Aajadi in Hindi Motivational Stories by shrish sharma books and stories PDF | आजादी

Featured Books
Categories
Share

आजादी

आजादी - एक अधूरे खत की पूरी कहानी


सन 1930 की बात है। बंगाल के एक छोटे से गाँव सोनापुर में एक लड़का रहता था - बिरजू। बिरजू की उम्र उस समय महज बारह साल थी। उसके पिता हरिराम काका गाँव के स्कूल में मास्टर थे और अपनी छोटी सी दुनिया में भी वे रोज़ एक ही बात कहते थे, "बेटा, गुलामी सबसे बड़ा अभिशाप है।"


बिरजू को इस बात का मतलब तब तक समझ नहीं आया था, जब तक एक दिन उसने अपने गाँव के मेले में एक दृश्य नहीं देखा। गाँव के ज़मींदार के आदमी एक बूढ़े किसान को सिर्फ इसलिए पीट रहे थे क्योंकि उसने लगान देने में दो दिन की देरी कर दी थी। और पास खड़ा एक अंग्रेज अफसर हँस रहा था। बिरजू का खून खौल उठा, पर उसके पिता ने उसका हाथ पकड़ कर उसे खींच लिया। घर आकर पिता ने कहा, "ये गुस्सा दिल में जिंदा रखना, बेटा। यही एक दिन आज़ादी की लौ बनेगा।"


समय बीता। बिरजू अब सोलह साल का हो गया था। देश भर में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की लहर चल रही थी। हरिराम काका ने अपनी नौकरी छोड़ दी और चरखा कातने लगे। उन्होंने अपने घर की सारी विदेशी कपड़ों को आंगन में जला दिया। बिरजू ने भी पहली बार खादी की धोती पहनी। उसे लगा जैसे उसने सिर्फ कपड़ा नहीं, बल्कि गुलामी का एक टुकड़ा उतार फेंका हो।


एक दिन गाँव में खबर आई कि गांधी जी नमक सत्याग्रह के लिए दांडी जा रहे हैं। हरिराम काका ने तय किया कि वे भी अपने गाँव की नदी के किनारे नमक बनायेंगे। अंग्रेजों ने इसे बगावत माना। पुलिस आई, लाठियाँ चलीं। बिरजू ने देखा कि उसके पिता जमीन पर गिरे हैं, उनके सिर से खून बह रहा है, पर उनके हाथ में अभी भी मुट्ठी भर नमक है जो उन्होंने नदी किनारे से बनाया था। उसी रात हरिराम काका को जेल ले जाया गया।


जेल जाने से पहले उन्होंने बिरजू के हाथ में एक छोटा सा खत दिया। उस खत में लिखा था, "आजादी एक दिन में नहीं मिलती। यह एक बीज है, जिसे हर पीढ़ी को अपने खून-पसीने से सींचना पड़ता है। मैं जेल जा रहा हूँ, पर मेरी आजादी अब तुझमें है।"


पिता के जेल जाने के बाद बिरजू अकेला हो गया, पर अंदर से और भी मजबूत। उसने स्कूल छोड़ दिया और कांग्रेस के गुप्त कार्यकर्ताओं के साथ काम करने लगा। उसका काम था - रात के अंधेरे में गाँव-गाँव जाकर पर्चे बाँटना, लोगों को अंग्रेजी हुकूमत के खिलाफ जागरूक करना। वह "इंकलाब जिंदाबाद" के नारे को अपनी साँसों में बसाए घूमता था।


सन 1942 आ गया। "भारत छोड़ो आंदोलन" की घोषणा हुई। पूरे देश में जैसे आग लग गई। बिरजू अब बीस साल का एक नौजवान था। सोनापुर में अंग्रेजों ने कर्फ्यू लगा दिया था। किसी को भी इकट्ठा होने की इजाजत नहीं थी। बिरजू और उसके तीन साथियों ने योजना बनाई कि 15 अगस्त को नहीं, पर 9 अगस्त को ही गाँव के थाने पर तिरंगा फहरायेंगे।


रात के दो बजे थे। चारों दोस्त हाथ में तिरंगा लिए, जो बिरजू की माँ ने अपनी पुरानी साड़ी को फाड़कर, हल्दी और अनार के रंग से बनाया था, थाने की ओर बढ़े। थाने पर दो संतरी पहरा दे रहे थे। बिरजू के एक साथी ने जानबूझकर दूसरी तरफ शोर मचाया, संतरी उधर भागे और बिरजू बिजली की फुर्ती से थाने की छत पर चढ़ गया।


उसने अंग्रेजों का झंडा यूनियन जैक नीचे फेंका और अपना खादी का तिरंगा लहरा दिया। नीचे गाँव के कुछ लोग जो छुपकर देख रहे थे, जोर से चिल्लाए - "भारत माता की जय!"


आवाज सुनकर अंग्रेज अफसर बाहर आया। उसने अपनी पिस्तौल से बिरजू पर निशाना लगाया। गोली चली और बिरजू के कंधे को छूती हुई निकल गई। लेकिन बिरजू ने झंडे को नहीं छोड़ा। उसने झंडे के डंडे को कसकर पकड़ लिया। अफसर ने दूसरा फायर करने से पहले ही गाँव की भीड़ थाने की ओर दौड़ पड़ी। अंग्रेज डरकर भाग गए।


उस दिन थाने पर तिरंगा पूरी रात लहराता रहा, हालांकि अगले दिन अंग्रेजों ने उसे उतार दिया और बिरजू को जेल में डाल दिया। जेल में उसकी मुलाकात अपने पिता से हुई। पिता की आँखों में आँसू थे, पर चेहरे पर गर्व। उन्होंने कहा, "तूने मेरे खत को पूरा कर दिया।"


बिरजू पाँच साल जेल में रहा। 1947 में जब देश आजाद हुआ, तो हर जेल का दरवाजा खुला। बिरजू जब अपने गाँव लौटा तो उसने देखा कि हर घर पर वही तिरंगा लहरा रहा है जिसके लिए उसने गोली खाई थी।


उसकी माँ ने उसे गले लगाया और कहा, "बेटा, आजादी मिल गई।"


बिरजू ने आसमान में लहराते तिरंगे को देखा और कहा, "माँ, ये आजादी हमें मुफ्त में नहीं मिली। इसकी कीमत मेरे पिता के खून ने, मेरे कंधे के घाव ने, और उन हजारों लोगों ने चुकाई है जिनका नाम भी इतिहास में नहीं है। हमें इसे सिर्फ मनाना नहीं है, इसे बचाना भी है।"


आज बिरजू इस दुनिया में नहीं है। सोनापुर के उसी थाने पर, जहाँ उसने पहली बार तिरंगा फहराया था, एक छोटा सा पत्थर लगा है जिस पर लिखा है - "यहाँ सोनापुर के वीरों ने आजादी का पहला दिया जलाया था।"


यह कहानी सिर्फ बिरजू की नहीं है। यह हर उस भारतीय की कहानी है जिसने यह समझा कि आजादी सिर्फ अंग्रेजों के चले जाने का नाम नहीं है। आजादी का असली मतलब है - अपने फैसले खुद लेना, भूख से आजादी, डर से आजादी, और नफरत से आजादी। और यह लड़ाई आज भी जारी है।