Muhabbat Ek Sabaq - 23 in Hindi Love Stories by Afariya Faruqui books and stories PDF | Muhabbat Ek Sabaq - 23

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Muhabbat Ek Sabaq - 23

"छोटी बीबी आपको बेगम साहेबा ने बुलाया है अपने कमरे में".........


मुलाज़िमा ने आकर इत्तेला दी थी 


"ठीक है आती हूं मैं ,तुम चलो"


उसने बिखरे बालों को दोनो हाथो से समेट कर जूड़ा बनाते हुए उसे जाने का ईशारा किया था आज वह यूनिवर्सिटी जाने के बजाए घर ही थी। 


"पता नही क्या काम होगा" !!! 


पाँव में स्लीपर डाल कर सोचती हुई वह उठ खड़ी हुई। 


"जी फुप्पो बुलाया आपने" ???


वह उनके कमरे में दाखिल होती पूछ रही थी। 


"हां बच्चे आओ बैठो" …. . .


वह बैठी उसी का इंतेज़ार कर रही थीं। 

"जी , क्या बात है सब खैरियत"??? 


उस ने पूछा। 

"तुम आज यूनिवर्सिटी नहीं गईं" ?? 

"नही फुप्पो , आज कोई खास काम नही था और फिर नादिया भी छुट्टी पर थी आज तो मैं बिलकुल बोर हो जाती इसीलिये नही गई" ….


.उसने जवाब दिया

"फिर तो तुम फ्री हो ना" … ??


उन्होंने पूछा। 

"जी , कोई काम है तो बताएं" …. . ..??? 


"मैं अम्मा को उनके रूटीन चैकअप के लिये ले कर जा रही हूं दो दिन से उनकी तबियत कुछ ख़राब हो रही है इसलिये ज़रा शेरी आए तो उसके लंच का देख लोगी तुम" ??? 


वह कुछ झिझकते हुए बोली। 

"अरे फुप्पो यह भी कोई पूछने वाली बात है , आप बिलकुल बेफिक्र हो कर ले जाएं दादू को बल्कि मासी को भी लेती जाइयेगा साथ में कभी आपको कोई प्रॉबलम हो वहां"… .. .. 


वह जिम्मेदारी से बोली तो आमना बेगम खुश हो गयीं। 


"इसलिये कहते हैं कि बेटियां अल्लाह की रहमत होती हैं। अल्लाह तुम्हें हमेशा खुश रखे, अब देखो अगर तुम ना होतीं तो मैं परेशान हो जाती या फिर मुलाज़िमों के भरोसे सब छोड़ कर जाना पड़ता। और शेरी फर्सटरेट हो जाता है अगर उसको खाने के वक़्त सिर्फ मुलाज़िमों के भरोसे छोड़ दिया जाए"….. . …


वह इतमीनान के साथ कह रही थीं। 


"जी फुप्पो आप बेफिक्र हो कर जाएं यहां मैं देख लूंगी सब"



"अच्छा बेटे तुम्हारे अंकल का भी ध्यान रखना , वैसे तो वह दोपहर में लंच ऑफिस में ही करते हैं लेकिन उनके मूड का कुछ नही पता कभी कभी घर भी आ जाते हैं अगर मीटिंग नही होती तो" …. . ..


उन्होंने बताया

"जी ठीक है" …. .


 वह सआदतमंदी से बोली तो आमना बेगम ने हमेशा की तरह उसके सर पर शफ़क़्कत से प्यार किया था। 

☆ ☆ ☆


"बीबी जी छोटे साहब आ गए हैं" …. . ..


वह बाल सुलझा रही थी जब मुलाज़िमा ने आ कर इत्तेला दी 

वह मुलाज़िमा को कह कर फ्रैश होने आ गई थी कि शहरयार आए तो वह उसे बता दे। 


"ठीक है तुम जा कर खाना लगवाओ टेबल पर, मैं आ रही हूं"


उसने बालों को सुलझाने के बाद कलच लगाते हुए कहा तो वह अस्बात (हाँ) में सर हिला कर चली गई। 


उसने ड्रैसिंग पर फैली चीज़ों को साफ करने के बाद खुद पर अपना बहुत लाइट फ्रैगरेन्स वाला परफ्यूम स्प्रे किया और सलीक़े से दोपट्टा ओढ़कर बाहर निकल गई। 

वह टेबल पर मौजूद नहीं था इसका मतलब अभी फ्रैश हो कर नही आया था। 

वह ढक्कन हटा कर सारी डिशेज़ चैक करने लगी। 

"अस्सलामु अलेयकुम" …………


उसने डाइनिंग हॉल में दाखिल होते हुए सलाम किया था। 

"वालेयकुम अस्सलाम" ……….


वह अपनी जगह से उठ कर खड़ी हो गई। 

"आप !!! अम्मी कहाँ हैं आज" ??? 

शहरयार ने उस दुश्मने जां के चेहरे पर एक नज़र डाल कर पूछा हमेशा की तरह ब्लैक सूट में वह खिल रही थी। वह बेसाख्ता फौरन ही अपनी नज़र घुमा गया क्योंकि उसे देखते ही दिल ने हमेशा की तरह सौ की स्पीड पर धड़कना शुरू कर दिया था। 

"जी वह फुप्पो हॉस्पिटल गयीं हैं दादू के चैकअप के लिये"


उसने बताते हुए सर्विंग डिश उसके आगे की थी। 

"क्या हुआ है दादू को" ???


वह सालन प्लेट में उतारते हुए हाथ रोक पूछने लगा । 

"दो दिन से थोड़ी सी तबियत खराब है बस इसलिये बाक़ी रूटीन चैकअप है आप परेशान ना हों"


उसने इतमीनान दिलाया तो वह हां में सर हिला कर खामोशी से खाने की तरफ मुतवज्जह हो गया। 


"बीबी जी , बड़े साहब आए हैं और साथ में और लोग भी हैं उनके"


मुलाज़िमा ने आ कर बताया तो वह खाना बीच में ही छोड़ कर उठ खड़ी हुई। 


"ठीक है मैं देखती हूं जा कर, तुम पानी ले कर आओ वहां और बुआ को बोलो नाशता रेडी करवा दें मैं आ रही हूं अभी "


"खाना तो पूरा करें आप" !! 


शहरयार ने लहजे को नॉर्मल बनाते हुए कहा


"कोई मसला नही , मैं बाद में कर लूंगी ऐसे अच्छा नही लगता ना वहां गैस्ट आए हैं "


वह ज़िम्मेदारी से कह कर उठ खड़ी हुई थी। 


शहरयार उसे देख कर रह गया। 

☆ ☆ ☆


दरवाज़ा बहुत ज़ोर ज़ोर से खटखटाया जा रहा था वह घबरा कर उठी। 

 अनस के बारे में सोचते सोचते पता नही किस वक़्त उसकी आँख लगी थी और अब यूं लगातार दरवाज़ा खटखटाने पर वह हड़बड़ा गई

“इस वक़्त कौन हो सकता है”

 उसने घड़ी की तरफ देखा जो रात के तीन बजा रही थी , वह जल्दी जल्दी पास पड़ा दोपट्टा उठा कर दरवाज़े की तरफ लपकी थी। 

“ क्या बात है बुआ , आप इस वक़्त” ??! 

दरवाज़े के बाहर खड़ी बुआ को देख कर वह हक़ीक़त में परेशान हो गयी। 

“बेटा जी जल्दी चलिये बड़ी बेगम साहिबा (दादू) को पता नही क्या हो गया है आँखे ही नही खोल रही हैं छोटी बेगम साहेबा बहुत परेशान हो रही हैं सब उनके कमरे में ही हैं”

बुआ ने घबरा कर ऐक ही साँस में पूरी बात बताई थी 

“चलिये जल्दी” 

वह पाँव में चप्पल डालती हुई उनके साथ हो ली 

सारे सर्वेंटस और शहरयार फुप्पो के कमरे में ही जमा थे मतलब ज्यादा सीरियस बात थी। 

“फुप्पो क्या बात है , क्या हुआ है दादू को” ???? 

उसने उन के माथे को छू कर देखते हुए पूछा। 

“उफ्फ खुदाया इन्हें तो बहुत तेज़ बुखार है”

आमना बेगम के कुछ कहने से पहले वह खुद ही बोली। 

“बुआ आप पानी लेकर आएं एक बड़े बरतन में और टॉवल भी ऐक” 

उसने ज़रा देर किये बग़ैर बुआ को कहा। 

“शेरी तुम ड्राइवर को बोलो गाड़ी निकाले हॉस्पिटल ले कर जाना है अम्मा को अभी "

आमना बेगम ने परेशान होते हुऐ बेटे को हुक्म दिया था। 

“फुप्पो कुछ देर रूक जाएं , अभी दादू को बहुत तेज़ बुखार है हॉस्पिटल तक पहुंचते पहुंचते मसला ज़्यादा बढ़ जाएगा अगर इसको नहीं कम किया गया अभी”

वह बुआ के हाथ से पानी का बरतन और तौलिया लेकर उन के सर पर जल्दी जल्दी पानी की पट्टियां रखते हुए बोली 

“बुआ इम्तियाज़ कहाँ हैं , उठाया नही आप ने उन्हें” ?? 

आमना बेगम ने पूछा 

“जी बेगम साहिबा वह बड़े साहब को उठाने के लिये शरफू को भेजा था मैंने उन्होंने बहुत देर में दरवाज़ा खोला है आ रहे हैं वह अभी"


बुआ बता ही रही थीं कि इम्तियाज़ साहब घबराते हुए कमरे में दाखिल हुए। 

“ क्या हुआ अम्मां को” ??? 

पूछते हुए वह उधर ही आए थे जिधर वह दादू के सर पर पट्टियां रख रही थी 

“बुखार बहुत तेज़ है, आँखे भी नही खोल रही हैं इसीलिये यह पट्टियां रख रहे हैं ठण्डे पानी की” !! 

आमना बेगम घबरा कर शौहर से बोलीं। 

“हां हां तुम फिक्र ना करो, कुछ नही होगा इन्शाअल्लाह”

वह दिलासा देते हुए बेटे की तरफ मुड़े थे 

“ गाड़ी निकलवाओ तुम जल्दी....