भाग 14 — एक और परीक्षा
सुबह के करीब आठ बजे थे।
मिहिर ऑफिस जाने के लिए तैयार हो रहा था।
निशा बच्चों के टिफिन तैयार कर रही थी और घर में रोज़ की तरह सुबह की भागदौड़ चल रही थी।
मिहिर ने अपनी घड़ी पहनी ही थी कि उसका फोन बजा।
स्क्रीन पर ऑफिस के मैनेजर का नाम देखकर वह कुछ पल के लिए रुक गया।
“हैलो सर?”
दूसरी तरफ से आवाज आई—
“मिहिर, आज ऑफिस थोड़ी जल्दी आ जाना। तुमसे जरूरी बात करनी है।”
“सब ठीक है ना सर?”
कुछ सेकंड की खामोशी के बाद जवाब आया—
“ऑफिस आओ, फिर बात करते हैं।”
फोन कट गया।
मिहिर के मन में अचानक बेचैनी होने लगी।
उसे समझ नहीं आया कि आखिर बात क्या हो सकती है।
ऑफिस पहुँचते ही उसे महसूस हुआ कि माहौल सामान्य नहीं था।
कई कर्मचारी आपस में धीमी आवाज में बातें कर रहे थे।
मिहिर अपनी सीट पर बैठा ही था कि मैनेजर ने उसे केबिन में बुलाया।
“बैठो मिहिर।”
मिहिर बैठ गया।
मैनेजर ने सामने रखी फाइल उसकी तरफ बढ़ाई।
“कंपनी पिछले कुछ महीनों से आर्थिक परेशानी से गुजर रही है।”
मिहिर चुपचाप सुनता रहा।
“कुछ कर्मचारियों की छंटनी करनी पड़ेगी।”
मिहिर का दिल धक से रह गया।
“सर…”
मैनेजर ने उसकी तरफ देखा।
“मिहिर, तुम्हारा नाम भी उस सूची में है।”
कुछ पल के लिए कमरे की हर आवाज जैसे बंद हो गई।
मिहिर कुछ बोल ही नहीं पाया।
उसने बस धीरे से पूछा—
“कब तक?”
“एक महीने का नोटिस है।”
मिहिर ने सामने रखी फाइल को देखा।
उसकी आँखों के सामने अचानक घर का पूरा खर्च घूमने लगा।
बच्चों की फीस।
घर की EMI।
पिता की दवाइयाँ।
विवेक की मदद।
राशन।
बिजली का बिल।
और सबसे बड़ी बात—
उसके परिवार की उम्मीदें।
वह धीरे से उठा।
“सर, क्या कुछ किया जा सकता है?”
मैनेजर ने दुखी होकर सिर हिलाया।
“मुझे अफसोस है मिहिर। तुम हमारे अच्छे कर्मचारियों में से हो। लेकिन फैसला ऊपर से हुआ है।”
मिहिर ने कुछ नहीं कहा।
वह फाइल लेकर बाहर आ गया।
अपनी सीट पर बैठकर वह काफी देर तक कंप्यूटर स्क्रीन को देखता रहा।
स्क्रीन पर वही काम खुला था जिसे वह पिछले कई सालों से करता आया था।
लेकिन आज पहली बार उसे लगा कि उसके पैरों के नीचे की जमीन खिसक गई है।
उसका सहकर्मी उसके पास आया।
“मिहिर, क्या हुआ?”
मिहिर ने हल्की मुस्कान के साथ कहा—
“कुछ नहीं।”
वह सहकर्मी चला गया।
मिहिर ने गहरी साँस ली।
फिर वही झूठ।
“कुछ नहीं।”
कितनी आसानी से वह यह शब्द बोल देता था।
जबकि अंदर बहुत कुछ टूट रहा था।
शाम को वह घर पहुँचा।
निशा ने दरवाजा खोला।
“आ गए?”
मिहिर ने बस सिर हिलाया।
“आज इतने चुप क्यों हो?”
“थक गया हूँ।”
निशा ने उसे ध्यान से देखा।
उसे महसूस हो गया कि बात सिर्फ थकान की नहीं थी।
“मिहिर, क्या हुआ?”
“कुछ नहीं।”
निशा ने तुरंत कहा—
“मेरे सामने ‘कुछ नहीं’ मत बोलो।”
मिहिर कुछ पल चुप रहा।
फिर उसने धीरे से कहा—
“मेरी नौकरी चली गई है।”
निशा के हाथ से पानी का गिलास लगभग गिर गया।
“क्या?”
“एक महीने बाद मैं कंपनी में नहीं रहूँगा।”
कमरे में खामोशी छा गई।
मिहिर ने सोचा था कि निशा घबरा जाएगी।
शायद वह सवाल करेगी—
“अब क्या होगा?”
लेकिन निशा उसके पास आई और उसका हाथ पकड़ लिया।
“हम संभाल लेंगे।”
मिहिर ने उसकी तरफ देखा।
“कैसे?”
निशा ने कहा—
“जैसे अब तक संभाला है।”
मिहिर की आँखें भर आईं।
लेकिन इस बार उसके आँसू कमजोरी नहीं थे।
वे उस भरोसे के आँसू थे जो उसे अपनी पत्नी से मिला था।
रात को मिहिर अपने पिता के कमरे में गया।
पिता बिस्तर पर बैठे थे।
मिहिर ने कहा—
“पापा, मुझे आपसे कुछ कहना है।”
पिता ने अखबार नीचे रख दिया।
“बोल।”
मिहिर ने पूरी बात बता दी।
कुछ क्षण तक पिता चुप रहे।
फिर बोले—
“डर मत।”
मिहिर ने आश्चर्य से उनकी तरफ देखा।
पिता ने कहा—
“नौकरी गई है, बेटा। जिंदगी नहीं।”
मिहिर की आँखों से आँसू निकल पड़े।
पिता ने पहली बार उसके सिर पर हाथ रखा।
“तूने इतने साल इस घर के लिए बहुत कुछ किया है। अब जरूरत पड़ी तो हम भी तेरे साथ खड़े होंगे।”
मिहिर कुछ बोल नहीं पाया।
उसने पिता के हाथ को पकड़ लिया।
उसे लगा जैसे बरसों से उसके अंदर जो खालीपन था, उसमें पहली बार किसी ने अपना हाथ रख दिया हो।
अगले दिन मिहिर ने नई नौकरी की तलाश शुरू कर दी।
उसने अपना रिज्यूमे भेजा।
पुराने दोस्तों को फोन किया।
कई कंपनियों में आवेदन किया।
लेकिन हर जगह से या तो जवाब नहीं आया या फिर—
“हम आपको बाद में बताएँगे।”
एक सप्ताह बीत गया।
फिर दूसरा।
कोई अच्छी खबर नहीं आई।
मिहिर धीरे-धीरे परेशान होने लगा।
एक दिन वह बालकनी में बैठा था।
उसके हाथ में बैंक का स्टेटमेंट था।
बचत कम हो रही थी।
खर्च वही थे।
उसने आँखें बंद कर लीं।
उसे लगा—
“शायद मैं सचमुच असफल हो गया हूँ।”
तभी पीछे से उसकी छोटी बेटी की आवाज आई—
“पापा?”
मिहिर ने मुड़कर देखा।
बेटी हाथ में एक छोटी-सी ड्राइंग लेकर खड़ी थी।
“ये आपके लिए।”
मिहिर ने ड्राइंग ली।
उसमें चार लोग बने थे—
मम्मी, पापा और दोनों बच्चे।
ऊपर बड़े-बड़े अक्षरों में लिखा था—
“मेरी दुनिया।”
मिहिर की आँखें भर आईं।
बेटी ने पूछा—
“पापा, आप रो रहे हो?”
मिहिर मुस्कुराया।
“नहीं बेटा।”
“झूठ!”
मिहिर हँस पड़ा।
उसने बेटी को गले लगा लिया।
उस पल उसे समझ आया—
वह जिस चीज़ को अपनी जिंदगी समझ रहा था, वह उसकी नौकरी नहीं थी।
उसकी असली जिंदगी उसका परिवार था।
एक महीने बाद उसकी नौकरी पूरी तरह खत्म हो गई।
पहले दिन वह सुबह उठा तो ऑफिस जाने की कोई जल्दी नहीं थी।
अजीब खालीपन था।
लेकिन इस बार वह टूटना नहीं चाहता था।
उसने चाय बनाई।
नाश्ता किया।
और अपनी डायरी खोली।
पहली बार उसने लिखा—
“मैं बेरोजगार हूँ, लेकिन बेकार नहीं।”
फिर उसने नीचे लिखा—
“मैं गिरा हूँ, खत्म नहीं हुआ।”
उस दिन से मिहिर ने अपनी जिंदगी को नए तरीके से देखना शुरू किया।
उसने सोचा—
क्यों न वह वही काम अपने दम पर शुरू करे जिसे वह वर्षों से दूसरों के लिए करता आया था?
उसने एक छोटा-सा काम शुरू करने का फैसला किया।
शुरुआत छोटी थी।
कमाई कम थी।
लेकिन उसमें एक चीज़ बहुत बड़ी थी—
अपने फैसले खुद लेने की आजादी।
निशा ने उसका साथ दिया।
पिता ने उसे आशीर्वाद दिया।
विवेक ने भी कहा—
“भाई, इस बार मैं आपके साथ हूँ।”
मिहिर ने अपने भाई की तरफ देखा।
उसे याद आया—
कुछ समय पहले वह हर किसी का सहारा था।
आज पहली बार लोग उसका सहारा बन रहे थे।
रात को मिहिर छत पर खड़ा था।
निशा उसके पास आई।
“क्या सोच रहे हो?”
मिहिर ने आसमान की तरफ देखा।
“सोच रहा हूँ… अगर मेरी नौकरी नहीं जाती तो शायद मुझे कभी पता ही नहीं चलता कि मेरे अपने लोग मेरे साथ कितने खड़े हैं।”
निशा मुस्कुराई।
“कभी-कभी जिंदगी हमसे कुछ छीनती है…”
मिहिर ने उसकी बात पूरी की—
“ताकि हमें कुछ ज्यादा की कीमत समझ आ सके।”
दोनों मुस्कुरा दिए।
मिहिर ने आसमान की ओर देखा।
आज उसके पास बड़ी नौकरी नहीं थी।
बैंक में पहले जितने पैसे नहीं थे।
भविष्य अभी भी अनिश्चित था।
लेकिन उसके पास कुछ ऐसा था जो पहले शायद उसके पास नहीं था—
अपने परिवार का साथ।
और उसने मन ही मन कहा—
“अब चाहे जिंदगी कितनी भी मुश्किल क्यों न हो… मैं अकेला नहीं हूँ।”
लेकिन उसे अभी यह नहीं पता था कि उसकी जिंदगी का सबसे बड़ा फैसला अभी बाकी था।
एक ऐसा फैसला…
जो उसके परिवार को हमेशा के लिए बदलने वाला था।