मिक होने का दावा करे, जब तक उसके हृदय में गरीबों के लिए दया नहीं है, तब तक उसकी भक्ति खोखली है।

★ जब हमें यह समझ आ जाती है कि किसी भूखे को अन्न और प्यासे को पानी देना ही ईश्वर की सबसे बड़ी आराधना है, तो हमारे भीतर का यह घमंड पूरी तरह टूट जाता है कि “मैं बहुत बड़ा पूजा-पाठ करने वाला व्यक्ति हूँ।” अपनी क्षमता के अनुसार दूसरों की मदद करना, बिना किसी भेदभाव के हर जीव का आदर करना और हर परिस्थिति में ‘सबका मालिक एक’ के भाव को स्वीकार करना ही ईश्वर की सच्ची भक्ति और पुण्य है।

आज की पावन प्रार्थना
“प्रभु, मुझे वह दिव्य दृष्टि दें कि मैं मंदिर के गर्भगृह के साथ-साथ सड़क पर बैठे गरीब नारायण और हर जीव में आपके ही रूप को देख सकूँ। बिना किसी भेदभाव के सबकी सेवा करना और ‘सबका मालिक एक’ के भाव को जीना ही मेरी सच्ची आराधना बने। मैं कभी किसी जरूरतमंद को अपने द्वार से खाली हाथ न लौटाऊँ, बल्कि हर जीव में आपके ही रूप को देख सकूं। 🙏”