Amrut Vaani in Hindi Motivational Stories by Nitya Oswal books and stories PDF | अमृत वाणी - संत वाणी - 35

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अमृत वाणी - संत वाणी - 35

“भीखा बात अगम की, कहन सुनन की नाहिं।
जो जाने सो कहे नहीं, कहे सो जाने नाहिं॥”

संत भीखा साहब कहते हैं कि वह परम सत्य (परमात्मा का अनुभव) अत्यंत अगम्य और गहरा है, वह केवल मुँह से कहने या कानों से सुनने की वस्तु नहीं है। जिसे वास्तव में उस दिव्य आनंद का अनुभव हो जाता है, वह मौन हो जाता है। इसके विपरीत, जो केवल ऊपरी दावों और अहंकार के जरिए बड़ी-बड़ी बातें करता है, वास्तव में उसने उस सत्य को जाना ही नहीं है।

गहरे अर्थ की विस्तृत व्याख्या
इस वाणी में भीखा साहब आध्यात्मिक अनुभव की ‘अनिर्वचनीयता’ (जिसे शब्दों में बयां न किया जा सके) को रेखांकित कर रहे हैं। ईश्वर कोई किताबी ज्ञान या बौद्धिक बहस का विषय नहीं हैं, वे तो अनुभूति (Feel) का विषय हैं। जैसे गूंगे को गुड़ खिला दिया जाए, तो वह स्वाद का आनंद तो पूरा लेता है, लेकिन शब्दों में उसका स्वाद किसी को बता नहीं सकता; ठीक वैसी ही स्थिति उस साधक की होती है जिसका मन परमात्मा के प्रेम में डूब जाता है। जो लोग केवल धर्म के नाम पर शास्त्रार्थ करते हैं, बहस करते हैं या खुद को बड़ा ज्ञानी दिखाते हैं, वे केवल बाहरी किनारे पर बैठे हैं। जो गहरे समुद्र में डूब गया, वह तो शांत हो जाता है।

विरोधाभास का समाधान
कुछ लोगों को इस वाणी को सुनकर यह विरोधाभास आ सकता है कि यदि ‘जो जानता है वह कहता नहीं’, तो फिर स्वयं भीखा साहब या कबीर, नामदेव आदि संतों ने यह वाणियाँ क्यों रचीं? उन्होंने उपदेश क्यों दिए? उपदेश देने वाले सभी संत अज्ञानी थे?

बिल्कुल नहीं। वाणी में “कहे” शब्द का प्रयोग ‘अहंकार और दावों’ के संदर्भ में हुआ है, ‘करुणा और उपदेश’ के संदर्भ में नहीं।

जो व्यक्ति केवल अपनी विद्वता का ढोंग करने के लिए, संतों की बातें चुराकर मंचों पर चिल्लाता है और खुद को भगवान का ठेकेदार घोषित करता है, भीखा साहब का संकेत उन्हीं के लिए है कि ‘कहे सो जाने नाहिं’ —यानी जो बड़े-बड़े खोखले दावे कर रहा है, उसने असल में कुछ नहीं जाना।

इसके विपरीत, जब कबीर, नामदेव, या भीखा साहब जैसे महापुरुष बोलते हैं, तो वे कोई दावा नहीं कर रहे होते। वे तो तड़पकर गाते हैं। उनकी वाणी उनके भीतर से स्वतः फूटने वाला झरना है। वे उस परमात्मा का ‘स्वाद’ बताने के लिए नहीं बोलते, बल्कि हमें उस स्वाद को चखने का ‘रास्ता’ दिखाने के लिए बोलते हैं। संत कभी यह दावा नहीं करते कि वे ईश्वर को शब्दों में बांध रहे हैं। उनकी वाणी तो केवल एक ‘इशारा’ (Pointer) है। जैसे सड़क पर लगा बोर्ड आपको मंजिल का रास्ता दिखाता है, वह खुद मंजिल नहीं होता। ठीक वैसे ही, संतों की वाणी हमें मौन और साधना की ओर ले जाने का माध्यम है। इसलिए संतों की वाणी को कोरी बातें समझना सबसे बड़ी भूल होगी, क्योंकि यह मात्र शब्द नहीं बल्कि साक्षात अनुभव का प्रकाश है।

जीवन के लिए मुख्य सीख
★ अनुभव को महत्व दें : केवल संतों की वाणियाँ पढ़ना या सुनना काफी नहीं है; हमारा लक्ष्य उस अवस्था को स्वयं अनुभव करना होना चाहिए जिसके बारे में संतों ने लिखा है।

★ दिखावे और बहस से दूरी : अपने ज्ञान, अपनी पूजा-पाठ या अपनी अच्छाई का कभी ढिंढोरा न पीटें। धर्म या अध्यात्म के नाम पर व्यर्थ के तर्कों में अपनी ऊर्जा नष्ट न करें। साधना जितनी गुप्त होगी, उतनी ही गहरी होगी।

★ आंतरिक मौन का अभ्यास : दिनभर में कुछ समय ऐसा निकालें जब आप पूरी तरह शांत बैठें—न कुछ बोलें, न सोशल मीडिया चलाएं, बस अपने भीतर की शांति को महसूस करें।

आज की पावन प्रार्थना
“हे मौन स्वरूप और परम आनंदमयी प्रभु! मुझे शब्दों के इस मायाजाल और झूठे ज्ञान के अहंकार से मुक्त करो। मेरा मन बाहरी दुनिया की व्यर्थ की बहसों से हटकर आपके चरणों की शांति में लीन हो जाए। मुझे वह आंतरिक दृष्टि दें जिससे मैं आपको शब्दों में नहीं, बल्कि अपने ही हृदय की गहराइयों में महसूस कर सकूं। 🙏”