भारत के कश्मीर प्रांत की चौदहवीं शताब्दी की परम सिद्ध योगिनी और रहस्यवादी संत लल्लेश्वरी जी (जिन्हें कश्मीरी भाषा में लाल द्यद या लल्ला भी कहा जाता है) की एक अत्यंत प्रसिद्ध और अद्भुत अमृत वाणी (वाख) यहाँ दी गई है। उनकी काव्य-शैली को ‘वाख’ कहा जाता है। यह वाणी हमारे जीवन में संतुलन (Balance) और समभाव रखने का असली रास्ता दिखाती है।
“खा-खाकर कुछ पाएगा नहीं,
न खाकर बनेगा अहंकारी।
सम खा तभी होगा समभावी,
खुलेगी साँकल बंद द्वार की।।”
हिंदी अर्थ : यदि तुम केवल संसार के भोगों और सुख-सुविधाओं में डूबे रहोगे, तो जीवन में कभी भी आत्मज्ञान या सच्ची शांति नहीं पा सकोगे। इसके विपरीत, यदि तुम सब कुछ छोड़-छाड़कर हठपूर्वक त्याग करने लगोगे और भूखे रहोगे, तो तुम्हारे मन में इस बात का घमंड पैदा हो जाएगा कि तुम बहुत बड़े त्यागी हो। इसलिए अपने जीवन में संतुलन (सम) लाओ; न तो बहुत ज्यादा भोग करो और न ही बहुत ज्यादा हठपूर्वक त्याग करो। जब तुम संतुलित होकर रहोगे, तभी तुम्हारे भीतर समभाव पैदा होगा और अज्ञानता के कारण बंद पड़े बुद्धि के द्वार की सांकल (कुंडी) अपने आप खुल जाएगी।
अक्सर लोग इस बात को सुनकर दुविधा में पड़ जाते हैं कि क्या फिर अध्यात्म के रास्ते पर चलने के लिए वैराग्य या तपस्या करना बिल्कुल गलत है? क्या हमें अपनी इच्छाओं पर नियंत्रण नहीं रखना चाहिए? लेकिन संत लल्लेश्वरी जी यहाँ किसी नियम या साधना का विरोध नहीं कर रही हैं। वे केवल हमारे मन की उस आदत से सचेत कर रही हैं जो हमेशा एक छोर से दूसरे छोर पर भागती है। इस संसार में जब कोई व्यक्ति धर्म के मार्ग पर चलता है, तो वह अक्सर सोचता है कि सब कुछ छोड़ देना ही भक्ति है। संत कहती हैं कि हठ करना बहुत आसान है, पर अपनी रोजमर्रा की आदतों को नियंत्रण में रखकर सहज जीवन जीना ही आपके भीतर के सच्चे बदलाव को दर्शाता है।
गहरे अर्थ की व्याख्या
इंसानी मन की यह कमजोरी है कि वह कभी संतुलन में नहीं रहता। या तो इंसान संसार के भोग-विलास में इतना अंधा हो जाता है कि उसे सही-गलत का होश ही नहीं रहता, या फिर वह सब कुछ छोड़कर संन्यासी बनने के चक्कर में अपने भीतर एक नए किस्म का घमंड पाल लेता है। संत लल्लेश्वरी जी इसी मानसिक बीमारी की दवा देती हैं। वे कहती हैं कि जीवन की सार्थकता किसी भी चीज़ की ‘अति’ में नहीं है। यदि आप केवल सांसारिक सुखों को इकट्ठा करने में लगे हैं, तो आपकी चेतना कभी ऊपर नहीं उठ पाएगी। लेकिन अगर आप जबरदस्ती खुद को कष्ट देकर समाज से कट जाते हैं, तो आपका अहंकार और बड़ा हो जाता है कि “देखो, मैं कितना बड़ा महात्मा हूँ और बाकी सब पापी हैं।” असली अध्यात्म तो ‘सम’ यानी संतुलन में है। जब आप संसार में रहते हुए भी उसके मोह से दूर रहते हैं, तब आपके भीतर एक समता का भाव पैदा होता है, और यही समता ईश्वर के द्वार का रास्ता खोलती है।
व्यावहारिक उदाहरण
इसे आप अपने दैनिक जीवन के स्वास्थ्य और आहार के उदाहरण से बहुत सरलता से समझ सकते हैं। मान लीजिए एक व्यक्ति दिन-रात केवल बाहर का जंक फूड, मिठाइयां और भारी भोजन खाता रहता है। कुछ ही समय में उसका शरीर अस्वस्थ हो जाएगा और वह बीमारियों का घर बन जाएगा। इसके विपरीत, यदि कोई दूसरा व्यक्ति वजन कम करने या खुद को बहुत बड़ा तपस्वी दिखाने के लिए कई दिनों तक बिल्कुल खाना छोड़ दे और केवल पानी पर रहे, तो वह कमजोरी के कारण बीमार पड़ जाएगा और उठने लायक भी नहीं रहेगा। स्वास्थ्य का असली नियम यह है कि आप अपनी भूख के अनुसार पौष्टिक और संतुलित आहार लें, जिससे शरीर को ऊर्जा मिले। जीवन की गाड़ी भी ठीक इसी संतुलन से चलती है, जहाँ न तो बहुत ज्यादा विलासिता हो और न ही बहुत ज्यादा कड़ा अभाव।
इसके विपरीत, खुद संत लल्लेश्वरी जी के साक्षात् जीवन का एक बहुत ही सुंदर प्रसंग आता है। उनका विवाह बहुत कम उम्र में हो गया था और उनकी सासू माँ उनके साथ बहुत बुरा व्यवहार करती थीं। वे लल्लेश्वरी जी को खाने के लिए कटोरे में एक बड़ा पत्थर रखकर उसके ऊपर चावल की एक पतली परत बिछा देती थीं ताकि बाहर से देखने वालों को लगे कि बहू को बहुत सारा खाना दिया गया है। लल्लेश्वरी जी ने कई सालों तक इस कष्ट को बिना किसी शिकायत के सहा। उन्होंने न तो क्रोध में आकर ससुराल का त्याग किया और न ही भोजन की लालसा में कभी कोई विवाद किया। वे भूखी रहकर भी अपने मन को हमेशा शांत रखती थीं क्योंकि वे समझ चुकी थीं कि शरीर की इस भूख से कहीं ज्यादा जरूरी मन की तृप्ति है। उनके इसी मौन और संतुलित भाव ने आगे चलकर उन्हें कश्मीर की सबसे पूजनीय योगिनी बना दिया।
विरोधाभास का समाधान
यहाँ मन में यह शंका उठ सकती है कि क्या फिर हमें तरक्की करने, अच्छे कपड़े पहनने या आधुनिक सुखों का आनंद लेने का कोई अधिकार नहीं है? लल्लेश्वरी जी संसार से भागने को नहीं कहती हैं। वे सिर्फ यह समझा रही हैं कि साधनों का उपयोग करो, लेकिन उनके गुलाम मत बनो। अमीर होना या अच्छी सुविधाएं पाना कोई पाप नहीं है, बशर्ते आपकी खुशी उन साधनों की मोहताज न हो। असली समझदार व्यक्ति वह है, जो महलों में रहकर भी अपने भीतर से उतना ही सरल और अनासक्त रहता है जितना कि एक झोपड़ी में रहने वाला साधु।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ किसी भी व्यक्ति की महानता उसके कड़े व्रतों या बाहरी दिखावे से नहीं आंकी जा सकती। चाहे कोई समाज में कितना भी बड़ा तपस्वी होने का दावा करे, जब तक उसके भीतर समभाव और सहजता नहीं है, उसका चरित्र अधूरा है।
★ जब हमारे भीतर यह गहरी समझ आ जाती है कि जीवन का असली आनंद अति में नहीं बल्कि संतुलन में है, तो हमारे मन का यह घमंड पूरी तरह टूट जाता है कि “मैं दूसरों से ज्यादा त्यागी हूँ।” अपनी सीमाओं को जानना, हर परिस्थिति में संयम रखना और मन को शांत रखना ही जीवन की सबसे बड़ी उपलब्धि है।
आज की पावन प्रार्थना
“हे परमात्मा, मुझे जीवन में समता और संतुलन का वरदान दें। मेरे मन को ऐसा संयम दें कि मैं न तो संसार के भोगों में अंधा बनूँ और न ही त्याग के झूठे घमंड में डूबूँ, बल्कि हर हाल में सहज रहकर आपके सत्य को पहचान सकूं। 🙏”