birthday celebration why in Hindi Comedy stories by Vandna Sharma books and stories PDF | जन्मदिन क्यों मनाऊं

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जन्मदिन क्यों मनाऊं



आज से पांच दिन बाद 15 सितम्बर को मेरा जन्मदिन है। मुझे कोई खुशी ही नहीं हो रही। मुझसे ज्यादा उत्सुकता मेरे बेटे और पतिदेव को हो रही है। मुझे कुछ हो तो नहीं गया। क्या मुझे वैराग्य प्राप्त हो गया। क्या मेरे अंदर किसी योगी की आत्मा प्रवेश कर गई। इतनी नीरस कैसे हो गई मैं। न कुछ पाने की इच्छा है, न कहीं जाने का मन है, सजना-संवरना भी अब अच्छा नहीं लगता। किसी से बोलने या लड़ने को मन ही नहीं करता। क्या मुझे चिकित्सक से परामर्श करना चाहिए। मैं पूरे दिन अपनी ही दुनिया में खोए रहती हूं। मेरे विचारों की दुनिया ही मुझे भाती है। कभी फूलों को निहारती हूँ, कभी आसमान को कभी चाँद को देखती हूँ, कभी तारों से बातें करती हूँ। खुद ही हँसती रहती हूँ। मुझे क्या हो गया मेरे प्रभु। मैं तो बहुत शरारती थी। बातूनी थी। मेरे भाई-बहन तो इस बात पर शर्त लगाते थे कि मैं एक मिनट शांत नहीं बैठ सकती। मेरी बातें कैसे खत्म हो गई, अब शब्द नहीं है बोलने को या कोई विचार घटना प्रेरित ही नहीं करती कुछ कहने को अब तो कोई लड़ता है ताने मारता है तो उस पर तरस ही आता है कि कितना दुखी, पीड़ित व्यक्ति है अपने दुःख से ऐसा बोल रहा होगा। गुस्से में और दुःख में आपा खो जाता है। कुछ तो गड़बड़ है, कैसे पता लगाऊँ।

न किसी त्योहार की प्रतीक्षा, न किसी उपहार की खुशी, कैसे जन्मदिन मनाऊं। कोई तो बताए मैं कैसे जन्मदिन मनाऊं। मुझे लगता है थोड़ी ना समझी भी होनी चाहिए, थोड़ा बचपना, थोड़ा पागलपन भी होना चाहिए जिंदगी में। तभी जिंदगी में रस आता है। कभी रूठना, कभी मनाना, कभी लड़ना, कभी झगड़ना यही तो जिंदगी है।

अब भला अपनी जिंदगी का एक वर्ष कम हो गया, जिंदगी रेत की तरह फिसलती जा रही है। बुढ़ापा दस्तक दे रहा है। जवानी जाते हुए मुंह चिढ़ा रही है। रोज नई बीमारी मिलने आ जाती है। उम्र चालीस की बड़ा गजब ढाती है। किसी ने गलत ही कहा है अज्ञानता दुःखों का कारण है। नहीं भाई असली सुख अज्ञानता में ही है। जब हम बच्चे होते हैं तो बिना किसी की परवाह किए खुशी में उछलते हैं, दुःख में रोते हैं, गुस्से में चिल्लाते हैं। बड़े होने की इतनी बड़ी सजा क्यूं मिलती है ना खुशी का इजहार कर सकते हैं। ना दुःख में आंसू बहा सकते हैं। बड़ों का ये शोभा नहीं देता। काश हम रोक पाते उम्र को बढ़ने से, बुढ़ापे को आने से। काश हर जन्मदिन पर उम्र थोड़ा कम होती। और हम एक दिन कम होते होते गायब हो जाते।

लेकिन उम्र बढ़ने पर भी तो ऐसा ही होता है। एक-एक दिन बढ़ते-बढ़ते दुनिया से ही गायब हो जाते हैं, जब जिंदा है तभी कोई नहीं पूछता आजकल तो, मरने के बाद कोई याद क्यों करेगा। सोचना ही बेईमानी है।

मेरे प्रिय पाठकगण कृपया बताएं, हमें जन्मदिन क्यों मनाना चाहिए। किस बात का जश्न मनाऊं, एक दिन जिंदगी का कम होने पर, या जिंदगी ने जो अब तक सबक सिखाए उनका जश्न मनाऊं।

अपने सुझाव व प्रतिक्रिया से अवगत जरूर कराएं। आपके जवाब की प्रतीक्षा में।
लेखिका डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली