(जंगल में चारों तरफ डेविल्स घिरे हैं। सिमरन अकेली है, इंसान होने के नाते उसका दिल तेज़ धड़क रहा है, लेकिन उसका दिमाग़ शांत और तेजी से काम कर रहा है।)
“सिमरन इंसान थी, लेकिन इंसान का दिमाग़ देवियों और शैतानों के मुकाबले तेज़ और चालाक होता है।
उसने हर खतरे का आकलन किया और अपनी सूझबूझ का इस्तेमाल करने का फैसला किया।”
(सिमरन चारों डेविल्स की स्थिति देखती है, पेड़ों की शाखाओं, पत्तों और झाड़ियों को ध्यान में रखती है।)
सिमरन (अपने आप से, फुसफुसाती हुई) बोली -
“अगर मैं सिर्फ डरूंगी तो हम हार जाएंगे…
मैं करण जी को बचाऊंगी, चाहे कुछ भी हो।”
(वो पास के पेड़ की शाखा खींचती है, जमीन पर पत्तों और पत्थरों को सावधानी से खिसकाती है ताकि डेविल्स फंस जाएँ।
एक डेविल फंसता है और गिर पड़ता है। दूसरा ध्यान भटकता है। सिमरन पीछे झुककर तेज़ी से एक पत्थर फेंकती है, जिससे तीनों डेविल्स आपस में टकरा जाते हैं।)
“सिमरन ने अपने इंसानी दिमाग़ और तेज़ सोच से, डेविल्स के बीच फूट डाल दी।
हर कदम, हर चाल उसके बुद्धिमत्ता और साहस का परिचायक थी।”
(करण लड़ाई में व्यस्त है, लेकिन वह देखता है कि सिमरन ने उसके चारों ओर की स्थिति बदल दी। उसका दिल खुशी और गर्व से भर जाता है।)
करण (गुस्से और राहत में) बोला -
“सिमरन… तुमने… तुम्हारा दिमाग़ ही हमारी जीत की कुंजी बन गया!”
(सिमरन हल्की मुस्कान के साथ चारों ओर देखती है। वो जानती है कि उसने करण के लिए रास्ता खोल दिया है।)
(जंगल में चारों तरफ डेविल्स गुस्से में हैं, लेकिन सिमरन का इंसानी दिमाग़ तेज़ी से काम कर रहा है। वह मौका पाकर करण को पकड़ती है।)
“सिमरन ने मौके का फायदा उठाया।
उसने करण का हाथ पकड़कर तेजी से जंगल की ओर भागना शुरू किया।
डेविल्स उसे रोक नहीं पाए। उनके पैरों की आवाज़ पीछे पड़ रही थी, लेकिन सिमरन का साहस और चालाकी उसे आगे बढ़ाती रही।”
(करण थोड़ी हिचकिचाहट के साथ सिमरन के पीछे भागता है। उसकी चोटें अभी भी महसूस हो रही हैं, लेकिन सिमरन की हिम्मत उसे मजबूत बनाती है।)
सिमरन (तेज़ आवाज़ में, लेकिन डरी नहीं) बोली -
“करण जी! जल्दी! यहाँ से निकलना होगा!”
(वे दोनों झाड़ियों और पेड़ों के बीच से तेज़ी से निकलते हैं। रात की अंधेरी में उनकी परछाईं लगातार आगे बढ़ती हैं।)
“सिमरन का इंसानी दिमाग़ और उसका साहस उन्हें सुरक्षित जगह तक ले गया।
वे दोनों सांस लेते हुए, आख़िरकार एक सुरक्षित जगह पर पहुँच गए।
डेविल्स अब उनके बहुत दूर थे।”
(करण सिमरन को देखता है, उसकी आँखों में आभार और प्यार झलकता है। सिमरन भी थककर लेकिन संतुष्ट मुस्कुरा रही है।)
करण (धीरे से, राहत में) बोला -
“सिमरन… तुमने मेरी जान बचाई… तुम्हारे बिना मैं कुछ भी नहीं।”
सिमरन (हल्की मुस्कान के साथ) बोली -
“हम दोनों साथ हैं… और अब कोई हमें नुकसान नहीं पहुंचा सकता।”
“इंसानी दिमाग़ और साहस कभी कमज़ोर नहीं होता।
सिमरन और करण ने अपनी सूझबूझ और विश्वास से खुद को बचाया।
अब उनका सफ़र नए अध्याय की ओर बढ़ने वाला था।”
(सुरक्षित जगह पर, करण जमीन पर बैठा है। उसकी चोटें अभी भी हैं, लेकिन अब वह धीरे-धीरे साँस ले रहा है। सिमरन उसके पास बैठी है, उसका हाथ पकड़कर उसे सहारा देती है।)
“सुरक्षित होने के बाद भी, करण का शरीर और आत्मा थके हुए थे।
सिमरन उसके पास बैठी थी, उसकी साँसों और धड़कनों को महसूस कर रही थी।
इंसानी मासूमियत और प्यार की ताक़त ने उसे अब धीरे-धीरे ठीक होना शुरू कर दिया।”
सिमरन (धीरे से, प्यार भरे स्वर में) बोली -
“करण जी… अब आपको डरने की ज़रूरत नहीं।
मैं हमेशा आपके पास हूँ।”
(करण उसकी आँखों में देखता है। उसकी लाल आँखों की चमक धीरे-धीरे कम हो रही है।)
करण (धीरे से, हल्की मुस्कान के साथ) बोला -
“सिमरन… तुम्हारे बिना मैं कुछ भी नहीं।
तुमने मुझे बचाया… और मेरा दिल भी।”
(सिमरन उसके गले लग जाती है। करण उसे अपनी बाहों में कसकर पकड़ लेता है। उनके बीच सन्नाटा है, लेकिन वह सन्नाटा अब डर का नहीं, भरोसे और प्यार का है।)
“अंधेरी रात की घटनाओं और खतरों के बाद,
सिमरन और करण ने एक-दूसरे में नई ताक़त और विश्वास पाया।
इंसानी दिमाग़ और साहस, और प्यार की गहराई ने उन्हें बचा लिया।
अब उनका सफ़र न केवल जीवित रहने का था, बल्कि साथ रहने और प्यार करने का भी था।”
( सिमरन और करण हाथ में हाथ डाले, रात की ठंडी हवा में, सुरक्षित और मजबूत।)
(सुबह की हल्की धूप पहाड़ों से छनकर आ रही है। दूर किसी छोटे से गाँव में एक पुराना, शांत घर — वहीं अब करण और सिमरन ने शरण ली है।)
सिमरन (रसोई में धीरे-धीरे काम करते हुए) बोली -
“शायद अब सब ठीक हो जाएगा… भगवान करे करण जी ठीक हो जाएं।”
(वो खिड़की से बाहर झाँकती है — करण आँगन में बैठा है, सूरज की रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही है। उसकी आँखें अब शांत लग रही हैं।)
“रातों की दहशत और ख़ून की कहानी के बाद,
सुबह पहली बार इतनी सुकूनभरी लगी थी।”
(सिमरन उसके पास आती है, हाथ में चाय का प्याला।)
सिमरन (धीरे से मुस्कुराते हुए) बोली -
“लीजिए... गरम चाय, थोड़ा सुकून भी साथ है।”
करण (हल्की मुस्कान के साथ) बोला -
“तुम्हारी ये मुस्कान... मुझे कहीं देखा हुआ लगता है...
पर याद नहीं आ रहा कि कहाँ…”
(सिमरन की आँखों में आँसू भर आते हैं, पर वो खुद को संभाल लेती है। क्योंकि वो जबसे करण से मिली थी ज्यादा मुस्कुरा नहीं पाई थी हमेशा डरी सहमी सी रहती थी। कभी करण से, कभी उसकी प्यास से, कभी उसके प्यार से और कभी उसे खो देने से।)
सिमरन बोली -
“शायद... पिछले जनम में मिले होंगे हम। क्योंकि..... खैर छोड़िए।”
(दोनों हँसते हैं — पर उस हँसी के पीछे दर्द छिपा है।)
“कभी-कभी ज़िंदगी दोबारा मौका तो देती है,
पर अतीत की परछाइयाँ साथ लाना नहीं छोड़ती।”
(अचानक, करण का चेहरा बदलता है — उसे किसी आवाज़ का अहसास होता है।)
करण (सावधान होकर) बोला -
“सिमरन... दरवाज़ा बंद करो…”
(सिमरन चौंकती है, दरवाज़े की ओर देखती है — बाहर कोई खड़ा है। काले कपड़ों में एक आदमी... उसकी आँखें लाल हैं, होंठों पर मुस्कान खतरनाक।)
रुद्र की आवाज़ (दरवाज़े के बाहर से) बोला -
“छिप सकते हो करण...
पर मुझसे बच नहीं सकते...”
(सिमरन डर के मारे करण के पीछे छिप जाती है। करण की आँखों में अब पुरानी चमक लौट आती है — वो फिर से वही डेविल मोड में आने लगता है।)
“प्यार और शांति की जो सुबह अभी उगी थी...
वो अब एक नए ख़ून के तूफ़ान में बदलने वाली थी…”
( दरवाज़े के बाहर रुद्र खड़ा है, हवा तेज़ चलने लगती है, पेड़ों की डालियाँ हिलने लगती हैं। सन्नाटा अब एक चेतावनी बन चुका है।)
रात का अंधेरा फैल चुका है। आसमान में बादल गरज रहे हैं, बिजली चमकती है। हवाओं की आवाज़ में डर छिपा है।)
(रुद्र दरवाज़ा तोड़कर अंदर आता है। करण खड़ा होने की कोशिश करता है, पर उसका शरीर थरथरा रहा है — ज़ख्म अब भी ताज़ा हैं।)
रुद्र (तेज़ हँसी के साथ) बोला -
“क्या हुआ करण? वो ताकत कहाँ गई जो कभी मुझसे लड़ने की बात करता था?”
(करण गिरता है, उसके होंठों से खून टपकता है।)
करण (कमज़ोर आवाज़ में) बोला -
“तू... अभी भी वही है रुद्र... बस लालच बढ़ गया है तेरा…”
(रुद्र झपटता है, करण को ज़मीन पर पटक देता है। सिमरन चीख पड़ती है और दौड़कर करण को बचाने की कोशिश करती है।)
सिमरन (गुस्से और डर के बीच) बोली -
“उससे दूर हट जा रुद्र! अगर तू सच्चा डेविल है, तो मैं भी सच्ची इंसान हूँ!”
(रुद्र ठहाका लगाता है, उसकी आँखें लाल जलती हैं।)
रुद्र बोला -
“इंसान? तुम लोग बस खिलौने हो हमारे लिए... खून और दर्द के खिलौने! दूर हट कमजोर इंसानी औरत।”
(सिमरन पास रखी लोहे की छड़ी उठाती है और रुद्र पर वार करती है। रुद्र पीछे हटता है, लेकिन उसके चेहरे पर चोट लग जाती है।)
रुद्र (गुस्से से) बोला -
“तूने ये क्या किया!”
(सिमरन करण की ओर भागती है, उसे अपने कंधे पर संभालती है।)
सिमरन (हांफती हुई) बोली -
“करण जी... उठिए... हमें यहाँ से जाना होगा... अभी!”
(करण बेहोश-सा है, पर सिमरन पूरी ताकत लगाकर उसे दरवाज़े तक खींचती है। बाहर बारिश शुरू हो जाती है।)
“वो इंसान थी... मगर उस पल उसकी हिम्मत किसी फ़रिश्ते से कम नहीं थी।
वो भाग रही थी मौत से... लेकर ज़िंदगी को अपने हाथों में।”
(सिमरन करण को अपने कंधे पर लादकर अंधेरे जंगल की ओर भागती है। पीछे से रुद्र की गूँजती आवाज़ सुनाई देती है।)
रुद्र (गर्जना में) बोला -
“भाग जा सिमरन! पर याद रख — डेविल की दुनिया में इंसान की साँसें ज़्यादा देर नहीं टिकती!”
(सिमरन बारिश में भीगती हुई दौड़ रही है। करण की साँसें कमजोर हैं, पर वो अब भी ज़िंदा है।)
सिमरन (रोते हुए, खुद से) बोली -
“जब तक मैं जिंदा हूँ... आपको कुछ नहीं होने दूँगी करण जी…”
(बारिश, बिजली, और जंगल के बीच एक औरत अपने घायल प्यार को लेकर अंधेरे में गुम हो रही है…)
(रात गहराती जा रही है। सिमरन पूरी भीग चुकी है। हवा में ठंडक और डर दोनों हैं। वो करण को कंधे पर संभाले हुए जंगल के भीतर एक पुरानी गुफा तक पहुँचती है।)
(गुफा के अंदर अँधेरा है, पर सिमरन अपनी मोबाइल की रोशनी जलाती है और करण को ज़मीन पर बिछे सूखे पत्तों पर गुफा की दीवार से पीठ टीका के बैठा देती है। करण का चेहरा पीला, साँसें टूटी-टूटी हैं।)
सिमरन (काँपती आवाज़ में) बोली -
“करण जी... देखिए, मैं यहाँ हूँ... कुछ नहीं होगा आपको…”
(वो अपने पल्लू से करण के ज़ख्मों को साफ़ करने लगती है, आँसू उसके गालों से गिरकर करण के हाथों पर पड़ते हैं।)
“वो लड़की जो कभी दफ़्तर में ओवरटाइम करती थी,
आज मौत से ओवरटाइम लड़ रही थी…”
(करण की आँखें हल्के से खुलती हैं, उसकी लाल आँखों की चमक अब मंद पड़ गई है।)
करण (कमज़ोर स्वर में) बोला -
“क्यों... भाग रही हो मेरे साथ... मैं तो शैतान हूँ… सिमरन! Please चली जाओ। मेरी वजह से खुद को तकलीफ मत दो।”
सिमरन (धीरे, आँसू पोंछते हुए):
“आप शैतान नहीं... आप मेरे करण जी हैं…
और अगर आप शैतान भी हैं, तो मैं आपकी इंसानियत हूँ।”
(करण के होंठ काँपते हैं, वो कुछ कहना चाहता है लेकिन शब्द नहीं निकलते।)
(सिमरन अपनी साड़ी का टुकड़ा फाड़ती है, और करण के सीने पर लगे गहरे ज़ख्म पर बाँध देती है।)
सिमरन (धीरे से प्रार्थना करते हुए) बोली -
“हे भगवान... अगर आपमें सच में शक्ति है...
तो मेरे पति को मत लेना... इन्हें मेरे लिए बचा लीजिए…”
(बाहर बिजली कड़कती है, हवा तेज़ चलने लगती है — जैसे प्रकृति खुद उसकी पुकार सुन रही हो।)
“उस गुफा की हर दीवार उसकी दुआ सुन रही थी...
और पहली बार, एक इंसान की प्रार्थना ने एक डेविल की धड़कन को रोकने से बचा लिया।”
(करण की साँसें धीरे-धीरे स्थिर होने लगती हैं। सिमरन थकी हुई उसके सामने बैठ जाती है, उसका सिर करण के सीने पर टिक जाता है।)
सिमरन (धीरे से) बोली -
“अब कुछ नहीं होगा... अब आप मुझसे दूर नहीं जाओगे…”
(करण हल्का-सा मुस्कुराता है, उसकी उंगलियाँ सिमरन के बालों में फँस जाती हैं। दोनों की साँसें एक-दूसरे से मिलती हैं — बारिश थमने लगती है।)