आतंक
सड़क पर मुरूम बिछाने का काम बड़ी तीव्र गति से चल रहा
था। एक के बाद एक मुरूम से भरी ट्रकें आती, मुरूम खाली करके
चली जातीं। सड़क पर खड़ा सुपरवायजर अतुल गाड़ियों को खाली
करवाता। जब तक पहली वाली मुरूम बिछा नहीं पाती, तब तक
दूसरी ट्रक मुरूम भर कर आ जाती। एकाएक मुरूम से भरी गाड़ियाँ
आना बंद हो गई। यहाँ से मुरूम खाली करके गाड़िंया जा रही थी
परन्तु उधर से भरी गाड़ियां आना बंद हो गई। मुरूम ना आने से
अतूल का काम रूकने लगा। वह मन ही मन ड्राइवरों पर झल्लाया,
अभी तक गाड़ियाँ आ क्यों नहीं रही है।
लगभग दो घंटे तक जब कोई गाड़ी नहीं आई तो अतुल
झल्लाता हुआ मुरूम खदान की ओर अपनी मोटर साइकिल उठाकर
चल दिया। बस्ती के पार मुरूम खदान थी। जैसे ही वह आगे बड़ा
तो देखा खदान में उसके काम में लगी गाड़ियाँ जल रही हैं। कुछ
लोग गाड़ियाँ जलाने में लगे हुये हैं। गाँव वाले दूर से यह दृश्य देख
रहे थे। अतुल घबराया और चिल्लाया, तभी गॉव के बुजुर्ग आदमी ने
उसे दूर से ही रोक लिया- वहाँ मत जाओ। वहाँ तुम्हारी जान को
खतरा है- अतुल की समझ में कुछ भी नही आया कि वह क्या करे
क्या ना करें? गॉव वालों के कहने पर वह खदान नहीं गया।
अतुल ने अपने ठेकेदार देवीलाल को फोन लगाकर घटना की
जानकारी दी- "मुरूम खदान में खुदाई का काम करने वाली जे.सी.
बी मशीन सहित पॉचों ट्रकों को कुछ लोगों ने आग के हवाले कर
दिया है। मैं दूर से देख रहा हूँ। गाँव वाले मुझे वहाँ जाने नहीं दे रहे
हैं- उनका कहना है कि वे लोग मेरे साथ कुछ भी कर सकते हैं।
इसलिये मैं दूर से सब देख रहा हूँ।"'
उसी समय उसी रोड में आगे पुलिया का निर्माण का कार्य चल
रहा था। थोड़ी देर में पुलिया के सुपरवायजर का भी फोन आया
पुलिया के काम में लगी जे.सी.बी. मशीन व दो मिक्वर मशीन व एक
ट्रक को कुछ लोगों ने आग लगा दी है। मै साइट पर नहीं था। वहाँ
काम चल रहा था। मैं सीमेंट की व्यवस्था करने बाजार गया था तो
पीछे यह घटना घटी है। मैं दूर से ही देख रहा हूँ कि हमारी गाड़ियों
से ही डीजल निकाल-निकाल कर गाड़ियों पर डाल रहें और
गाड़िया जला रहे हैं।
सेठ देवीलाल ने अपने सुपरवायजरों को समझाया कि- तुम
लोग घबराओं मत , मैं पुलिस को खबर करता हूँ- और आता हूँ।
देवीलाल ने पूलिस थाने में खबर की तो पुलिस वाले भी बोले-
अभी आप शान्त रहो , ऐसे में वहाँ जाने पर सबकी जान को खतरा है।
वे लोग हथियारों से लैंस हैं और दो- दो जगह गाड़ियों को आग
लगा रहे हैं। मतलब साफ है, आसपास भारी संख्या में उनके साथी
छिपे होंगें। पुलिस वालों ने देवीलाल को सलाह दी कि वह वहाँ ना
जाये। वहाँ उनकी जान को भी खतरा है- ऐसे में वे लोग पूरी तैयारी
से आते हैं और विरोध करने वाले को भी नहीं छोड़ते।
देवीलाल घबराया हुआ इधर उधर एस.पी., कलेक्टर सबको
फोन लगा लगाकर अपनी गाड़ियों व ड्राइवरों की सुरक्षा के लिये
निवेदन करता रहा परन्तु सबका यही कहना था अभी जल्दबाजी
में कोई कदम मत उठाओ।
देवीलाल व उसका परिवार रात भर सो नहीं सके। बैंक से
उधार लेकर उसने अभी इस काम के लिये 4 नए ट्रक व नयी जे.सी.बी.
मशीन खरीदी थी। पूरी पूंजी वह इस काम में लगा चुका था।
देवीलाल को घबराया हुआ देखकर उसकी पत्नी, बच्चे ड्राइवरों की
सुरक्षा के लिये भगवान से रात भर प्रार्थना करते रहे।
रात भर खदान में व पुलिया में गाड़ियाँ जलती रही और दस्यु दल ने बंधक
बनाये गये ड्राइवरों व अन्य लोग वही बैठाये रखा । जब गाड़ियाँ
पूरी तरह जल गई तो गहरी रात दस्यू दल के लोग जंगल में वापस
चले गये। उन्हानें सभी डाइवरों के मोबाइल अपने कुब्जे में ले रखे
थे इसलिये ड्राइवरों से कोई सम्पर्क नहीं हो पा रहा था। दस्यु दल
के जाने के बाद घबराये, डरे व सहमें हुए ड्राइवर- अपने डेरे पर
आये और अपनी व्यथा कथा आपस में कही किस तरह उन लोगों
ने उनके मोबाइल जब्त कर लिये और हमसे ही हमारी गाड़ियों से
डीजल निकलवाकर आग के हवाले कर दिया। उन लोगो ने हमसे
गाड़ी ना चलाने और रोड ना बनाने की चेतावनी देते हुये कहा कि-
रोड बनाने का काम बंद कर दो- नहीं तो तुम सबको जिंदा नहीं
छोड़ेगें।
अपनी जान बचाकर आये ड्राइवरों को अतुल सुपरवायजर ने
खाना खिलाया और उनको ढाढंस बंधाया और आगजनी की सम्पूर्ण
घटना की जानकारी लेते रहा।
घटना स्थल पर चलने के लिये सुबह से ही देवीलाल थाने में
जाकर बैठ गये। परन्तु घटना स्थल पर जाने के लिये पुलिस वाले
आनाकानी करते रहे। किसी तरह सिविलियन ड्रेस में थानेदार चलने
को तैयार हुआ। घटना स्थल पर जाने की हिम्मत थानेदार नहीं कर
पा रहा था। देवीलाल अपने भाई के साथ घटना स्थल पर पहुँचकर
गाड़ियों के पास पहुँचे। गाड़ियों के टायर अभी भी जल रहे थे उनसे
धुऑ निकल रहा था। सभी गाड़ियाँ जलकर काली कोयला हो गई थी।
गाड़ियों को जलता देखकर सेठ देवीलाल रो पड़े। कितनी मेहनत से
उसने अपना बिजनिस खड़ा किया था और एक ही दिन में ग्यारह
गाड़ियाँ जल गई थी। वह अब कैसे काम कर पायेगा? वो सोचता रहा --- अब वो कैसे काम पूरा कर पाएगा ---और कैसे बैंक
व बाजार की देनदारी चुकायेगा ?--- बार-बार वह यही सोच रहा था।
दूसरे दिन पेपर में बड़े बड़े अक्षरों में यह समाचार छप गया देवी
कन्सट्रकशन की ग्यारह गाड़ियाँ आग के हवाले।
यह तो गनीमत थी कि किसी ड्राइवर को चोट नहीं आयी थी।
वे सब सुरक्षित थे। परन्तु देवीलाल को बहुत नुकसान हुआ था। जली
हालत में गाड़ियाँ जहॉँ खड़ी थी, वहीं खड़ी रही। देवीलाल ने उस
रोड का काम बंद कर दिया अब वहाँ काम करना खतरे से खाली
नहीं था। देवीलाल उदास रहने लगे उनका बहुत सा पैसा फंस गया
था, गाड़ियॉ जल गयी थी। ड्राइवरों व सुपरवायजरों का मनोबल भी
गिर चुका था-कोई भी कर्मचारी वहाँ काम करना नहीं चाहता था।
संवेदना के शब्द तो बहुत मिलते हैं, परन्तु शब्दों की संविदना से
आदमी का पेट नहीं भरता, पेट भरने के लिये तो कुछ करना पड़ता
है। देवीलाल अब कोई नये काम के विषय में सोचने लगे किन्तु किसी
और काम का उन्हें अनुभव नहीं था। हाथ में पैसा भी नहीं था
देवीलाल सोचते ---अज्ञात लोगों से उनका विवाद भी नहीं था। ---उनकी
ओर से कोई मॉग या सूचना भी नहीं आई थी। यदि उन लोगों को
काम बंद करवाना था तो कोई सूचना भिजवाते।--- एकदम गाड़ियाँ क्यों
जला दी? रात दिन देवीलाल इसी चिंता में उदास रहने लगे। उनकी
समझ में कुछ नहीं अआ रहा था कि इतनी बड़ी घटना क्यों हुयी ? रात
रात भर देवीलाल सो नही पाते थे। कभी भविष्य के बारे में सोचते---
और कभी भूत और वर्तमान की कड़ियां मिलाते रहते। सोचते रहते---
उनसे कहाँ भूल हुयी जो इतनी बड़ी घटना हो गई।
लगभग नौ माह काम बंद रहा। रोड की पुरानी पुलिया टूट जाने
और नयी पुलिया ना बन पाने के कारण बरसात में गाँव आने , जानेमें लोगों को
बहुत परेशानी हो रही थी। जगंल के अंदरूनी गॉवों को राशन
आदि भी पूलिया के टूट जाने के कारण नहीं मिल पा रहा था।
बरसात में अंदरुनी गॉवों के लोग जरूरी चीजों के लिये परेशान रहने
लगे। दस्यु दल के जो लोग जंगलों में छिपे हुये थे उन्हें भी राशन
सामान नहीं पहुँच पा रहा था। इसतरह पुलिया टूट ना बन पाने से सभी लोग परेशान हो रहे थे ।
एक दिन सरपंच ने ही ठेकेदार को पूलिया बनाने के लिए बोला- भाई पुलिया का काम पूरा कर देते तो अच्छा रहेगा
तो-
देवीलाल बोले- भाई मैं तो काम कर ही रहा था। मेरी गाड़ियाँ
अज्ञात लोगों ने जला दी और मेरे कर्मचारियों को जान से मारने की
धमकी दी है। जब वो लोग सड़क बनाने नहीं देगें तो काम कैसे
होगा-
सरपंच बोला- हम लोग अज्ञात लोगों के कहने पर ही आपसे
पुलिया का काम शुरू करने के लिये कह रहे हैं। पुलिया ना बनने
से उन लोगों को भी राशन नहीं मिल पा रहा है।
देवीलाल बोले - पुलिया का
का काम बरसात में नहीं हो सकता।
बरसात के बाद फ़सल कटने के बाद ही काम शुरू हो पायेगा।
सड़क के दोनों ओर खेतों में फसल खड़ी है। सामान -सीमेंट, रेती
गिट्टी डालने के लिये जगह चाहिये। फसल कटने के बाद ही काम
शुरू हो पायेगा।
इस तरह देवीलाल गाँव वालों को टालते रहे।
अब सरपंच कई बार पुलिया बनाने के लिए कह रहा था, उधर डिपार्टमेंट
के लोगों का भी दबाव था कि वह सड़क का काम पूरा करें। सड़क और पुलिया बनाने के लिए सभी का दबाव था परन्तु देवीलाल को हुए नुकसान की कोई भरपाई नहीं हो पा रही थी , वो घाटा तो उसे ही भोगना पड़ा
दबाब
के चलते अपनी जान को खतरे में डालकर लगभग साल भर बाद
देवीलाल ने सड़क व पुलिया निर्माण कार्य फिर से प्रारम्भ किया। और घाटा उठा कर भी काम पूरा किया।
छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर
दल्ली राजहरा
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