महाराज भर्तृहरि की वाणी
महाराज भर्तृहरि उज्जैन के महान राजा थे, जिन्होंने वैराग्य होने पर राजपाठ त्याग दिया और परम योगी बने। उनकी रचनाएँ ‘नीतिशतकम्’ और ‘वैराग्यशतकम्’ आज के व्यावहारिक जीवन के लिए सबसे सटीक मार्गदर्शन करती हैं।
“भोगा न भुक्ता वयमेव भुक्ताः, तपो न तप्तं वयमेव तप्ताः।
कालो न यातो वयमेव याताः, तृष्णा न जीर्णा वयमेव जीर्णाः॥”
( हमने भोगों (साधनों) का उपभोग नहीं किया, बल्कि भोगों ने ही हमें खा लिया। हमने तप नहीं किया, बल्कि हम खुद ही चिंताओं की आग में तप गए। समय नहीं बीता, बल्कि हमारा जीवन बीत गया। हमारी इच्छाएं (तृष्णा) बूढ़ी नहीं हुईं, बल्कि हम खुद बूढ़े होकर नष्ट हो गए। )
महाराज भर्तृहरि के इस गहरे श्लोक को अक्सर लोग बहुत निराशावादी समझ लेते हैं। वे सोचते हैं कि भर्तृहरि जी हमें जीवन का आनंद लेने से मना कर रहे हैं, या वे कह रहे हैं कि दुनिया की अच्छी चीज़ों का इस्तेमाल करना ही पाप है। लेकिन असल में यह विचार जीवन से मुंह मोड़ने का नहीं, बल्कि इंसान को इच्छाओं की गुलामी से आज़ाद कराके सच्ची आंतरिक शांति देने की सबसे बड़ी प्रेरणा है।
गहरे अर्थ की व्याख्या
यहाँ ‘भोग’, ‘समय’ और ‘तृष्णा’ (इच्छा) के माध्यम से इंसान की अंतहीन अंधी दौड़ को समझाया गया है। एक राजा के रूप में सर्वसुख भोगने के बाद भर्तृहरि जी को यह ज्ञान हुआ कि इंसान जिन भौतिक चीज़ों (पैसे, वासना, सुख-सुविधाओं) को अपनी मुट्ठी में करना चाहता है, धीरे-धीरे वे चीज़ें ही इंसान को अपनी मुट्ठी में कर लेती हैं। इंसान सोचता है कि वह समय को काट रहा है, लेकिन असल में समय इंसान की उम्र को काट रहा होता है। कबीर जी की मिट्टी वाली चेतावनी की तरह ही, महाराज भर्तृहरि यहाँ इंसान को याद दिला रहे हैं कि जब तक तुम बाहरी चीज़ों में सुख ढूंढोगे, तुम हमेशा खाली हाथ रहोगे।
व्यावहारिक उदाहरण
हमारा यह मन वैज्ञानिक रूप से भी एक ऐसी आग की तरह है जिसमें आप जितनी इच्छाओं का घी डालेंगे, वह आग उतनी ही तेज भड़केगी। आज के दौर में लोग नया मोबाइल, गाड़ी या बड़ा घर खरीदते हैं ताकि उन्हें खुशी मिले। लेकिन कुछ ही दिनों में उनका मन उससे भर जाता है और वे और बड़ी चीज़ के पीछे भागने लगते हैं। यानी जब तक सांसें हैं, तब तक हम इच्छाओं के पीछे भागती हुई “एक प्यासी आत्मा” हैं और मौत आते ही हमारा शरीर “शांत राख” बन जाता है।
विरोधाभास का समाधान
अब मन में यह सवाल उठ सकता है कि अगर इच्छाएं ही दुख का कारण हैं, तो क्या हम तरक्की करना छोड़ दें? क्या हम पैसा कमाना या अच्छे कपड़े पहनना बंद कर दें? भर्तृहरि जी कर्म छोड़ने या गरीबी में जीने को नहीं कह रहे हैं। वे बस यह समझा रहे हैं कि चीज़ों का इस्तेमाल करो, लेकिन उन्हें खुद का मालिक मत बनने दो। संपत्ति और शरीर भले ही एक दिन समय के साथ नष्ट हो जाएं, लेकिन आपकी संतुष्टि, मानसिक शांति और निस्वार्थ भाव से किए गए कार्य कभी बूढ़े नहीं होते। यही वो सच्ची कमाई है जो इंसान को चिंताओं से मुक्त करती है।
जीवन के लिए मुख्य सीख
★ संतोष का महत्व : इच्छाओं का कोई अंत नहीं है। आपके पास जो है, उसमें खुश रहना सीखें, नहीं तो पूरी ज़िंदगी सिर्फ ‘और ज़्यादा’ पाने की भूख में बीत जाएगी।
★ समय का सम्मान : समय सबसे कीमती धन है। इसे केवल सोशल मीडिया पर स्क्रॉल करने या दूसरों से ईर्ष्या करने में बर्बाद करने के बजाय अपनी आत्मा की उन्नति में लगाएं।
★ आंतरिक स्वतंत्रता : किसी भी बाहरी चीज़ (पद, पैसे, या व्यक्ति) पर इस कदर निर्भर न हों कि उसके बिना आप खुद को अधूरा या दुखी महसूस करने लगें।
आज का संकल्प
“मैं आज से इच्छाओं की अंधी दौड़ में शामिल नहीं होऊँगा और अपने भीतर छिपे सच्चे सुख व संतोष को पहचानूँगा।” 🙏