Fear in Hindi Spiritual Stories by Kapil Tiwari books and stories PDF | डर

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डर

अध्यात्म का बहुत सीधा और सरल अर्थ है—ख़ुद को जानना। (‘अधि + आत्म’) यानी आत्म के और करीब आना। अपने “मैं” को, अपने अहं को, और अपनी वृत्तियों को समझना ही अध्यात्म है। डर, क्रोध, प्रेम, अहम, मोह, कामवासना—ये सब हमारे भीतर चल रही वृत्तियाँ हैं। इन्हें जानना, पहचानना और समझना ही अध्यात्म का असली काम है। अध्यात्म कोई बाहर की चीज़ नहीं है, न कर्मकांड, न वेशभूषा और न ही किसी विशेष परंपरा का पालन करना। जहाँ ख़ुद के मन की, ख़ुद मन के व्यवहार की,और ख़ुद की वृत्तियों की बात नहीं हो रही, वहाँ अध्यात्म नहीं है।

अध्यात्म हर समय एक ही काम करता है—प्रश्न पूछता है। तुम क्या कर रहे हो? किसके लिए कर रहे हो? और क्यों कर रहे हो? तुम डर क्यों जाते हो? अपनी ज़िंदगी कहाँ खर्च कर रहे हो और क्यों? इतना पैसा क्यों कमा रहे हो और उसे कहाँ खर्च करोगे? ये प्रश्न सुनने में साधारण लगते हैं, लेकिन भीतर से आदमी को हिला देते हैं। इसी कारण लोग अध्यात्म से बचते हैं, क्योंकि यह बाहर नहीं, भीतर देखने को मजबूर करता है। सच यही है कि ख़ुद को जानना ही अध्यात्म है, और इसके अलावा कुछ भी नहीं।

जैसे अगर हम डर की बात करें, तो डर असल में कोई ठोस चीज़ नहीं है। डर एक विचार है—सिर्फ़ और सिर्फ़ एक विचार। मनुष्य आदिकाल से डरता आया है और आज भी डरता है, क्योंकि उसके भीतर यह धारणा बैठी हुई है कि वह एक ख़तरनाक जगह पर आ गया है, जहाँ उसका कुछ छिन सकता है, वह लुट सकता है, बर्बाद हो सकता है, यहाँ तक कि समाप्त भी हो सकता है। डर का मूल कारण यही है—कि हमारा कुछ बिगड़ जाएगा, हमसे कुछ छिन जाएगा।

यह डर तब तक बना रहेगा, जब तक भीतर यह बात गहराई से नहीं बैठ जाती कि मेरा कुछ बिगड़ नहीं सकता, चाहे जो हो जाए। जिस दिन मन यह मान लेता है कि मैं किसी अनजान जगह पर नहीं हूँ, बल्कि अपने ही घर में हूँ—इस दुनिया में जहाँ मुझे होना चाहिए—और यहाँ से मुझे कोई बाहर नहीं निकाल सकता, उसी दिन डर ढीला पड़ने लगता है। लेकिन यह केवल सोचने से नहीं होता, यह जीवन बनना चाहिए, मन में बैठना चाहिए, हमें ये ज्ञात होना चाहिए कि हम इसी पंचभूतों से बने हैं और अंततः इसी में मिल जायेगे जहां से आए वही चले गए।

जब तक यह भाव भीतर स्थापित नहीं होता कि चाहे सब कुछ चला जाए, तब भी कुछ बिगड़ा नहीं; चाहे हम लुट जाएँ, तब भी फिर खड़े हो सकते हैं; चाहे गहरी से गहरी चोट लगे, तब भी डरने की ज़रूरत नहीं; यहाँ तक कि मृत्यु भी आ जाए, तब भी कुछ बिगड़ा नहीं—जब तक आप ऐसे निडरता से जीवन का सामना नहीं करेंगे तब तक डर नहीं जाएगा। जिस दिन से आदमी इस मौज में जीने लगता है, की हम जहां से आए हैं वहीं एक चले जाना है तो डर किसका ? उसी दिन जीवन से डर निकलने लगता है।

लेकिन हम उल्टा करते हैं। हम अपने जीवन में वही चीज़ें जमा करते हैं जिन्हें खोया जा सकता है, और फिर कहते हैं कि हमें डर लगता है। जहाँ खोने वाली चीज़ें होंगी, वहाँ डर भी रहेगा। अगर जीवन में प्रतिष्ठा है, तो उसके जाने का भी डर रहेगा, क्योंकि जो भी चीज हमें बाहर से प्राप्त हुई हैं वो जा भी सकती हैं। अगर किसी व्यक्ति से गहरा लगाव है, तो उसे खोने का डर रहेगा। हम अपने आपको जिन-जिन चीज़ों से जोड़ लेते हैं, वही डर का कारण बन जाती हैं।

निडर होने का बस एक ही सूत्र है—यह समझ लेना कि जीवन एक खेल है। कुछ आएगा, कुछ जाएगा, लेकिन इससे हमारा कुछ बिगड़ने वाला नहीं। इसका अर्थ यह नहीं है कि हम लापरवाह हो जाएँ या जीवन से उदासीन हो जाएँ। इसका अर्थ केवल इतना है कि अगर कुछ मिल जाए तो खुशी के मारे पागल न हों, और अगर कुछ चला जाए तो टूट न जाएँ। जीवन के यथार्थ को समझने का प्रयास करें, विद्या (खुद का ज्ञान)और अविद्या (संसार का ज्ञान) में संतुलन बना रहे—बस यही बात है।

मान लो बहुत पैसा मिल गया—बहुत अच्छी बात है, लेकिन इससे हम कोई और नहीं हो गए। और अगर पैसा नहीं मिला—तो भी कोई बात नहीं। पैसा चला गया—ठीक है, दोबारा कमा लेंगे। आज दस लोग सम्मान कर रहे हैं—अच्छी बात है, लेकिन इससे हम भीतर से कोई अलग व्यक्ति नहीं बन गए। हम वही हैं जो पहले थे।

हम क्या करते हैं—कोई एक प्रमाणपत्र मिल जाए तो खुश हो जाते हैं, और अगर असफल हो जाएँ तो आत्महत्या तक कर लेते हैं। हमारी पूरी ज़िंदगी इस उम्मीद में बीत रही है कि कुछ मिल जाए। लेकिन जो चीज़ मिल सकती है, वह छिन भी सकती है। जहाँ पाने का लोभ है, वहाँ खोने का डर निश्चित है। और फिर हम कहते हैं कि जीवन में डर बहुत है।

जीवन में जो सही है वो करो—काम करो, पैसा कमाओ, रिश्ते बनाओ—लेकिन भीतर यह साफ़ रहे कि इससे कोई बहुत बड़ा फर्क नहीं पड़ता हैं हमें बाहरी चीजों के इतने आदी नहीं बनना है कि हम उसके लिए अपनी आंतरिक शांति ही खो बैठें। जब यह भाव आ जाता है, तब जीवन बोझ नहीं, एक मज़ेदार खेल बन जाता है। डर पूरी तरह समाप्त हो जाए, ऐसा नहीं है। डर आता है चला जाता हैंl

डर बिना निमंत्रण नहीं आता। उसको निमंत्रण हमारा लोभ देता है, हमारी कामना भरी इच्छाएँ देती हैं, हमारा मोह देता है। जिस दिन हम ये निमंत्रण-पत्र देना बंद कर देते हैं, उसी दिन डर अपने आप चला जाता है।

~ कपिल तिवारी “यथार्थ”