मोबाइल की लत
मोहन पुणे में एक अच्छी कंपनी में जॉब करता था। उसकी पत्नी नेहा भी वर्किंग थी। इसी वजह से दोनों अपने 12 वर्षीय बेटे रोहन को घर पर अकेला छोड़कर चले जाते थे। स्कूल से आते ही रोहन का दिन मोबाइल से शुरू होता और उसी पर खत्म। सारा दिन, रात सोने तक वो गेम खेलता रहता। धीरे-धीरे पढ़ाई में वो बहुत पीछे चला गया।
जब भी नेहा उसे पढ़ने के लिए कहती, तो वो या तो अनसुना कर देता या गुस्से में जवाब देने लगता। नेहा रोहन की इस आदत से बहुत परेशान थी। उसे लगता था नौकरी की वजह से वो बेटे को समय नहीं दे पा रही। अगर यही हाल रहा तो रोहन बिगड़ जाएगा। ,"बच्चों को"एक जिम्मेदार नागरिक बनाना भी तो हमारा कर्तव्य है," सोचकर नेहा ने उसी दिन ऑफिस में अपना इस्तीफा दे दिया।
शाम को जब नेहा घर पहुंची तो घर की हालत देखकर दंग रह गई। सामान इधर-उधर बिखरा था। जूते, कपड़े फर्श पर पड़े थे। और रोहन सोफे पर लेटा मोबाइल में रोबोलोक्स खेल रहा था। उसे पता ही नहीं चला कि मम्मी कब से पीछे खड़ी है।
नेहा का गुस्सा सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने झपटकर रोहन के हाथ से फोन छीन लिया और अलमारी में रखकर ताला लगा दिया। बस फिर क्या था, रोहन गुस्से से पागल हो गया। पहले वो जमीन पर लोट-पोट होकर चिल्लाया। फिर पागलों की तरह अपने बाल नोचने लगा।
नेहा ने जब उसे समझाने की कोशिश की तो रोहन ने उसे भी मारने की कोशिश की। गुस्से में उसने नेहा को जोर से धक्का दे दिया। नेहा दीवार से टकरा गई और उसके सिर से खून बहने लगा। वो वहीं बेहोश होकर गिर पड़ी।
जमीन पर खून और बेहोश मां को देखकर रोहन के होश उड़ गए। उसे लगा उसने अपनी मां को मार दिया। घबराकर उसने नेहा के ही फोन से पापा को कॉल किया और रोते-रोते सारी बात बताई।
मोहन दौड़कर घर आया और नेहा को तुरंत अस्पताल ले गया। इधर रोहन अपनी मां के पास बैठकर फूट-फूट कर रो रहा था। "मां मुझे माफ कर दो। अब कभी गेम नहीं खेलूंगा। मन लगाकर पढ़ाई करूंगा। मोबाइल को हाथ भी नहीं लगाऊंगा। मां बोलो ना, कुछ तो बोलो मां," वो बार-बार कह रहा था। उसे अपनी करनी पर बहुत पछतावा हो रहा था। वो ईश्वर से प्रार्थना कर रहा था - "हे भगवान, बस एक बार मां को ठीक कर दो। कसम खाता हूं अब कभी फोन को हाथ नहीं लगाऊंगा"
पूरी रात के बाद सुबह दस बजे नेहा को होश आया। आंखें खुलते ही उसने देखा रोहन उसके पैरों में बैठा रो रहा है और माफी मांग रहा है। नेहा ने उसे पास बुलाकर गले लगा लिया। दोनों देर तक रोते रहे। उस दिन मां और बेटे दोनों को एहसास हुआ कि गुस्सा और लत मिलकर रिश्ते कैसे तोड़ देते हैं।
अगले कुछ हफ्तों में घर का माहौल पूरी तरह बदल गया। रोहन अब पूरी तरह सुधर चुका था। उसने खुद से मोबाइल देखना छोड़ दिया। स्कूल से आते ही वो बैग रखकर पहले मम्मी के काम में हाथ बंटाता। घर की सफाई, सब्जी काटना, छोटे-छोटे काम वो खुशी से करने लगा।
पढ़ाई में भी उसके नंबर सुधरने लगे। टीचर तारीफ करने लगीं। सबसे बड़ी बात, अब रोहन हर शाम अपनी मां के साथ पार्क जाता। दोनों बैडमिंटन खेलते, बातें करते, हंसते। वो मोबाइल वाला अकेलापन अब मां-बेटे की दोस्ती में बदल चुका था।
मोहन भी अब ऑफिस से जल्दी आने लगा। रात को खाना खाते समय तीनों साथ बैठते और दिन भर की बातें शेयर करते।
एक दिन नेहा ने रोहन से पूछा, "बेटा, अब मोबाइल की याद नहीं आती?"
रोहन हंसकर बोला, "मां, पहले मोबाइल में दुनिया थी। अब दुनिया में आप हो। गेम से ज्यादा मजा तो आपके साथ बैडमिंटन में आता है।"
उस दिन नेहा की आंखें भर आईं। उसने ऊपर वाले का शुक्रिया किया।
इस तरह एक गलत आदत ने एक परिवार को तोड़ते-तोड़ते बचा दिया। और उस हादसे ने सबको सिखा दिया कि बच्चों को गैजेट नहीं, माता-पिता का समय चाहिए।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली