A ragging like this in Hindi Short Stories by Virendra Dewangan books and stories PDF | एक रैगिंग ऐसा भी

Featured Books
Categories
Share

एक रैगिंग ऐसा भी

‘‘अबे! कहा न, घुटने को देख। घुटना कहीं का! सिर उठाया, तो मुर्गा बना दूूंगा।’’ मेडिकल कॉलेज, रायपुर में शाम को सीनियर छात्र यश ने जूनियर सरेश को लताड़ा।

‘‘जी-जी, देख ही रहा हूं। कितना घुटने को देखता रहूंगा?’’ सरेश झल्लाकर बोला।

सरेश को झल्लाता जानकर उसका जूनियर साथी सुरेश कोहनी मारकर उसको चेताया,‘‘जी के साथ ‘सर’ लगा मूर्ख! तुझे पता नहीं, सीनियर को ‘सर’ बोला जाता है। इसी बात पर वे तुझे रगेद देंगे।’’

इतने में दूसरा सीनियर-मनोज सामनेवाले चेयर पर पैर फैलाया और अपनी बढ़ी हुई दाड़ी पर सगर्व हाथ फेरा,‘‘सीनियर से बात करते समय ‘घुटना देखने और ‘सर’ बोलने का क्या आशय है?’’

‘‘इसका मतलब है ‘सर’ कि हमारा सिर सीनियरों के सम्मान में हमेशा झुका रहेगा।’’ सुरेश यकीन से जवाब दिया, तो मनोज उसे शाबाशी देते हुए बोला, ‘‘गुड, वैरी गुड।’’

‘‘कहां के हो?’’मनोज ने पूछा।

‘‘जी, मैं धमतरी का हूं।’’सुरेश ने कहा।

‘‘...और तुम्हारा साथी!’’ अगला प्रश्न फिर आया।

‘‘वो बालोद का है।’’सुरेश ने उसी लहजे में फिर जवाब दिया।

इसका मतलब ये हुआ कि हमें सरेश के पापा से ये बात पूछनी चाहिए कि वे अपने पुत्र को कुपुत्र क्यों बनाना चाहते हैं?

इस तरह दड़ियल मनोज मूछों पर ताव देते हुए सरेश को आदेश फरमाया,‘‘अपने पापा को फोन लगाओ।’’

‘‘क्यों?’’सरेश ने प्रतिप्रश्न किया।

इस पर सुरेश फिर कोहनी मारा,‘‘सीनियर से प्रश्न नहीं करते बेवकूफ!’’

साथी सुरेश के कोहनी मारने से सरेश पहले तो अचकचाया; फिर अपने मोबाइल पर नंबर लगाकर काल किया और बुझे मन बोला, ‘‘आपसे हमारे सीनियर बात करना चाहते हैं।’’

उधर से जवाब आया,‘‘काहे?’’

‘‘आप ही जानो कि किसलिए?’’ सरेश उदासी से बोला।

‘‘एक काम करो। तुम उन्हें 10 गाली देकर तमीज न सिखाने के लिए बुरी तरह डांटो।’’इस पर मनोज ने हस्तक्षेप करते हुए हुक्म फरमाया।

‘‘लो, लो, शुरू हो जाओ। इसमें घबराना कैसा? पसीना आ रहा हो, तो ऐ लो रूमाल!’’ तीसरे सीनियर ने रूमाल बढ़ाते हुए उलाहना दिया।

अब, सरेश मरता क्या न करता? किसी आज्ञाकारी बच्चे की नाई शुरू हो गया,‘‘ओय, घूसठ! तूने मेरा जीना हराम कर रखा है। तू अगर मुझे सही सीख दिया होता, तो तेरी औकात तुझे दिखाने की नौबत नहीं आती, बुड्ढे! अपने-आप को तीस मार खां समझता है और अपनी अकड़ में जीता है अकडू!’’

इधर सीनियरों का पेट हंसी के मारे फूला जा रहा था, उधर सरेश का अपने पिता के प्रति गाली चालू था, ‘‘तू उस जमाने में पैदा हुआ, जिसमें नौकरियां आदमियों को ढूंढती थी, इसलिए अधिकारी बन गया नालायक! आज पैदा होता, तो हमारी तरह चप्पलें घिसता। घक्के खाते दिन गुजारता, बेवकूफ! कहो, तो तुझे चौकीदारी भी नसीब नहीं होती, नामुराद! पहले पैदा होकर हमें धौंसधपट दिखाता है लंगूर! हमें अभी तक बच्चा समझता है नासमझ! गधा, पाजी, बदतमीज कहीं का!’’

इधर सीनियर हंस-हंस कर लोटपोट हुए जा रहे थे, उधर सरेश रुकने का नाम नहीं ले रहा था, ‘‘मैं तुझे समझदार समझता था हरामी! लेकिन तू तो नासमझ निकला? इसीलिए, दूर से प्रणाम! मां का ख्याल रखना कसाई!’’

हंसी-ठट्ठा का यह माहौल पांच-दस मिनट यूं ही बना रहा। इस हंसी से खुशी जताते हुए सीनियरों ने कहा,‘‘अब जाने भी दो बेचारों को! आज बहुत हो गई मजे के साथ रगड़ाई?’’

इस तरह ‘जान बची लाखों पाए, लौट के बूद्धू घर को आए’ की माफिक सरेश और सुरेश कालेज से हॉस्टल की ओर चल पड़े।

रास्ते में सुरेश, सरेश से पूछा,‘‘तुम्हें ऐसी हिम्मत कहां से आ गई कि अपने जन्मदाता को गाली देने लगे?’’

‘‘उन बेवकूफों को क्या मालूम कि मैं अपने बाप को गाली दे रहा था कि अपने लगोटिये यार को!’’ सरेश बेफिक्री से बोला, तो अब चकराने की बारी सुरेश की थी, ‘‘बाप-रे-बाप! यह तो सबका बाप निकला!! सीनियरों को भी गच्चा दे गया।’’
--00--

लघुकथा पढ़ने के लिए दिल से शुक्रिया। कृपया सब्सक्राइब कर लेखक के लेखकीय प्रयासों को प्रोत्साहित करें।