Extramarital affair - 7 in Hindi Women Focused by Jyoti Prajapati books and stories PDF | एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 7

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एक्स्ट्रा मेरिटल अफेयर - 7

बावरा मन राह ताके तरसे रे
नैना भी मल्हार बनके बरसे रे
बावरा मन राह ताके तरसे रे
नैना भी मल्हार बनके बरसे रे
आधे से अधूरे से बिन तेरे हम हुए
फीका लगे है मुझको सारा जहाँ
बावरा मन राह ताके तरसे रे
नैना भी मल्हार बनके बरसे रे
यह कैसी खुशी हैजो मोम सी है
आँखों के रास्ते हँसके पिघलने लगी
मन्नत के धागे ऐसे हैं बाँधे
टूटे ना रिश्ता जुड़के तुझसे कभी
टूटे ना रिश्ता जुड़के तुझसे कभी
सौ बालाए ले गया तू सर से रे
नैना ये मल्हार बनके बरसे रे
मैं काग़ज़ की कश्ती तू बारिश का पानी
ऐसा है तुझसे अब ये रिश्ता मेरा
तू है तो मैं हूँ तू आए बह लू 
आधी है दुनिया मेरी तेरे बिना
आधी है दुनिया मेरी तेरे बिना
जी उठी सौ बार तुझपे मरके रे
नैना ये मल्हार बनके बरसे रे
बावरा मन राह ताके तरसे रे
नैना ये मल्हार बनके बरसे रे


पहाड़ों की गोद में बसा वह छोटा सा गांव, जहाँ राघवन पहुँचा था, महानगर के उस कोलाहल से बिल्कुल विपरीत था। यहाँ वक्त की कोई सीमा नहीं थी। सूरज सुबह देरी से निकलता था और शाम होते ही सब कुछ खामोश हो जाता था। राघवन ने एक छोटा सा कॉटेज किराए पर लिया था। यहाँ का सन्नाटा उसे डराता नहीं था, बल्कि उसे अपनी ही आवाज़ सुनाने के लिए मजबूर कर रहा था।
उसने महानगर के उस मुखौटे को उतार कर रख दिया था। यहाँ कोई प्रेजेंटेशन नहीं थे, कोई कॉर्पोरेट मीटिंग्स नहीं थी, कोई पत्नी की ठंडी नज़रें नहीं थीं, और न ही कोई मीरा का साया। यहाँ सिर्फ वह था, उसकी डायरी, और पहाड़ों की वह अंतहीन खामोशी।
लेकिन, क्या खामोशी वाकई सुकून देती है?
राघवन ने महसूस किया कि जब आप बिल्कुल अकेले होते हैं, तो सबसे पहले आपका अपना अतीत आपके सामने आकर खड़ा हो जाता है। उसे मीरा की याद आने लगी। न केवल मीरा, बल्कि शालिनी की वह ठंडी हंसी भी। वह सोचने लगा कि क्या उसने वाकई सही किया? क्या भाग जाना ही समाधान था?
अफेयर का मनोविज्ञान कहता है कि लोग भागते हैं क्योंकि वे अपने उस वर्जित सुख के बाद आने वाले 'गिल्ट' (Guilt) को नहीं झेल पाते। राघवन का भागना भी उसी गिल्ट से था। वह अपनी पत्नी से नहीं भाग रहा था, वह अपने उस 'खुद' से भाग रहा था जिसने एक पवित्र रिश्ते को अपनी हवस और तन्हाई के लिए इस्तेमाल किया था।
वह घंटों पहाड़ों की ऊंचाइयों पर चढ़ता। हवा में एक अजीब सी ठंडक थी, जो उसके सीने में उतर जाती। उसे याद आया कि मीरा हमेशा कहती थी— "इंसान पहाड़ पर इसलिए नहीं चढ़ता कि वह दुनिया को देख सके, बल्कि वह इसलिए चढ़ता है कि पहाड़ उसे देख सके।"
उसने अपनी डायरी खोली। उसने लिखना शुरू किया। इस बार उसने मीरा के बारे में नहीं, बल्कि अपने बारे में लिखा। उसने लिखा— 'मैं एक कायर हूँ। मैंने प्यार को 'अफेयर' बना दिया, मैंने शादी को 'कॉन्ट्रैक्ट' बना दिया। मैंने अपने जीवन के हर महत्वपूर्ण मोड़ पर सिर्फ अपने सुख को चुना।'
लिखना एक थेरेपी की तरह था। जैसे-जैसे वह अपने अंदर की गंदगी को पन्नों पर उतार रहा था, उसका मन हल्का होता जा रहा था। उसे अहसास हुआ कि हम एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर तब करते हैं जब हम अपनी कमियों को अपने पार्टनर के सर मढ़ना चाहते हैं। राघवन ने अपनी शादी को 'मैनेजमेंट' इसलिए कहा था क्योंकि वह खुद को बदलने की हिम्मत नहीं रखता था।
तभी एक दिन, उसके पास एक पत्र आया। यह शालिनी का था।
उसने कांपते हाथों से पत्र खोला। उसमें लिखा था— “राघवन, जब तुम गए, तो घर का सन्नाटा पहले से दोगुना हो गया। मैं नहीं जानती कि तुम कहाँ हो और क्या सोच रहे हो। लेकिन मैंने महसूस किया कि जो गलती तुमने की, उसमें मेरा भी उतना ही हाथ था। मैंने तुम्हें कभी वह इंसान नहीं माना जो तुम थे, मैंने तुम्हें हमेशा वही माना जो मैं चाहती थी कि तुम बनो। हमने एक-दूसरे को कभी नहीं देखा, हम बस अपने-अपने मुखौटों से बात कर रहे थे। आओ और हम फिर से बात करते हैं। न पति-पत्नी की तरह, न ही कायरों की तरह... बस दो इंसानों की तरह।”
राघवन के हाथ से पत्र गिर गया। यह शालिनी का वह पक्ष था जो उसने कभी नहीं देखा था। यह वह 'इंसान' था जो उसके घर की उस ठंडी दीवार के पीछे छिपा था।
क्या उसे वापस जाना चाहिए था? क्या एक्स्ट्रा-मेरिटल अफेयर के बाद भी किसी रिश्ते में कोई उम्मीद बची रहती है?
उसने अपनी डायरी बंद की। उसने देखा कि पहाड़ की चोटियों पर बर्फ गिर रही थी। हर गिरती बर्फ की बूंद पुरानी परत को ढक रही थी। शायद रिश्ता भी ऐसा ही होता है—पुरानी गलतियों पर नई शुरुआत की बर्फ जमती जाती है।
उसने अपनी पैकिंग की। उसे वापस जाना था। लेकिन इस बार वह राघवन बनकर नहीं, जो भागकर गया था, बल्कि उस इंसान बनकर जिसे अपनी गलतियों का अहसास था।
वह पहाड़ से नीचे उतरा। उसकी गाड़ी फिर से उसी महानगर की ओर बढ़ने लगी। उसे पता था कि वह जो वापस लौट रहा है, वह उस खोखलेपन में ही वापस लौट रहा है, लेकिन इस बार उसने उसे बदलने का संकल्प लिया था।
अफेयर का यह खेल अब खत्म हो चुका था। उसकी जगह अब 'सत्य' ने ले ली थी। वह सत्य जो कड़वा था, जो कठिन था, लेकिन जो उसके अपने अस्तित्व के लिए ज़रूरी था।
उसने गाड़ी का रेडियो चलाया। एक पुराना गाना बज रहा था। उसने गाने के साथ गुनगुनाना शुरू किया। उसे लगा कि वह फिर से जी रहा है।
महानगर की सीमाएं फिर से दिखने लगी थीं। वह फिर से उसी भीड़, उसी ट्रैफिक और उसी मुखौटों की दुनिया में प्रवेश कर रहा था। लेकिन इस बार, वह मुखौटा नहीं पहने हुए था। उसके पास अब अपनी एक पहचान थी—एक ऐसा इंसान जिसने अपनी गलतियों को स्वीकार किया था।
जब वह अपने घर पहुँचा, तो शाम हो रही थी। उसने दरवाजा खोला। घर के भीतर शालिनी बैठी थी। उसने राघवन को देखा। इस बार उसकी आँखों में न गुस्सा था, न ही ठंडी व्यावसायिकता। उसमें एक प्रश्न था—क्या हम वाकई बदल सकते हैं?
राघवन ने अपना सूटकेस जमीन पर रखा।
"मैं वापस आ गया हूँ," उसने कहा।
शालिनी उठी और उसके पास आई। उसने राघवन के चेहरे को देखा। वह सब समझ गई थी।
"क्या तुमने अपनी डायरी पूरी कर ली?" उसने पूछा।
राघवन ने अपनी डायरी की तरफ देखा। उसने मुस्कुराकर कहा, "डायरी अभी खत्म नहीं हुई है, शालिनी। हम मिलकर उसे पूरी करेंगे।"
(उपन्यास जारी... अगले अध्याय में हम देखेंगे कि कैसे वे इस 'कॉन्ट्रैक्ट' को 'रिश्ते' में बदलते हैं, और क्या मीरा का साया पूरी तरह से खत्म हो गया है।)



क्रमशः