शाम का समय था। संयोगिता अपने केबिन में बैठी काम कर रही थी। सामने लैपटॉप खुला था, लेकिन उसका ध्यान बार-बार फोन में लगी एक तस्वीर पर जा रहा था। तस्वीर में विवान मुस्कुरा रहा था। संयोगिता के चेहरे पर अनजाने में हल्की मुस्कान आ गई। तभी उसका फोन बजा। स्क्रीन पर “पापा” लिखा था।
संयोगिता बोली -
हैलो, पापा?
दूसरी तरफ उसके पिता की आवाज़ आई—
बेटा, आज जल्दी घर आ सकती हो?
संयोगिता ने तुरंत पूछा—
सब ठीक है ना?
पापा बोले -
हाँ बेटा, सब ठीक है। बस… तुम आ जाओ, तुमसे कुछ जरूरी बात करनी है।
संयोगिता कुछ पल चुप रही।
संयोगिता बोली -
ठीक है पापा, मैं आती हूँ।
कुछ देर बाद संयोगिता अपने घर पहुँची। जैसे ही उसने दरवाज़ा खोला, उसे घर में कुछ अलग-सा माहौल महसूस हुआ। माँ और पापा दोनों बैठक में बैठे थे। और उनके साथ दो रिश्तेदार भी मौजूद थे। संयोगिता ने सबको नमस्ते की।
संयोगिता बोली -
क्या हुआ? इतनी जरूरी बात क्या थी?
उसकी माँ ने मुस्कुराते हुए उसे अपने पास बैठाया।
माँ बोली -
बेटा… तुम्हारे लिए रिश्ता आया है।
संयोगिता एकदम शांत हो गई।
संयोगिता बोली -
रिश्ता?
पिता ने सिर हिलाया।
पापा बोले -
हाँ बेटा। लड़का अच्छा है। पढ़ा-लिखा है, अपना कारोबार है और परिवार भी बहुत अच्छा है।
संयोगिता कुछ नहीं बोली। उसकी नजर अचानक फोन पर पड़ी। वही तस्वीर…विवान। उसके चेहरे की मुस्कान गायब हो गई।
माँ उत्साह से बोलीं—
हमने अभी हाँ नहीं की है। पहले तुमसे पूछना जरूरी समझा।
पिता ने प्यार से कहा—
तुम्हारी जिंदगी है बेटा। फैसला भी तुम्हारा ही होगा।
संयोगिता ने अपने माता-पिता को देखा। ये वही लोग थे जिन्होंने उसे बचपन से हर मुश्किल में सहना सिखाया था।
वे आज भी उसे दुनिया की सबसे सीधी और भोली लड़की समझते थे। उन्हें उसके अंधेरे राज़ का जरा भी अंदाजा नहीं था।
माँ बोलीं -
क्या हुआ? चुप क्यों हो?
संयोगिता ने धीमे से कहा—
मुझे… थोड़ा समय चाहिए।
माँ ने उसके सिर पर हाथ रखा।
माँ बोलीं -
जितना समय चाहिए ले लो।
संयोगिता उठकर अपने कमरे में चली गई। दरवाज़ा बंद करके उसने फोन फिर से खोला। विवान की तस्वीर सामने थी।
उसने तस्वीर को देखते हुए धीरे से कहा—
मैं तुम्हें छोड़कर कैसे चली जाऊँ, विवान?
फिर उसकी आँखों के सामने संपूर्णा का आखिरी चेहरा आ गया।
संपूर्णा की आवाज -
मेरे पति और मेरे बच्चे का ख्याल रखना…
संयोगिता ने आँखें बंद कर लीं। उसे पहली बार महसूस हुआ—
उसके सामने सिर्फ एक रिश्ता नहीं था। उसके सामने उसकी पूरी जिंदगी का सवाल खड़ा था।
रात का समय था। चौहान हवेली में आज किसी के चेहरे पर मुस्कान नहीं थी।विवान तेज़ बुखार में तप रहा था। उसकी आँखें बंद थीं और वह बेहद कमजोर हो चुका था। विराट उसके पास बैठा उसका हाथ पकड़े हुए था।
विराट बोला -
विवान… बेटा, आँखें खोलो।
लेकिन विवान ने कोई जवाब नहीं दिया। विराट की आवाज़ काँपने लगी।
विराट बोला -
बेटा… पापा यहीं हैं।
वो उसके माथे पर ठंडी पट्टी रख रहा था, लेकिन उसकी अपनी आँखों से आँसू निकल रहे थे। गंगा जी भी परेशान खड़ी थीं।
गंगा जी बोलीं -
डॉक्टर ने कहा है दवा असर करेगी… फिर भी बच्चे की हालत देखकर डर लग रहा है।
विराट कुछ नहीं बोला। वो बस अपने बेटे को देखता रहा। उसी समय संयोगिता को फोन आया। उसने फोन उठाया।
दूसरी तरफ से विराट की घबराई हुई आवाज़ थी—
संयोगिता…
आवाज़ सुनते ही संयोगिता समझ गई कि कुछ बहुत गलत है।
संयोगिता बोली -
क्या हुआ?
विराट कुछ पल बोल ही नहीं पाया।
फिर धीमे से बोला—
विवान बहुत बीमार है।
संयोगिता का चेहरा उतर गया।
संयोगिता बोली -
क्या हुआ उसे?
विराट बोला -
बुखार बहुत तेज़ है… आँखें भी नहीं खोल रहा।
संयोगिता एक पल के लिए बिल्कुल शांत हो गई।
फिर उसने तुरंत कहा—
मैं अभी आ रही हूँ।
कुछ देर बाद हवेली का दरवाज़ा खुला। संयोगिता तेजी से अंदर आई। उसकी नजर सीधे विवान पर गई। वो बिना कुछ पूछे उसके पास पहुँची।
संयोगिता बोली -
विवान…
उसने उसका माथा छुआ। विवान तप रहा था। संयोगिता की आँखें भर आईं।
संयोगिता बोली -
इतना तेज़ बुखार…
विराट ने उसकी तरफ देखा। उसकी आँखों में बेबसी थी।
विराट बोला -
मैं बहुत डर गया हूँ।
संयोगिता ने उसका हाथ पकड़ लिया।
संयोगिता बोली -
डरिए मत। वो ठीक होगा।
संयोगिता ने धीरे से विवान का हाथ अपने हाथों में लिया।
संयोगिता बोली -
विवान… बेटा, मम्मा आई हैं।
कुछ सेकंड तक कोई प्रतिक्रिया नहीं हुई। फिर विवान की उंगलियाँ हल्की-सी हिलीं। संयोगिता की साँस जैसे वापस आई।
संयोगिता बोली -
विवान?
विवान ने बहुत मुश्किल से अपनी आँखें थोड़ी-सी खोलीं।उसकी नजर धुंधली थी।
लेकिन जैसे ही उसने संयोगिता की आवाज़ पहचानी—
म… मम्मा…
संयोगिता की आँखों से आँसू निकल पड़े।उसने तुरंत उसे अपनी बाँहों में भर लिया।
संयोगिता बोली -
हाँ बेटा… मम्मा यहीं है।
विवान ने कमजोर हाथ से उसका दुपट्टा पकड़ लिया।
विवान बोला -
आप… जाओ मत…
संयोगिता ने उसे और कसकर पकड़ लिया।
संयोगिता बोली -
कहीं नहीं जाऊँगी।
विराट सामने खड़ा ये सब देख रहा था। विवान कई घंटों से किसी को ठीक से पहचान भी नहीं रहा था। लेकिन संयोगिता के आते ही उसने आँखें खोल दी थीं। विराट की आँखें नम हो गईं। उसने पहली बार महसूस किया संपूर्णा के जाने के बाद शायद विवान ने किसी को इतनी गहराई से अपने दिल में जगह दे दी थी। और वो थी—संयोगिता। संयोगिता ने विवान के माथे पर हाथ रखा।
संयोगिता बोली -
आप बस आराम करो, राजा बाबू। मम्मा आपके पास है।
विवान ने आँखें बंद कर लीं। इस बार उसके चेहरे पर हल्की शांति थी। और विराट चुपचाप खड़ा होकर उन दोनों को देखता रहा।