आर्यमन ने देखा कि अवनि उससे दूर सिमट रही है। वह समझ गया कि उसके पिछले किए की परछाईं अब भी अवनि के मन पर है। उसने धीमी आवाज़ में, कड़कड़ाते जबड़ों के बीच कहा:
"अवनि... डरो मत। मैं... मैं बस तुम्हें सुबह तक ज़िंदा देखना चाहता हूँ। मुझ पर यकीन मत करो, पर अपनी जान मत हारो।"
पहाड़ी की वह बर्फीली रात अब अपनी क्रूरता की चरम सीमा पर थी। आर्यमन, जो केवल एक बनियान में था, उस जानलेवा ठंड को और अधिक सह नहीं सका।
वह अवनि से कुछ कहने के लिए अपने नीले पड़ते होंठ खोलने ही वाला था कि अचानक उसका शरीर सुन्न पड़ गया।
आर्यमन का गिरना और अवनि की चीख
बिना किसी आहट के, आर्यमन का शरीर बर्फ की तरह सफेद पड़ गया और वह बेदम होकर एक तरफ ढह गया उसे बेहोशी ने अपनी आगोश में ले लिया था।
अवनि, जो अब तक संदेह के भंवर में फंसी थी, आर्यमन को अपनी आँखों के सामने गिरते देख सुन्न रह गई।
उसे जो सर्दी मार रही थी, वह खौफ के मारे जैसे गायब ही हो गई। उसने चीखकर पुकारा, "आर्यमन जी!" पहाड़ी के सन्नाटे में उसकी आवाज़ गूँजी, पर उसे सुनने वाला वहां कोई नहीं था।
अवनि ने घबराकर आर्यमन का कंधा झिंझोड़ा, उसके चेहरे को सहलाया, पर आर्यमन की कोई प्रतिक्रिया नहीं थी। उसकी सांसें बहुत धीमी चल रही थीं और जिस्म पत्थर की तरह ठंडा पड़ चुका था।
सत्य का साक्षात्कार और भारी मन
अवनि को अब अपनी भूल का अहसास हुआ। उसके मन की सारी शंकाएं और सारा डर कपूर की तरह उड़ गया।
उसे समझ आ गया कि जो इंसान अपनी जान की परवाह किए बिना अपनी शर्ट और कोट उतारकर उसे दे चुका है, वह उसे नुकसान पहुँचाने की चाल नहीं चल सकता।
"हे कान्हा! ये मैंने क्या किया? मैं उन्हें शक की निगाह से देखती रही और उन्होंने मुझे बचाने के लिए खुद को मौत के मुँह में झोंक दिया!" अवनि की आँखों से पश्चाताप के आंसू बहने लगे।
मर्यादा और ममता का संगम
अवनि बुरी तरह घबरा चुकी थी। वह जानती थी कि अगर आर्यमन के शरीर को तुरंत गर्माहट नहीं मिली, तो वह सुबह का सूरज नहीं देख पाएंगे।
उसे संकोच भी हो रहा था और डर भी, पर सामने मरते हुए इंसान की जान बचाना ही उसका सबसे बड़ा धर्म था।
अवनि ने हिम्मत जुटाई। उसने वह भारी कोट और शर्ट उतारा। उसने आर्यमन को बड़ी मुश्किल से सहारा देकर ज़मीन पर लिटाया और खुद उसके बिल्कुल बगल में बैठ गई।
उसने वह आधी शर्ट और आधा कोट अपने ऊपर लिया।
और उसका बाकी आधा हिस्सा आर्यमन के शरीर पर इस तरह फैलाया कि दोनों एक ही गर्माहट के घेरे में आ जाएं।
एक ही चादर के नीचे
उस कड़कड़ाती रात में, अवनि ने अपनी लोक-लाज और संकोच को किनारे रख दिया।
उसने आर्यमन के ठंडे पड़ते हाथों को अपने हाथों में ले लिया ताकि उसके शरीर की थोड़ी बहुत गर्मी आर्यमन तक पहुँच सके।
वह उसके करीब सिमटकर लेट गई, ताकि एक-दूसरे की सांसों की गर्माहट उन्हें उस बर्फीले तूफान से बचा सके।
अवनि ने मन ही मन कान्हा से प्रार्थना की, "इन्हें ठीक कर दो कान्हा, मुझे अपनी जान की परवाह नहीं, बस इन्हें कुछ नहीं होना चाहिए।" धीरे-धीरे, अवनि की आँखों में भी थकान और नींद छाने लगी।
वह पश्चाताप और ममता के एक अनूठे अहसास के साथ आर्यमन के साये में सो गई। वह रात, जो नफरत से शुरू हुई थी, अब निस्वार्थ समर्पण की गवाह बन रही थी।
रात बीत गई। पहाड़ियों के पीछे से सूरज की पहली सुनहरी किरण ने जब दस्तक दी, तो अवनि की नींद धीरे-धीरे खुली।
होश आते ही वह एक झटके से उठकर बैठ गई, उसका दिल ज़ोरों से धड़क रहा था। उसने देखा कि रात को जो कोट और शर्ट उसने और आर्यमन ने बाँटे थे, वे अब पूरी तरह अवनि के ऊपर ढके हुए थे, लेकिन उसके बगल की जगह खाली थी।
आर्यमन की तलाश और घबराहट
आर्यमन को पास न पाकर अवनि के हाथ-पाँव फूल गए। "आर्यमन जी!" उसने कांपती आवाज़ में पुकारा, पर चारों ओर सिर्फ सुबह की ताज़ी हवा का सन्नाटा था।
अवनि घबराकर उठ खड़ी हुई। उसे लगा कहीं रात की ठंड ने आर्यमन की तबीयत और ज़्यादा तो नहीं बिगाड़ दी? कहीं वे मदद की तलाश में कहीं दूर तो नहीं निकल गए?
वह लड़खड़ाते कदमों से झाड़ियों और पत्थरों के बीच उन्हें ढूँढने लगी। उसकी आँखों में फिर से आँसू तैरने लगे थे।
पर जैसे ही वह थोड़ा आगे बढ़ी, उसकी नज़र उस ऊँची चट्टान पर पड़ी जहाँ से कल रात मौत का खेल शुरू हुआ था।
चट्टान पर वह खामोश साया
आर्यमन उसी चट्टान के किनारे पर बिल्कुल शांत बैठा था, जहाँ से वह कल रात नीचे गिरा था।
वह नीचे गहरी खाई की ओर टकटकी लगाए देख रहा था। सुबह की पहली रोशनी उसके चेहरे पर पड़ रही थी, जिससे उसके चेहरे के भाव साफ़ नज़र आ रहे थे।
उन आँखों में अब नफरत नहीं, बल्कि एक गहरी अपराधबोध और आत्म-मंथन की झलक थी।
अवनि दबे पाँव उसके करीब पहुँची। आर्यमन ने जैसे ही पीछे से आती आहट सुनी, उसने गर्दन घुमाकर अवनि को देखा।
वह चुपचाप, बिना पलक झपकाए अवनि को निहारे जा रहा था। उसकी नज़रों में एक ऐसी कशिश थी, मानो वह अवनि के रूप में किसी देवी का दर्शन कर रहा हो।
वह उस लड़की को देख रहा था जिसने कल रात अपनी मर्यादा, अपनी सुख-सुविधा और यहाँ तक कि अपनी जान की भी परवाह नहीं की, सिर्फ उस इंसान को बचाने के लिए जिसने उसे अपमानित किया था।
नज़रों का मिलन
अवनि भी उसके पास जाकर बैठ गई। दोनों के बीच कुछ पल के लिए गहरा सन्नाटा रहा।
आर्यमन का चेहरा अवनि के चेहरे से हट ही नहीं रहा था; वह उसे ऐसे देख रहा था जैसे सदियों की प्यासी नज़रों को आज कोई किनारा मिल गया हो।
"आर्यमन जी... आप यहाँ?" अवनि ने धीरे से पूछा। "आपकी तबीयत कैसी है? रात को आप अचानक..."
आर्यमन ने एक लंबी और ठंडी साँस ली।
उसने अवनि के हाथ की उस चोटिल उंगली की ओर देखा जो रात के संघर्ष में फिर से लहूलुहान हो गई थी।
उसने बहुत ही धीमी और भारी आवाज़ में कहा, "अवनि, कल रात उस खाई में मैं नहीं गिरा था... कल रात मेरा वो अहंकार गिरा था जिसने मुझे अंधा कर दिया था।
मैं वहाँ बैठा बस यही सोच रहा था कि जिस इंसान को मैं 'पत्थर' समझकर चोट पहुँचा रहा था, वो तो खु़द पारस निकला जिसने मुझे छूकर फिर से ज़िंदा कर दिया।"
अवनि ने देखा कि आर्यमन की आँखों के किनारे गीले थे। उस सुबह की पवित्र बेला में, अवनि को समझ आ गया कि जिस कान्हा पर उसने भरोसा किया था, उसने आर्यमन के भीतर के रावण को मारकर एक सच्चे इंसान को जन्म दे दिया है।
बात करते-करते आर्यमन की आवाज़ में एक ऐसी नरमी आ गई जो अवनि ने पहले कभी महसूस नहीं की थी।
अपनी बात पूरी करने से पहले ही, आर्यमन ने धीरे से अपना हाथ बढ़ाया और अवनि का वह मुलायम, कोमल और बेहद सुंदर हाथ अपने हाथों में थाम लिया।
एक जादुई और पवित्र स्पर्श
जैसे ही आर्यमन की उंगलियों ने अवनि की मखमली हथेली को छुआ, अवनि के भीतर जैसे समय ठहर गया।
उस स्पर्श में एक ऐसी कशिश थी कि अवनि की रूह तक सिहर उठी। उसे एक बहुत ही प्यारा और सुंदर अहसास महसूस हुआ—एक ऐसा अहसास जिसे शब्दों में बयां करना नामुमकिन था।
उसे लगा जैसे सदियों की थकान मिट गई हो और जिस सुकून की तलाश उसे हमेशा से थी, वह आज आर्यमन की इन उंगलियों की गिरफ्त में मिल गया है।