self respect is first in Hindi Motivational Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | आत्म सम्मान सर्वोपरि

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आत्म सम्मान सर्वोपरि

आत्म सम्मान सर्वोपरि 

नेहा गुरुद्वारे से लौट रही थी तो गली के बाहर बिजली के खंभे पर एक छोटा सा पम्पलेट चिपका देखा। उस पर लिखा था - "क्लिनिक के लिए योगा टीचर / रिसेप्शनिस्ट की आवश्यकता है।"

नेहा को ऐसी ही किसी नौकरी की तलाश थी जो घर के पास हो, ताकि वह अपने बेटे राहुल की देखभाल के साथ-साथ कुछ अपना भी कर सके। मन में सोचा, दो-चार घंटे का काम होगा तो घर भी संभल जाएगा और गृहस्थी में भी कोई बाधा नहीं आएगी।

शाम को ठीक छह बजे वह क्लिनिक पर डॉक्टर से बात करने पहुँच गई। रिसेप्शनिस्ट ने उसे थोड़ी देर बैठने को कहा। करीब पन्द्रह मिनट बाद उसे अंदर बुलाया गया।

सामने लगभग 65 वर्ष के एक सज्जन बैठे थे, वही साक्षात्कार ले रहे थे। नेहा ने हाथ जोड़कर नमस्ते किया। आत्मविश्वास से उसका चेहरा दमक रहा था। उसकी सौम्यता और भोलेपन से वह सज्जन बड़े प्रभावित हुए।

डॉक्टर ने पूछा, "क्या लोगी आप?"

नेहा ने कहा, "जी, तीन हजार रुपये प्रति घंटा।"

डॉक्टर ने थोड़ा सोचते हुए कहा, "क्या तुम्हें वीडियो एडिटिंग आती है? तुम्हारे रिज्यूम में लिखा है?"

नेहा ने मुस्कुराते हुए कहा, "जी सर, मैं लेखक भी हूँ। कविता, कहानी, संस्मरण लिखती हूँ और कविता के वीडियो भी बनाती हूँ।"

डॉक्टर एकदम खुश हो गए, "अरे वाह! मुझे अपनी किताब प्रकाशित करानी है - 'शुगर को जड़ से खत्म करें'। मैं तुम्हें मौखिक रूप से निर्देश दूँगा, तुम उसे लिखना और अपने हुनर का प्रयोग करते हुए किताब का रूप देना। एडिटिंग, प्रूफ रीडिंग और प्रकाशित कराना सब तुम्हारा काम है। मैं तुम्हें 2500 रुपये प्रति घंटे दूँगा। बीच में एक से पाँच बजे तक ब्रेक रहेगा तुम्हारा। उस समय तुम घर जा सकती हो। शाम को पाँच से आठ और सुबह दस से एक बजे तक, कुल छह घंटे काम करना है। कल से दस बजे आ जाना।"

नेहा "जी सर" कहकर अपने घर चली गई। घर आकर सारी बात अपने पति को बताई।

"बीच में लंबा ब्रेक है दिन में, घर आकर राहुल को खाना भी दे दिया करूँगी। मैं यह जॉब करना चाहती हूँ।"

नेहा के पति ने सहमति देते हुए कहा, "देखो तुम्हें दिक्कत नहीं है तो मुझे भी कोई समस्या नहीं। घर और जॉब दोनों संभाल सकती हो तो कर लो।"

अगली सुबह नेहा खुश थी कि सफलता की ओर उसका यह पहला कदम है। वो 'सुपर वुमेन' बनने को तैयार थी। खुशी-खुशी घर का काम निपटाया और ठीक दस बजे ऑफिस पहुँच गई।

डॉक्टर ने पहले दिन उसे संपादन का काम नहीं दिया, रिसेप्शन का कार्य दिया करने को। नेहा मना करना चाहती थी लेकिन ना नहीं कह पाई। उसने सोचा, कम्प्यूटर पर ही तो काम करना है। बड़ी मुश्किल से घर के पास ही जॉब मिली है, कर लेती हूँ।

नेहा मन लगाकर सभी काम तीन दिन में ही सीख गई। सर ने उसे जितना भी काम दिया, खुशी से किया। पहली किताब उसने दिन-रात मेहनत कर पन्द्रह दिन में ही संपादित कर दी। सर भी उसके काम से खुश थे।

लेकिन दूसरी किताब के साथ अब नेहा से क्लिनिक के काम भी करवाने लगे - जैसे दवाइयों की लिस्ट बनाना, दवाई की अलमारी व्यवस्थित करना, अपनी मेज की सफाई करना।

नेहा की आत्मा यह स्वीकार नहीं कर पाई। उसे लगा कि उसने इतनी पढ़ाई रिसेप्शनिस्ट का काम करने के लिए नहीं की। उसे सर से बात करनी ही होगी।

नेहा सर के केबिन में गई। बड़ी विनम्रता से उसने अपनी बात रखी -

"सर, मैंने यहाँ वीडियो एडिटर व पुस्तक संपादन की जॉब के लिए हामी भरी थी, एक नर्स या परिचारिका बनने के लिए नहीं। मैं इस जॉब के लिए संतुष्ट नहीं हूँ। आपकी दूसरी किताब मैं घर से ही पूरी कर दूँगी। यह रहा मेरा इस्तीफा। धन्यवाद!"

ऐसा कहकर नेहा अपना बैग उठा घर चली गई।

नेहा ने घर आकर अपने पति को सारी बात बताई तो उसके पति ने उसका समर्थन करते हुए कहा कि "तुमने सही किया। तुम्हारे पास हुनर है, तुम तो घर बैठे अपना काम कर सकती हो। कोई जरूरत नहीं ऐसी नौकरी की। जिस काम को आत्मा स्वीकार न करे, उसे नहीं करना चाहिए।"

नेहा नई शुरुआत का संकल्प ले, सोने चली जाती है।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली