भाग ११ — दूरियों के बीच रिश्ते
नए शहर में मिहिर को आए हुए लगभग तीन महीने हो चुके थे।
शुरुआत में उसे लगा था कि कुछ दिन मुश्किल होंगे, फिर सब आसान हो जाएगा।
लेकिन कुछ दूरियाँ ऐसी होती हैं जो समय के साथ कम नहीं होतीं…
बस इंसान उन्हें सहना सीख जाता है।
हर सुबह मिहिर ऑफिस जाने से पहले घर पर फोन करता।
“माँ, पापा ने दवा ले ली?”
“हाँ बेटा।”
“निशा, बच्चों को स्कूल भेज दिया?”
“हाँ।”
“आज पापा की तबीयत कैसी है?”
“ठीक है।”
हर दिन वही सवाल।
हर दिन वही जवाब।
लेकिन इन छोटी-छोटी बातों में ही उसका पूरा घर बसता था।
ऑफिस में मिहिर का काम अच्छा चल रहा था।
उसकी मेहनत देखकर बॉस भी खुश थे।
कुछ ही समय में उसे एक महत्वपूर्ण प्रोजेक्ट की जिम्मेदारी मिल गई।
सहकर्मी उसे पसंद करने लगे थे।
लेकिन सफलता के साथ काम भी बढ़ता गया।
सुबह से रात तक ऑफिस।
कई बार खाना भी ऑफिस में ही खाना पड़ता।
एक रात करीब ग्यारह बजे मिहिर अपने कमरे में लौटा।
उसने मोबाइल देखा।
निशा के सात मिस्ड कॉल थे।
मिहिर घबरा गया।
उसने तुरंत फोन किया।
“निशा! क्या हुआ?”
दूसरी तरफ कुछ पल खामोशी रही।
फिर निशा की धीमी आवाज आई—
“पापा को फिर से अस्पताल ले जाना पड़ा।”
मिहिर का दिल बैठ गया।
“क्या हुआ?”
“आज शाम अचानक कमजोरी और चक्कर आए थे।”
“अब कैसे हैं?”
“अभी डॉक्टर देख रहे हैं।”
मिहिर ने तुरंत बैग उठाया।
“मैं अभी निकलता हूँ।”
निशा ने कहा—
“मिहिर, रात बहुत हो गई है।”
“मुझे आना है।”
“लेकिन कल तुम्हारी मीटिंग है।”
“मीटिंग बाद में होगी।”
निशा चुप हो गई।
फिर बोली—
“तुम्हारी नौकरी अभी नई है। बार-बार छुट्टी लोगे तो…”
मिहिर ने उसकी बात बीच में रोक दी।
“नौकरी मेरे लिए जरूरी है, निशा।”
वह कुछ पल रुका।
“लेकिन पापा उससे ज्यादा जरूरी हैं।”
फोन रखने के बाद मिहिर ने रात की पहली बस की टिकट बुक कर ली।
सुबह तक वह अपने शहर पहुँच गया।
अस्पताल के कमरे में पापा बेड पर लेटे थे।
मिहिर को देखते ही उन्होंने कहा—
“तू क्यों आया?”
मिहिर उनकी तरफ देखकर मुस्कुराया।
“आपने बुलाया था।”
“मैंने कब बुलाया?”
“दिल से।”
पापा हल्का-सा मुस्कुराए।
“तू अभी भी बच्चा है।”
मिहिर ने उनका हाथ पकड़ लिया।
“आपके लिए हमेशा।”
कुछ देर बाद डॉक्टर आए।
उन्होंने बताया कि अभी स्थिति नियंत्रण में है, लेकिन पापा को आराम और नियमित इलाज की जरूरत है।
मिहिर ने राहत की साँस ली।
उस शाम वह अस्पताल की कैंटीन में अकेला बैठा था।
निशा उसके पास आई।
“कुछ खा लो।”
“भूख नहीं है।”
“सुबह से कुछ नहीं खाया।”
“मन नहीं है।”
निशा ने प्लेट उसके सामने रख दी।
“तुम दूसरों की चिंता करते-करते खुद को भूल जाते हो।”
मिहिर ने मुस्कुराकर कहा—
“ये बात मैंने कहीं सुनी है।”
निशा भी मुस्कुरा दी।
कुछ पल दोनों चुप रहे।
फिर निशा ने कहा—
“एक बात कहूँ?”
“हाँ।”
“तुम्हें वापस जाने की जरूरत नहीं है।”
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
“क्या मतलब?”
“कुछ दिनों की छुट्टी ले लो।”
“लेकिन ऑफिस…”
“ऑफिस तुम्हारे बिना कुछ दिन चल जाएगा।”
मिहिर ने कहा—
“अगर मैं बार-बार छुट्टी लेता रहा तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ सकती है।”
निशा ने धीरे से कहा—
“और अगर नौकरी बचाते-बचाते हम तुम्हें खो दें तो?”
मिहिर चुप हो गया।
उसके पास जवाब नहीं था।
अगले दिन मिहिर ने ऑफिस में फोन किया।
उसने स्थिति समझाई।
बॉस ने कुछ देर चुप रहने के बाद कहा—
“मिहिर, तुम परिवार के साथ रहो।”
मिहिर को उम्मीद नहीं थी कि बॉस इतनी आसानी से मान जाएंगे।
“सर, प्रोजेक्ट…”
“टीम संभाल लेगी।”
“लेकिन…”
“मिहिर, जिंदगी में कुछ चीजें ऐसी होती हैं जिन्हें बाद में ठीक नहीं किया जा सकता।”
मिहिर की आँखें नम हो गईं।
“Thank you, sir.”
फोन रखने के बाद वह पापा के पास बैठ गया।
पापा ने पूछा—
“नौकरी बच गई?”
मिहिर मुस्कुराया।
“हाँ।”
पापा ने कहा—
“देखा? हर बार डरने की जरूरत नहीं होती।”
मिहिर ने उनका हाथ दबाया।
“पापा…”
“हम्म?”
“मैंने जिंदगी भर सोचा कि अगर मैं जिम्मेदारी नहीं उठाऊँगा तो सब बिखर जाएगा।”
पापा ने उसकी तरफ देखा।
“लेकिन अब समझ आया है कि कभी-कभी जिम्मेदारी छोड़ना भी जरूरी होता है।”
पापा मुस्कुराए।
“यही तो जिंदगी है।”
कुछ दिनों बाद पापा की तबीयत बेहतर होने लगी।
मिहिर वापस नौकरी पर लौट गया।
लेकिन अब उसके भीतर कुछ बदल चुका था।
पहले वह हर समय काम में डूबा रहता था।
अब वह ऑफिस और परिवार के बीच संतुलन बनाने लगा।
वह हर महीने घर आने की कोशिश करता।
बच्चों के साथ समय बिताता।
पापा को डॉक्टर के पास ले जाता।
माँ के साथ बैठकर बातें करता।
और निशा के साथ सिर्फ खर्च और जिम्मेदारियों की नहीं…
उनकी अपनी जिंदगी की बातें भी करता।
एक शाम निशा ने पूछा—
“मिहिर, तुम्हें याद है जब तुम कहते थे कि तुम सबके बीच अकेले हो?”
मिहिर मुस्कुराया।
“हाँ।”
“अब?”
मिहिर ने कुछ पल सोचा।
“अब भी कभी-कभी अकेलापन लगता है।”
निशा ने पूछा—
“फिर?”
“लेकिन अब मैं उस अकेलेपन से डरता नहीं।”
“क्यों?”
मिहिर ने कहा—
“क्योंकि अब मुझे पता है कि अकेला महसूस करना और सच में अकेला होना अलग बातें हैं।”
निशा की आँखों में मुस्कान आ गई।
उसी रात मिहिर के मोबाइल पर एक ईमेल आया।
उसने ईमेल खोला।
कंपनी ने उसे एक बड़े पद के लिए प्रमोशन की पेशकश की थी।
साथ में एक शर्त थी—
उसे फिर से एक बड़े प्रोजेक्ट के लिए दूसरे देश में जाना पड़ सकता था।
मिहिर स्क्रीन को देखता रह गया।
एक तरफ उसके करियर की सबसे बड़ी संभावना थी।
दूसरी तरफ उसका परिवार…
जिसे उसने बड़ी मुश्किल से फिर से अपने करीब महसूस करना शुरू किया था।
उसने मोबाइल बंद कर दिया।
उसके मन में सिर्फ एक सवाल था—
“क्या हर सफलता की कीमत अपने लोगों से दूर जाना ही होती है?”
और इस बार…
फैसला पहले से कहीं ज्यादा कठिन था।