तिरंगे की शान"
लघुकथा - वंदना शर्मा
15 अगस्त का दिन था। सुबह से ही पूरे विद्यालय में उत्सव का माहौल था। सभी बच्चे उत्साह से विद्यालय प्रांगण में पंक्तिबद्ध खड़े थे। छात्राओं ने बालों में तिरंगा रिबन बांधा हुआ था और हाथों में तिरंगा पट्टी बांधी थी। चारों ओर देशभक्ति का वातावरण बना हुआ था। हवा में भी "मेरी शान तिरंगा है" गीत की धुन घुली हुई थी।
मंच पर सभी अध्यापिकाएं और प्रधानाचार्या जी आसीन थीं। ठीक 8 बजे प्रधानाचार्या जी मंच पर आकर ध्वज फहराती हैं। सभी छात्राएं एक साथ राष्ट्रगान गाती हैं। "जन-गण-मन" की आवाज जब पूरे मैदान में गूंजती है तो रोंगटे खड़े हो जाते हैं। उसके बाद पूरे जोश के साथ नारे लगते हैं - "देश के शहीद अमर रहें, भारत माता की जय!"
प्रधानाचार्या जी ने अपने सम्बोधन में आजादी प्राप्त करने का संघर्ष और वीर शहीदों के बलिदान को याद किया। उन्होंने कहा कि आज हम जो खुली हवा में सांस ले रहे हैं, वो किसी न किसी जवान की कुर्बानी का नतीजा है।
इसके बाद सांस्कृतिक कार्यक्रम शुरू हुआ। कुछ बच्चे देशभक्ति कविता सुनाते हैं, कुछ नृत्य करते हैं। तभी 8वीं कक्षा की छात्रा विनीता को मंच पर बुलाया जाता है। विनीता एक सीधी-सादी लड़की थी। हाथ में कागज पकड़े वो मंच पर आई।
जैसे ही उसने कविता शुरू की, उसकी आवाज भर्रा गई। दो लाइन बोलते-बोलते उसकी आंखें भर आईं। वो कुछ पल रुकी, गहरी सांस ली और फिर संभलकर बोली -
"साथियों, मेरे पिताजी भी सेना में थे। कारगिल की लड़ाई में गए थे। जाते समय उन्होंने मुझसे वादा किया था - बेटा इस राखी पर जरूर आऊंगा, तेरे हाथों से राखी बंधवाऊंगा।"
इतना कहते-कहते विनीता का गला रंध गया। पूरे मैदान में सन्नाटा छा गया।
"लेकिन वो नहीं आए। वो हमारे देश की रक्षा करते हुए... शहीद हो गए।"
विनीता ने आंसू पोंछे और आगे बोली, "मैं आप सभी से बस इतना कहना चाहती हूं। जब भी कभी किसी जवान को देखें तो उसे गर्व के साथ सैल्यूट करना। जितना हो सके उनकी सहायता करना।
एक मां अपना बेटा जंग में भेजती है तो गर्व के साथ भेजती है, पर उसे नहीं पता होता कि मेरा बेटा वापस आएगा या नहीं। वो बेटा किसी का भाई होता है, किसी का पिता होता है, किसी का पति होता है। अपने परिवार को छोड़कर विपरीत परिस्थितियों में भी खड़े वो वीर जवान हमारी सीमाओं की रक्षा कर रहे हैं। तभी हम आज यहां खड़े होकर स्वतंत्रता दिवस मना पा रहे हैं।"
विनीता की बात सुनकर पूरे विद्यालय में तालियों की गड़गड़ाहट गूंज उठी। कई आंखें नम थीं। प्रधानाचार्या जी ने आगे आकर विनीता को गले लगाया।
इसके बाद प्रधानाचार्या जी ने कहा, "बेटा तुमने आज हमें रुला दिया। पर साथ में ये भी सिखा दिया कि देशभक्ति क्या होती है। मैं आप सभी अभिभावकों और छात्राओं से विनती करती हूं कि कभी भी सैनिकों के साथ अभद्रता न करें, कभी उनका अपमान न करें। हमेशा उनकी सहायता करें, उनका सम्मान करें। शहीदों के परिवारजनों का भी सहयोग करें। उन्हें आर्थिक सहायता उपलब्ध कराएं। ताकि कोई मां अपने बेटे को फौज में भेजने से पहले घबराए नहीं। जय हिंद।"
कार्यक्रम के अंत में विद्यालय में वृक्षारोपण किया गया। हर छात्रा अपने साथ लाया हुआ पौधा अपने नाम के साथ विद्यालय प्रांगण में लगाती गई। मानो हर पौधा एक शहीद की याद में लगाया जा रहा हो।
अंत में सभी को मिठाई वितरित की गई। छुट्टी के बाद जब बच्चे घर जा रहे थे तो सड़क पर भी चारों ओर देशभक्ति गीत बज रहे थे - "मेरी शान तिरंगा है, मेरी आन तिरंगा है।"
उस दिन विनीता ने सिर्फ कविता नहीं सुनाई थी। उसने हम सबको एक पाठ पढ़ाया था - "देश पहले है"।
उस शाम घर आकर मैंने अपनी डायरी में लिखा - "आज तिरंगा सिर्फ फहराया नहीं गया, उसे महसूस भी किया गया।"
|| जय हिंद जय भारत ||
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली