Her Silent Secret - 23 in Hindi Love Stories by Sonam Brijwasi books and stories PDF | Her Silent Secret - 23

Featured Books
Categories
Share

Her Silent Secret - 23

विराट ने कांपते हुए हाथों से संयोगिता के पैर पकड़ लिए। उसकी आँखों से आंसू बह रहे थे, जो नशे और दर्द का मिश्रण थे।

विराट (गिड़गिड़ाते हुए) - 
प्लीज... मत जाओ संपूर्णा... मैं मर जाऊंगा तुम्हारे बिना। मुझे छोड़कर मत जाओ...

संयोगिता स्तब्ध थी। वह विराट को धक्का देना चाहती थी, चीखना चाहती थी, लेकिन विराट की उस टूटी हुई आवाज़ ने उसके सभी हथियार छीन लिए थे। उसे समझ नहीं आ रहा था कि वह क्या करे। उसका एक हिस्सा, जो सालों से अकेलापन झेल रहा था, विराट की इस बेबसी पर पिघल रहा था। और दूसरा हिस्सा, जो 'संयोगिता' बनने की कोशिश कर रहा था, डर से कांप रहा था।

लेकिन तभी, विराट ने ताकत जुटाई और उठकर खड़ा हो गया। नशा अभी भी उसके सिर में था, लेकिन उसका प्रेम उससे भी ज्यादा शक्तिशाली था। उसने संयोगिता को अपनी बांहों में भर लिया।

इस बार संयोगिता ने विरोध नहीं किया। उसका दिमाग ब्लैंक हो गया। तर्क, डर, अतीत... सब कुछ धुंधला पड़ गया। बस विराट की गर्माहट और उसकी साँसों की आवाज़ बाकी रह गई।

धीरे-धीरे, कमरे की रोशनी फीकी पड़ने लगी। दोनों बिस्तर पर थे। संयोगिता की आँखों से सिसकियां निकल रही थीं—दर्द की नहीं, बल्कि एक ऐसे भ्रम की, जिसमें वह खुद को खो रही थी।

कैमरा ब्लैंक हुआ।

***

अगली सुबह।

सूरज की किरणें पर्दे की दरारों से कमरे में झांक रही थीं।संयोगिता की आँखें खुलीं। सबसे पहले उसे अपने शरीर में एक अजीब सा दर्द महसूस हुआ। हर जोड़ दुख रहा था, जैसे किसी भारी बोझ के नीचे कुचली गई हो।

उसने घबराकर इधर-उधर देखा। वह उसी ऑफिस के प्राइवेट रूम में थी—विराट के पर्सनल रूम में। उसने तुरंत खुद को चादर से ढक लिया। उसका दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़कने लगा। उसे याद आने लगा कि रात क्या हुआ था... या शायद, उसे याद *नहीं* आ रहा था। बस टुकड़े-टुकड़े में यादें थीं—विराट का चेहरा, उसकी पुकार, और फिर... अंधेरा।

तभी उसकी नजर अपने पास लेटी हुई आकृति पर पड़ी।विराट वहीं था। वह गहरी नींद में सो रहा था। चादर उसके और संयोगिता के बीच लिपटी हुई थी। विराट का एक हाथ संयोगिता की कमर पर था, और वह उससे सटकर सोया हुआ था। उसका चेहरा अब शांत था, वही उदासी गायब थी जो रात को थी।

संयोगिता की साँसें थम सी गईं। उसने धीरे से विराट का हाथ हटाने की कोशिश की, लेकिन विराट नींद में ही बुदबुदाया और उसे और कसकर अपनी ओर खींच लिया।

विराट (नींद में) - 
संपूर्णा...

यह नाम सुनते ही संयोगिता के रोंगटे खड़े हो गए।

उसने खुद से पूछा—
मैंने यह क्या किया?

क्या वह सिर्फ एक भ्रम का शिकार हुई थी? या फिर उसने जानबूझकर इस रिश्ते को आगे बढ़ने दिया था क्योंकि वह भी अकेली थी?

तभी, कमरे के बाहर दरवाजे की हैंडल घूमने की आवाज़ आई।
संयोगिता का खून जम गया। कोई अंदर आने वाला था। और अगर किसी ने उन्हें इस हालत में देख लिया, तो न सिर्फ विराट की इज्जत, बल्कि संयोगिता की पूरी जिंदगी तबाह हो जाएगी। विशेषकर जब दुनिया को पता चलेगा कि चौहान कंपनी की CEO और उसके मालिक एक रात एक साथ बिता चुके हैं।

बाहर से विराट की असिस्टेंट, रिया की आवाज़ आई—
सर... मे आई कम इन?

संयोगिता का दिल हलक में आ गया। उसने तुरंत अपनी साँसें रोकीं और चादर को अपने कंधों तक खींच लिया। उसकी आवाज़ में घबराहट थी, लेकिन उसने उसे छिपाने की पूरी कोशिश की।

संयोगिता (अंदर से, धीमी लेकिन सख्त आवाज़ में) - 
बाद में आना। सर की तबीयत खराब है। अभी डिस्टर्ब मत करो।

बाहर कुछ पल की खामोशी रही, फिर रिया की आवाज़ आई—
ठीक है मैम।

कदमों की आवाज़ दूर होती गई। संयोगिता ने राहत की साँस ली और माथे पर हाथ रख लिया।

संयोगिता (फुसफुसाते हुए) - 
बच गई...

लेकिन यह राहत क्षणिक थी। विराट, जो नींद में था, उसकी आवाज़ सुनकर और करीब सरक आया। उसने संयोगिता को और कसकर अपनी बांहों में जकड़ लिया, जैसे उसे डर हो कि वह फिर से चली जाएगी।

संयोगिता के शरीर में दर्द की एक लहर दौड़ गई। उसका पूरा बदन टूट रहा था। कल रात जो हुआ था, वह उसके लिए पहली बार था। उसके अतीत में हिंसा थी, खून था, मौत थी... लेकिन प्रेम या स्पर्श का कोई अनुभव नहीं था। यह दर्द नया था, अजनबी था, और साथ ही... भयानक रूप से वास्तविक भी।

उसने नज़रें झुकाकर बेडशीट पर देखा। चादर पर एक हल्का सा खून का निशान था। उसे देखते ही संयोगिता की आँखों में एक कड़वाहट उतर आई। उसके होंठों पर एक व्यंग्यात्मक, दर्द भरी मुस्कान तैर गई।

संयोगिता (मन में, खुद से) - 
जो दूसरों का खून बहाती है... आज उसी का खून किसी ने बहा दिया। क्या ज़माना आ गया है...

यह सोचकर वह खुद पर ही हंसना चाहती थी, लेकिन हंसी गले में अटक गई। वह 'साइको किलर' जो कभी भावनाओं से परे थी, आज इस बिस्तर पर, इस खून के निशान के सामने, बिल्कुल नग्न और असहाय महसूस कर रही थी।

तभी विराट ने नींद में ही उसे और पास खींचा और उसके बालों में चेहरा छिपाते हुए फुसफुसाया—

विराट (नींद में, प्रेम से) - 
संपूर्णा... आई लव यू सो मच...

ये शब्द सुनते ही संयोगिता के शरीर में जैसे बिजली दौड़ गई। लेकिन यह बिजली सुख की नहीं, बल्कि एक तीखे सत्य की थी।

संयोगिता (धीमे स्वर में, खुद से) - 
कल रात से यही शब्द सुन रही हूँ...

उसकी आँखों में नमी आ गई। विराट उसे प्यार कर रहा था, लेकिन वह प्यार संयोगिता के लिए नहीं था। वह प्यार एक भ्रम के लिए था, एक याद के लिए था। और संयोगिता... वह सिर्फ उस याद का एक जीवित साया बनकर रह गई थी।

उसने चादर को मज़बूती से पकड़ा, जैसे वह उसकी आखिरी ढाल हो। फिर उसने धीरे से विराट के कंधे को हिलाया।

संयोगिता (धीमी आवाज़ में) - 
मिस्टर विराट... उठिए। सुबह हो गई है।

विराट ने पहले तो कोई प्रतिक्रिया नहीं दी, लेकिन जब संयोगिता ने दोबारा हिलाया, तो उसकी पलकें फड़फड़ाईं। उसने भारी पलकों से संयोगिता को देखा। नशा अब उतर चुका था, लेकिन नींद का खुमार अभी भी था।

विराट (नींद भरी आवाज़ में) - 
संपूर्णा...?

संयोगिता ने अपनी नज़रें उसकी आँखों में गाड़ दीं। उसकी आँखों में अब कोई भ्रम नहीं था, सिर्फ एक गहरा, अनकहा दर्द था।

संयोगिता (स्पष्ट स्वर में) - 
मैं संयोगिता हूँ, मिस्टर विराट। और आपको अब उठना होगा... इससे पहले कि कोई और इस दरवाज़े को खटखटाए।

विराट की आँखों में एक पल के लिए समझ नहीं आई। फिर, जैसे-जैसे वास्तविकता उस पर हावी हुई, उसका चेहरा पीला पड़ने लगा। उसने महसूस किया कि वह किसके साथ है, और कैसे है। उसने तुरंत संयोगिता से दूरी बनाने की कोशिश की, लेकिन चादर और उनके बीच की उलझन ने उसे रोक दिया।

विराट (घबराहट और अपराधबोध से) - 
संयोगिता... मैं... यह क्या...?

संयोगिता ने उसकी बात पूरी होने से पहले ही चादर को समेटा और खुद को ढकते हुए बिस्तर से नीचे उतर गई। उसका शरीर दर्द से कराह रहा था, लेकिन उसके चेहरे पर अब कोई भाव नहीं था। वह फिर से वही 'CEO' बन चुकी थी, जिसने अपनी भावनाओं को एक लोहे के संदूक में बंद कर दिया था।

संयोगिता (पीठ दिखाते हुए, शांत स्वर में) - 
कुछ मत कहिए। बस... कपड़े पहनिए। हमें इस कमरे से बाहर निकलना है, इससे पहले कि दुनिया हमें देख ले।

विराट स्तब्ध बैठा रहा, चादर में लिपटा हुआ, अपनी पत्नी की याद और अपनी गलती के बोझ तले दबा हुआ। और संयोगिता... वह बाथरूम की तरफ बढ़ी, लेकिन उसके कदमों में एक अजीब सी लंगड़ाहट थी। वह लंगड़ाहट शरीर की थी, लेकिन उसका दर्द रूह का था।

आज की सुबह ने दोनों की जिंदगी हमेशा के लिए बदल दी थी। लेकिन सबसे बड़ा सवाल अभी भी बाकी था क्या विराट अब संयोगिता को 'संयोगिता' के रूप में देख पाएगा? या वह हमेशा के लिए संपूर्णा का भ्रम बनकर रह जाएगी?