Ghungroos - 6 in Hindi Horror Stories by Shree Kriti books and stories PDF | घुँघरू - 6

Featured Books
Categories
Share

घुँघरू - 6

शर्लिन स्वप्निल की दी हुई डायरी रख कर भूल ग‌ई थी। उसे उस डायरी की याद तब आई जब उसके पापा ने उस पीतल के पन्ने को लौटाते हुए बताया था कि वह पन्ना कम से कम चार - पांच सौ साल पुराना है। शर्लिन को स्वप्निल की बताई हु‌ई बातें याद आ गईं, उसने उन बातों को महज़ एक वहम माना था मगर अब उसे लग रहा था कि उन बातों का कुछ तो मानी है। आधी रात बीत गयी थी, घर में सब सो चुके थे .... एक जामिद सन्नाटा पसरा हुआ था। शर्लिन बेड पे लेटी मानों अंगारों पर लोट रही थी, ये सपने आते कहाँ से हैं?अचानक वो उठी और वो डायरी अलमारी से निकाल कर अपने बेड पर आलथी - पालथी मार के बैठ ग‌ई। देखें इस डायरी में क्या लिखा है ! डायरी के मुताबिक़ यह किताब सिंहल राजवंश के राजगुरु आचार्य सदाशिव के बेटे चैतन्य ने लिखी थी । तो आपलोग कुछ देर विगत में घटी हुई इस घटना को आचार्य चैतन्य के श्रीमुख से सुनेंगे........ 

................ महराज अनन्त देव रॉय राज्य के मात्र नाम के राजा थे, राजवंश में जन्मे इसलिए राजा बने। अन्यथा राजकाज में वह कोई विशेष दिलचस्पी नहीं रखते थे और इसका कारण थीं राजमाता इंद्रावती देवी। इंद्रावती देवी एक चतुर, महत्वाकांक्षी और पाषाणी स्त्री थीं। राजनीति में पारंगत होने के कारण राज्य के शासन पर उनका ही वर्चस्व था।  किवदंतियों के अनुसार उन्होंने स्वयं ही अपने पुत्र को राजकाज से दूर रखा ताकि सत्ता पर उनका प्रभाव कम न हो, मैंने स्वयं देखा था कि वह महराज अनन्त देव को किस तरह कठपुतली की भांति नचातीं थीं। लोगों का कहना तो ये भी था कि उन्होंने ही भूतपूर्व महराज सुर्य देव रॉय को शराब और अफीम की लत लगवाई थी ताकि वो विलासिता में डूब जायें और सत्ता उनके हाथों में आ जाये। यह शराब और अफीम की लत ही महराज सुर्य देव रॉय असमय मृत्यु का कारण बनीं। नहीं ! उन्होंने अपने पुत्र के साथ ऐसी बर्बरता नहीं की क्योंकि उन्हें ज्ञात था कि अनन्त देव को वह बड़ी ही सरलता से अपने वश में रख सकतीं थीं।  अनन्त देव को कला से प्यार था ... कविता में भी रूचि थी ... वह स्वयं एक कवि थे। संगीत और नृत्य में उनके प्राण बसते थे ... वह स्वयं एक उत्कृष्ट संगीतज्ञ थे। वह सदैव कलाकारों, संगीतकारों और कवियों से घिरे रहते थे ... रहा- सहा कसर राज नर्तकियां पूरा कर देतीं थीं। राजमाता  उनके कला प्रेम को अत्यंत प्रोत्साहित करती थीं। उनकी मंशा थी कि अनन्त देव जीवन के इस रस - रंग और अतिशय सुखभोग में इतने डूब जायें कि उन्हें शासन कार्य भार समान लगे ... ‌एक कवि हृदय को राजनीति भार ही प्रतीत होगी ना। साथ ही उनका मन कभी शासन कार्य की ओर न लगे, इसका सुदृढ़ प्रबन्ध करने के लिए पन्द्रह वर्ष में ही उनका विवाह बिज़ोलिया की राजकुमारी अजंशा बाई से कर दिया गया। इसके एक लागातार उनका दो विवाह और करवाया गया और उन रानियों के नाम थे : फूल कंवर - धनश्री। अनन्त देव रॉय की तीनों रानियां थीं तो परम सुंदरी पर एक अजंशा बाई को छोड़कर बाक़ी दो एकदम जड़ - बुद्धी थीं। राजमाता इंद्रावती देवी बड़ी ही चतुराई से उन्हें आपसी होड़ में लगाये रहतीं ... अपने स्वामी के हृदय पर अपने प्रेम एवं रूप का सिक्का जमाने की होड़ । राजमाता के ये सभी कार्य उनकी कूटनीति का ही एक हिस्सा थे, इस तरह उनका प्रभाव पहले की तरह शासन के कार्यों में बना रहता। महारानी अजंशा बाई राजमाता की यह सारी नीति - अनीति - कूटनीति समझतीं थीं पर उनके हृदय में राजमाता का ऐसा भय बैठा था कि उन्हें मौन ही अपना ढाल प्रतीत होता था। अजंशा बाई के इस मौन के कारण ही अनन्त देव पर उनका लेशमात्र भी प्रभाव नहीं था, ना  उनका और ना बाकी रानियों का ... हरतरफ प्रभाव था तो मात्र इंद्रावती देवी का। यह प्रभाव ... यह अवस्था यूँ ही बनी रहती अगर चलती हवाओं का रूख मोड़ कर एक बागी चरित्र ने इस कथा में चरण न धरे होते। एक बार की घटना है। वर्षा का अन्त हो गया था, आश्विन का महीना उतार पर था। सूर्यास्त होने में अनुमानतः थोड़ा सा ही देर था, जब महराज अनन्त देव रॉय शिकार खेल कर घने जंगल से क‌ई अश्वारोही के साथ तेजी से चले आ रहे थे । महराज के बिल्कुल समकक्ष चलता एक और सुदर्शन युवक था, जो कोई सिपाही नहीं उनका हम‌उम्र मित्र जान पड़ता था ... वह कोई और नहीं मैं था, राजगुरु आचार्य सदाशिव का पुत्र चैतन्य । इसी दौरान हमें वहाँ एक युवती मूर्छित अवस्था में दिखाई दी। युवती अद्वितीय सुन्दरी थी, गेरुआ कपड़े में लिपटी बहुत बुरी हालत में पत्थरीले जमीन पे पड़ी थी। कपड़े जगह - जगह से फट गये थे। इतने घने जंगल में इस हालत में वो खूंखार - आदमखोर जानवरों के बीच भी वो जीवित कैसे बच ग‌ई, ये भी आश्चर्य की बात थी। महराज अनन्त देव रॉय के इशारे पर दो सैनिक आगे आये और स्त्री को होश में लाने का यत्न करने लगे। अंततः स्त्री होश में आई और इतने लोगों अपने समक्ष देखकर फटे कपड़ों से ही अच्छी तरह अपना तन ढापने का प्रयास करने लगी। यह देखकर मैंने अपना दुशाला स्त्री की ओर बढ़ा दिया और मुंह दूसरी ओर फेर लिया। कुछ देर बाद हमें स्त्री की कांपती सी आवाज सुनाई दी, 

" धन्यवाद श्रीमन्त ! कृपया एक और कृपा आप लोग मुझ पर कर दिजिए। "

अनन्त देव ने राजपुत्र - स्वभावसिद्ध आधिपत्य के भाव के साथ पूछा, 
" कहो भद्रे ! तुम मुझसे कैसी सहायता चाहती हो ? 

" श्रीमन्त ! आपने मेरे प्राणों की रक्षा की है, अब मुझे किसी गाँव या नगर में आश्रय दिलवा देें तो बड़ी कृपा होगी। "

" परन्तु तुम किस गाँव या नगर से आई हो, मुझसे कहो तो मैं तुम्हें वहीं पहुँचाने का व्यवस्था करवा दुंगा। "

मैंने देखा युवती भय से दहल उठी, भयभीत स्वर में गुहार लगाई, 
" नहीं ... नहीं श्रीमन्त, अगर मैं वहाँ ग‌ई तो इस बार मेरे प्राणों की रक्षा न हो पायेगी। उनके कारण ही तो मैंने यह दुर्गति पाई है, जंगल में भटकने पर विवश हो गई हूँ। "

हम दोनों ही युवती के कथन से हतप्रभ हो उठे, मेरे मुख से स्वतः प्रश्न निकला, 
" परन्तु कैसे? "

युवती ने संकोच वश ओठ सिकोड़ लिए, ऐसा लग रहा था वो किसी गहन दुविधा में डूब ग‌ई है। अंततोगत्वा उसने अत्यंत मंद स्वर में उत्तर दिया, 
" मैं एक अनाथ ब्राह्मण कन्या हूँ श्रीमन्त, संसार में मेरा अब कोई सगा - सम्बन्धी नहीं। गाँव के पुरषों की कुदृष्टि से मैं बच न पाई, अनाथ जान वह मुझे भोगना चाहते थे। उनसे अपनी रक्षा हेतु ही मैंने जंगल का आश्रय लिया और अब मेरी यह दशा है। "

इतना कहकर युवती रोने लगी। महराज अनन्त देव का क्षत्रिय खुन खौल उठा, उन्होंने दृढ़ स्वर में कहा, 
" भयभीत न हो भद्रे, अब से तुम मेरी संरक्षण में हो। "

युवती ने हाथ जोड़ लिए, उसका सम्पूर्ण शरीर कांप रहा था। 
उसकी दशा देख मैं अनन्त देव के निकट आ कर, मद्धिम स्वर में बोला, 
" मित्र ! युवती की दशा ठीक नहीं, इसे शीघ्र उपचार की आवश्यकता है। "

मेरा कथन सुनकर अनन्त देव ने एक दृष्टि युवती पर डाल कर कहा, 
" उचित कह रहे हो मित्र । "

अनन्त देव ने युवती से पूछा, 
" तुम्हारा नाम क्या है? "

युवती ने त्योरी थोड़ी सी संकुचित की, बिना मुस्कान के धीमे परन्तु दृढ़ स्वर में कहा, 
" घुँघरू ।।। "

क्रमशः.......................