प्रेम-प्रेम सब कोइ कहैं, प्रेम न चीन्है कोय।
जा मारग साहिब मिलै, प्रेम कहावै सोय॥
~ कबीर साहब
प्रेम प्रेम सब कहते हैं, पर प्रेम को सच में बहुत कम लोग जानते हैं। प्रेम कोई शब्द नहीं, कोई भावना नहीं, कोई संबंध नहीं—प्रेम मन की वह अवस्था है जहाँ मन स्वयं से हटकर पूरी तरह दूसरे की भलाई में ठहर जाता है, बिना किसी अपेक्षा के। वहाँ यह उम्मीद भी नहीं रहती कि बदले में प्रेम मिलेगा। क्योंकि जैसे ही उम्मीद आई, वहीं स्वार्थ आ गया, और जहाँ स्वार्थ आया वहाँ प्रेम समाप्त होकर लेन-देन शुरू हो गया। लेन-देन व्यापार होता है, प्रेम नहीं।
प्रेम में दूसरा या प्रेमी केंद्र में होता है। जिससे हम प्रेम करते हैं, उसे हम जितनी ऊँचाई तक ले जा सकते हैं, वहाँ तक ले जाने की चेष्टा करते हैं—बिना किसी लाभ की आकांक्षा के। प्रेम बंधन नहीं देता, प्रेम शांति देता है। बेचैन मन का शांति की ओर खिंच जाना ही प्रेम है। इसलिए प्रेम किसी एक व्यक्ति तक सीमित नहीं हो सकता। वह टॉर्च की तरह नहीं होता कि रोशनी सिर्फ एक पर पड़े। प्रेम सूर्य की रोशनी जैसा है—यदि भीतर फूट पड़ा तो सब पर फैलता है। जब हम स्वयं प्रेममय हो जाते हैं, तब हमारे आसपास का सब कुछ प्रेममय हो जाता है।
पर प्रेम को जानने से पहले प्रेम करने वाले (यानि खुद को )को जानना पड़ता है। जब तक हम ख़ुद को नहीं समझ पाते, तब तक हम प्रेम की उच्चतम अवस्था को भी नहीं समझ पाएंगे। आज समस्या यह है कि हम प्रेम करने वाले को जाने बिना ही मान लेते हैं कि हमें प्रेम हो गया या हमें प्रेम समझ आ गया। कुछ फिल्में देख लीं, कुछ शायरी सुन ली, कुछ यादें बन गईं और हमने कह दिया—प्रेम हो गया। जबकि भीतर क्या चल रहा है, उसका हमें कोई बोध नहीं। न यह पता कि मन क्या कर रहा है, न यह समझ कि आकर्षण क्या है, न यह ज्ञान कि हार्मोन कैसे काम करते हैं। बस भीतर एक सरसराहट है और हम उसे प्रेम का नाम दे देते हैं। यही आंतरिक अंधविश्वास है।
जैसे कोई आदिवासी जिसने कभी टीवी न देखा हो, वह टीवी से आती आवाज़ को देवता समझ ले—क्योंकि उसने उसे जाना नहीं। वैसे ही जब हम अपने भीतर चल रही जैविक और मानसिक प्रक्रियाओं को नहीं जानते और उन्हें प्रेम समझ लेते हैं, तो वह भी अंधविश्वास ही है। बाहरी अंधविश्वास और आंतरिक अंधविश्वास में फर्क इतना ही है कि एक बाहर दिखता है, दूसरा भीतर चलता है।
लोग तर्क देते हैं कि भगवान कृष्ण ने भी प्रेम किया था। पर प्रश्न यह है कि क्या हम कृष्ण हैं? क्या हमें गीता का बोध है? क्या हमें पता है कि कृष्ण कौन थे? अगर नहीं, तो फिर उनके प्रेम की बात करना सिर्फ अपने शारीरिक आकर्षण को सही ठहराने का तरीका है। जो कर्ता महान नहीं है, उसका प्रेम महान कैसे हो सकता है। लोग अपने आकर्षण और जरूरतों को ढकने के लिए ईश्वर को बीच में ले आते हैं, यह प्रेम नहीं, भ्रम है।
जैसे-जैसे हम बड़े होते हैं, हमारे भीतर हार्मोन सक्रिय होते हैं। स्त्रियों में एस्ट्रोजन और प्रोजेस्टेरोन, पुरुषों में टेस्टोस्टेरोन। ये हार्मोन विपरीत लिंगी के प्रति तीव्र आकर्षण पैदा करते हैं। यह जीवविज्ञान है, प्रेम नहीं। लेकिन हम इसी आकर्षण को प्रेम कह देते हैं। मस्तिष्क का एक भाग—हाइपोथैलेमस—सक्रिय होता है और कुछ क्षणों के लिए पूरा नियंत्रण अपने हाथ में ले लेता है। विचार उठते हैं, भावनाएँ उमड़ती हैं, और हम इसी पागलपन को प्रेम मान लेते हैं।
प्रेम शांति है, आनंद है, स्वयं को जानने की लहर है। प्रेम का कोई कारण नहीं होता। क्योंकि यदि कारण होगा तो कारण समाप्त होते ही प्रेम भी समाप्त हो जाएगा। प्रेम किसी एक से नहीं होता, प्रेम की अवस्था में सब समान हो जाते हैं। इसलिए जो कहता है कि मैं प्रेम करता हूँ लेकिन साथ ही हिंसा करता है, हत्या करता है, प्रकृति का शोषण करता है—वह स्वयं को धोखा दे रहा है। आप एक जीव की हत्या कर उसका आनंद लेते हुए प्रेम की बात नहीं कर सकते। यह प्रेम नहीं, संवेदनहीनता है।
हम अक्सर ममता और आसक्ति को प्रेम समझ लेते हैं। माता-पिता भी प्रायः बच्चों से प्रेम नहीं करते, बल्कि ममता करते हैं। ममता में भेदभाव होता है, प्रेम में नहीं। प्रेम सबको समान देखता है। यदि प्रेम है तो अपने बच्चे और दूसरे के बच्चे में अंतर नहीं रह जाता। पर ऐसा होता नहीं, क्योंकि हम प्रेम को जानते ही नहीं। हम उसी का अभ्यास करते हैं जिसे हम जानते हैं—आसक्ति, सुरक्षा, स्वार्थ।
प्रेम प्राकृतिक नहीं है कि बस हो जाए। प्रेम सीखना पड़ता है। जब मन से हिंसा, क्रोध, लालच, स्वार्थ समाप्त हो जाता है, तभी प्रेम की संभावना बनती है। प्रेम एक आज़ाद पक्षी है—जो उड़ता है, आनंद लेता है, झूमता है। उसे बाँधा नहीं जा सकता। इसलिए प्रेम के लिए जबरदस्त मानसिक परिपक्वता चाहिए।
आज हमारे रिश्ते शरीर, सुंदरता, पैसा और सुविधा के आधार पर बनते हैं। जब तक आधार है, रिश्ता है। आधार खत्म, रिश्ता खत्म। इसलिए प्रेम का कोई बना - बनाया आधार नहीं होना चाहिए। वह अकारण होता है। प्रेम में पहला कर्तव्य यह होता है कि जिसे हम चाहते हैं, उसे शांति की ओर ले जाएँ, भले ही सत्य कड़वा लगे। प्रेम झूठी सांत्वना नहीं देता, प्रेम साहस देता है। हम ऊँचे लोगों से प्रेम करने से डरते हैं, क्योंकि उन्हें झेलने की क्षमता हमारे अंदर नहीं होती।
प्रेम वही कर सकता है जिसने पहले स्वयं को जाना हो, स्वयं की उच्चतम संभावनाओं को पहचाना हो तभी आप किसी उच्चतम संभावना वाले व्यक्ति को पहचान पाओगे और प्रेम कर पाओगे। अन्यथा हम पहचान ही नहीं पाएँगे कि प्रेम क्या है और किससे करना है।
प्रेम और मोह में यही अंतर है कि प्रेम आत्मा की ओर ले जाता है और मोह प्रकृति की ओर। प्रेम देने से बढ़ता है, मोह पाने से। प्रेम में स्वयं का त्याग होता है, मोह में दूसरे का उपभोग। प्रेम अद्वैत में स्थित है, मोह द्वैत में। वास्तविक प्रेम हमेशा एकतरफ़ा होता है, क्योंकि उसमें पाने की आकांक्षा नहीं होती।
प्रेम अंततः कुछ और नहीं—मन का निरंतर, शांत, अविरल प्रवाह है शांति की ओर। जब मन शांत हो जाता है, तभी प्रेम प्रकट होता है। उससे पहले जो भी है, वह प्रेम तो नहीं है।
प्रेम न बाड़ी उपजै, प्रेम न हाट बिकाय।
राजा परजा जेहि रुचै, सीस देइ ले जाय॥
~ कबीर साहब
प्रेम सहज (अपने आप) नही हो सकता,
संघर्ष करना पड़ता है स्वयं से।
प्रेम सीखना भी एक विद्रोह ही है।
प्रेम के लिए पात्रता ~ परिपक्वता, ख़ुद की समझ, मन की स्पष्टता।
यदि ये हमारे जीवन में उपलब्ध नहीं हैं तो प्रेम कष्टकारी है और कदाचित वो प्रेम नहीं हैं।
~ कपिल तिवारी “यथार्थ”