Greedy confectioner in Hindi Moral Stories by palak baisla books and stories PDF | लालची हलवाई

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लालची हलवाई

एक समय की बात है, एक छोटे से गाँव में घसीटाराम नाम का एक हलवाई रहता था। उसके हाथ की बनी जलेबी और लड्डू इतने स्वादिष्ट होते थे कि दूर-दूर के गाँवों से लोग उसे खाने आते थे। उसकी दुकान सुबह से शाम तक चलती रहती थी और खूब कमाई होती थी।

पर धीरे-धीरे घसीटाराम के मन में लालच आ गया। उसे लगा कि अगर वह थोड़ी चालाकी करे तो और भी ज्यादा पैसा कमा सकता है। उसने सोचा कि कोई देख तो रहा नहीं। बस, उसी दिन से उसने अपने काम में बेईमानी शुरू कर दी।

अब वह शुद्ध देशी घी की जगह सस्ता डालडा इस्तेमाल करने लगा। मावे में मैदा मिलाने लगा, और चाशनी में भी मिलावट करने लगा। इससे उसकी मिठाइयाँ देखने में तो वैसी ही लगती थीं, पर उनका असली स्वाद और शुद्धता खत्म हो गई थी। उसकी लागत आधी हो गई और मुनाफा दोगुना हो गया। वह बहुत खुश था।

उसकी दुकान पर रामू नाम का एक गरीब नौकर काम करता था। रामू दिल का बहुत ईमानदार और सच्चा था। उसने एक दिन हिम्मत करके घसीटाराम से कहा, "सेठ जी, यह आप क्या कर रहे हैं? आप लोगों के स्वास्थ्य के साथ खिलवाड़ कर रहे हैं। भगवान देख रहा है, ऐसा पाप मत करो।"

घसीटाराम ने गुस्से में उसे डाँट दिया और बोला, "तू नौकर है, नौकर बनकर रह। मुझे ज्यादा ज्ञान देने की जरूरत नहीं है। अपना काम कर।" रामू चुप हो गया, पर उसका मन बहुत दुखी हुआ।

कुछ ही महीनों में गाँव के लोगों को उसकी मिठाइयों का असर दिखने लगा। कई लोगों के पेट में दर्द रहने लगा, बच्चों को उल्टियाँ होने लगीं। धीरे-धीरे लोगों ने उसकी दुकान पर जाना बंद कर दिया। उसकी बिक्री आधी रह गई, पर फिर भी उसे समझ नहीं आया।

उसी महीने गाँव में एक बहुत बड़ा मेला लगा। घसीटाराम ने सोचा कि यह तो बहुत अच्छा मौका है। मेले में हजारों लोग आएंगे, मैं एक ही दिन में लाखों कमा लूंगा। उसने मेले के लिए दो क्विंटल नकली मावे और खराब तेल से लड्डू तैयार किए।

मेले वाले दिन सुबह से ही उसकी दुकान पर भीड़ लग गई। उसने सारे लड्डू ऊँचे दामों पर बेच दिए। वह मन ही मन बहुत खुश हो रहा था। लेकिन शाम होते-होते मेले में हाहाकार मच गया। जिस-जिस ने उसके लड्डू खाए थे, उन सभी को तेज उल्टी और दस्त होने लगे। लगभग सौ से ज्यादा लोग बीमार पड़ गए।

गुस्साई भीड़ ने उसकी दुकान को घेर लिया और तोड़फोड़ कर दी। किसी ने पुलिस को बुला लिया। पुलिस आई और घसीटाराम को पकड़ कर ले गई। जाँच में उसकी मिलावट का सारा सच सामने आ गया। उसे छह महीने की जेल हुई और पचास हजार रुपये का जुर्माना भी लगा।

जब वह जेल से बाहर आया तो उसकी दुकान पूरी तरह बंद हो चुकी थी। गाँव में उसकी इज्जत खत्म हो चुकी थी। कोई उससे बात तक नहीं करता था। वह भूखों मरने की कगार पर आ गया।

तभी रामू, जो अब अपनी छोटी सी ईमानदारी की दुकान चला रहा था, उसके पास आया। रामू ने उसे खाना खिलाया और कहा, "देखा सेठ जी, लालच बुरी बला है। अगर आप पहले ईमानदारी से काम करते, तो आज पूरा गाँव आपका सम्मान करता।"

घसीटाराम की आँखों में आँसू आ गए। उसे अपनी गलती का पछतावा हुआ। उसने रामू से माफी मांगी। रामू ने उसे अपने पास नौकर रख लिया। अब घसीटाराम रामू की दुकान पर पूरी ईमानदारी और शुद्धता से मिठाइयाँ बनाता है।

*सीख: लालच का अंत हमेशा बुरा होता है, और ईमानदारी की कमाई में ही सच्चा सुख और बरकत है।*