true happiness in Hindi Motivational Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | सच्ची खुशी

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सच्ची खुशी



 बाल कहानी - मोहमाया

मीना नाम की एक दस साल की प्यारी सी बच्ची थी। वो बहुत समझदार थी, पर एक बात से बहुत उदास रहती थी।

उसके घर में उसका जन्मदिन कभी नहीं मनाया जाता था। उसके मम्मी-पापा काम में बहुत व्यस्त रहते थे।

एक दिन मीना अपने घर के छोटे से मंदिर में बैठकर भगवान जी से प्रार्थना करने लगी - "हे भगवान जी, मेरे मम्मी-पापा मेरा बर्थडे नहीं मनाते हैं। मैं भी अपना जन्मदिन मनाना चाहती हूँ। आप कुछ ऐसा करो जिससे मेरा जन्मदिन सबसे खास, सबसे बड़ा हो जाए।"

मीना की सच्ची प्रार्थना सुनकर तभी वहाँ एक रोशनी हुई और एक सुंदर परी प्रकट हो गई।

परी ने मीना से मुस्कुरा कर कहा - "मीना, तुम्हें क्या चाहिए? बोलो, मैं तुम्हें सब दूँगी।"

मीना का बाल-मन खुश हो गया। उसने झट से कहा - "मुझे नए कपड़े चाहिए, नए जूते चाहिए, नया स्कूल बैग चाहिए, बहुत सारी चॉकलेट, समोसे, केक, गुब्बारे और ढेर सारे खिलौने...।"

परी ने अपनी जादुई छड़ी घुमाई। छन से एक सेकंड में मीना के सामने सब कुछ आ गया। कमरा भर गया। नए कपड़े, चमकते जूते, रंग-बिरंगा बैग, चॉकलेट का पहाड़।

मीना बहुत खुश हुई। एक घंटे तक वो सब चीज़ों को छू-छू कर देखती रही। कभी आइने में नए कपड़े पहन कर खुद को देखती, कभी चॉकलेट खाती, कभी नए बैग से खेलती।

पर एक घंटे बाद ही मीना बोर हो गई।

वो उदास होकर परी से बोली - "परी दीदी, मैं इन सबसे बोर हो गई हूँ। इन कपड़ों और खिलौनों से मेरा मन नहीं लग रहा। मुझे अपने दोस्त चाहिए, मुझे उनके साथ खेलना है।"

परी ने फिर से अपनी छड़ी घुमाई और तुरंत मीना के सारे दोस्त वहाँ आ गए। सब हँसने-खेलने लगे। घर में शोर मच गया।

मीना फिर से खुश हो गई, पर ये खुशी भी सिर्फ एक घंटे ही रही।

एक घंटे बाद मीना फिर से उदास और शांत हो गई। उसने परी से कहा - "परी दीदी, मुझे ये कुछ भी नहीं चाहिए। न कपड़े, न खिलौने, न इतना शोर। मुझे बस अपने मम्मी-पापा के पास जाना है। मुझे उनकी गोद में बैठना है।"

तब परी ने मीना के सिर पर हाथ रखा और बहुत प्यार से कहा -

"बेटा, अब तुम्हें समझ आ गया होगा। ये जो नए कपड़े, जूते, खिलौने, चॉकलेट हैं, ये सब मोहमाया हैं। ये सब भौतिक चीज़ें हैं। ये बस थोड़ी देर की खुशी देती हैं, फिर हम इनसे भी बोर हो जाते हैं।

असली खुशी तो हमारे अपनों के साथ होती है। अपनापन में ही असली खुशी है। हमारे अपनों के साथ जो पल हम बिताते हैं, चाहे वो खुशी के हों या गम के, वही असली जीवन है।

अगर जीवन में कभी दुख न हो तो सुख का एहसास कैसे होगा? अगर धूप न हो तो छाँव की जरूरत कैसे होगी? इसीलिए जो तुम्हारे पास है, उसी में खुश रहो। बिना शिकायत करे, बिना किसी लोभ के।

बाकी सब तो मोहमाया है, जो हमें भ्रम में डाल देती है। असली खुशी तो प्रकृति के साथ जीने में है, अपनों के साथ जीने में है।"

मीना को अब असली खुशी का मतलब समझ आ गया था। उसने आँखें बंद की और जब खोली तो वो अपने घर के मंदिर में ही थी। सामने उसके मम्मी-पापा खड़े थे और मुस्कुरा रहे थे।

उस दिन मीना का जन्मदिन सबसे खास था, क्योंकि इस बार केक से ज्यादा, अपनों का प्यार बड़ा था।

डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली