आधी रात का समय। बाहर बिजली चमक रही है। सिया करवटें बदल रही है, उसका चेहरा बेचैन है।)
सिया की पलकों के नीचे हरकत। उसके माथे पर पसीना। और तभी सपना शुरू होता है...)
🎥 सपना — काली रात, सुनसान जंगल, आसमान में लाल चाँद।
चारों ओर से चमगादड़ जैसी परछाइयाँ उड़ती आ रही हैं।
वो सब धीरे-धीरे इंसानी रूप लेते हैं — वैम्पायर्स का एक झुंड।
सिया और करण (उर्फ कबीर) दौड़ रहे हैं। कबीर के कंधे पर सिया — वो घायल है। जंगल के पेड़ पीछे छूट रहे हैं, चारों तरफ़ फुफकारने की आवाज़ें।
वैम्पायर लीडर (गर्जना के साथ) बोला -
“करण! उसे हमें दे दे…तू उसे कभी खत्म नहीं कर पाएगा!”
दूसरा वैम्पायर (हँसते हुए) बोला -
“वो अब भी इंसान है, और तू आधा शैतान!
उसका खून तेरे बस का नहीं!”
(कबीर की आँखें आग की तरह लाल हो उठती हैं।)
कबीर (गुस्से में, दहाड़ते हुए) बोला -
“इस लड़की का खून… सिर्फ़ मेरा है!
मैं ही इसका मालिक हूँ!
मैं ही इसका रक्षक हूँ!
और अगर किसी ने इसे छूने की कोशिश की…
तो मैं तुम्हारा वजूद मिटा दूँगा!”
(वो हवा में कूदता है — काले पंख फैलते हैं, और सिया को गोद में उठाकर आसमान में उड़ जाता है।)
पीछे से कई वैम्पायर्स भी उड़ते हैं, उनका शोर हवा को चीर देता है।
लाल बिजली आसमान में कौंधती है — और वैम्पायर्स उस पर हमला कर देते हैं।
वैम्पायर (चिल्लाकर) बोला -
“रोक लो इसे! इसे रोक लो!”
(कबीर हवा में लड़ता है, उसके पंजों से काली लपटें निकलती हैं।
वो दो वैम्पायर को एक ही वार में नीचे गिरा देता है।)
सिया (डरी हुई, काँपते हुए) बोली -
“कबीर जी!! छोड़ दो! मुझे डर लग रहा है!!”
कबीर (दहाड़ते हुए) बोला -
“डरना मत! जब तक मैं हूँ, कोई तुम्हे छू भी नहीं सकता!!”
(तभी एक वैम्पायर पीछे से आता है और कबीर के कंधे में अपने नाखून गड़ा देता है। कबीर दर्द से चिल्लाता है, सिया की पकड़ ढीली पड़ जाती है —और वो नीचे गिरने लगती है…)
( सिया की आँखें खुलीं वो बिस्तर पर झटके से उठती है, साँसें तेज़, चेहरा पसीने से भीगा हुआ।)
सिया (रोते हुए, घबराकर) बोली -
“नहीं!! उन्हें मत छूओ!! छोड़ दो हमें!!”
(वो ज़ोर से चिल्लाती है और अचानक फूट-फूटकर रोने लगती है।
उसकी आवाज़ सुनकर कबीर की नींद खुल जाती है,वो उसके पास बैठ गया।)
कबीर (धीरे, नरम आवाज़ में) बोला -
“सिया… सिया… शांत हो जाओ… मैं यहाँ हूँ…”
(वो उसके आँसू पोंछता है, सिया उसके सीने से लग जाती है।)
सिया (सिसकते हुए) बोली -
“वो सब खून… वो उड़ते राक्षस… वो कौन थे, कबीर जी?
और वो… वो आप थे ना… जिनके पंख थे…”
(कबीर पल भर के लिए चुप रहता है, उसके चेहरे पर दर्द है।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“वो बस एक सपना था, सिया… बस एक सपना…”
सिया (हिचकियों के बीच) बोली -
“पर वो इतना सच्चा क्यों लगा…जैसे मैंने वो सब कभी जी लिया हो…”
(कबीर उसकी पीठ पर हाथ फेरता है, उसे अपनी बाँहों में ले लेता है।)
कबीर (मन में, हल्की आवाज़ में) बोला -
“काश… ये सच में सपना ही होता…”
(सिया उसकी बाँहों में सो जाती है, पर कैमरा कबीर के चेहरे पर टिकता है —
उसकी आँखें अब भी हल्की लाल हैं… और होंठों पर एक बूँद खून की।)
“कभी-कभी सपने वो दिखा देते हैं…
जिस सच्चाई को हम सालों से छिपाने की कोशिश कर रहे होते हैं।
सिया ने सपना देखा…
पर असली डर तो अब जागने वाला था।”
(सुबह का समय। खिड़की से धूप अंदर आ रही है। सिया की आँखें धीरे-धीरे खुलती हैं। कमरे में सन्नाटा है। बस पास रखी घड़ी की टिक-टिक सुनाई दे रही है।)
(सिया धीरे से उठती है, चारों ओर देखती है। कबीर उसके पास नहीं है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“कबीर जी…?”
(वो बिस्तर से उतरती है, बालों को पीछे करती है और रसोई की तरफ़ जाती है। वहाँ से किसी के कपड़े बदलने की आवाज़ आती है।)
(कबीर शर्ट पहन रहा है, उसके कंधे पर गहरा लाल निशान है — नाखून के वार जैसा।)
(सिया का दिल तेज़ी से धड़कने लगता है।)
सिया (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली -
“ये… ये निशान… कैसे लगे?”
(कबीर पलटता है, थोड़ा चौंकता है पर फिर मुस्कराने की कोशिश करता है।)
कबीर (सामान्य स्वर में) बोला -
“ओह… बस कल रात टेबल के कोने से टकरा गया था।”
(सिया की नज़रें उसके निशान पर टिकी रहती हैं। वही निशान, जो उसने अपने सपने में देखा था।)
सिया (धीरे से) बोली -
“टेबल का कोना… या किसी के नाखून?”
(कबीर ठिठक जाता है। कुछ पल के लिए दोनों के बीच खामोशी छा जाती है।)
कबीर (थोड़ा सख़्त लहजे में) बोला -
“सिया, हर बात को सपना और सच्चाई से मत जोड़ो। तुम ज़्यादा सोचने लगी हो।”
(सिया का चेहरा उतर जाता है। वो पीछे हटती है।)
सिया (धीरे, डरे हुए स्वर में) बोली -
“पर वो सपना इतना सच्चा था…आपके पंख थे…
आपका कहा था कि मेरा खून बस आपका है…”
(कबीर की आँखें एक पल के लिए चमक उठती हैं। फिर वो नज़रें झुका लेता है।)
कबीर (गहरी साँस लेकर) बोला -
“सपने… कभी-कभी हमारी सोच का खेल होते हैं।
और कुछ बातें… सच में जानना तुम्हारे लिए अच्छा नहीं, सिया।”
(सिया अब और सह नहीं पाती।)
सिया (काँपती आवाज़ में) बोली -
“तो सच में कुछ है, है ना?
आप मुझसे कुछ छिपा रहे हो, कबीर!”
(कबीर उसकी ओर बढ़ता है, उसकी बाहों को पकड़ता है।)
कबीर (तेज़ स्वर में) बोला -
“बस, सिया! मैंने कहा था ना — कुछ बातें अधूरी ही रहने दो!”
(सिया की आँखों में आँसू आ जाते हैं।)
सिया (धीरे से, टूटे स्वर में) बोली -
“आप… इंसान नहीं हो ना?”
(कबीर की पकड़ ढीली पड़ती है। वो धीरे-धीरे पीछे हटता है, उसकी आँखें लाल होने लगती हैं।)
कबीर (थोड़े दर्दभरे स्वर में) बोला -
“काश… मैं कह पाता कि मैं हूँ…”
(सिया हैरान रह जाती है। कमरे की लाइट झिलमिलाने लगती है, हवा का झोंका दरवाज़ा बंद कर देता है।)
सिया (घबराकर) बोली -
“कबीर जी… ये क्या हो रहा है?”
(कबीर की पीठ से काले धुएँ जैसी छाया उठती है। सिया की साँसें तेज़ हो जाती हैं, वो पीछे हटती है।)
कबीर (धीरे से) बोला -
“वो निशान… वो सपना…सब झूठ नहीं था, सिया।”
(उसकी पीठ से काले पंख उभरने लगते हैं। सिया के मुँह से हल्की चीख निकलती है।)
सिया (काँपती आवाज़ में) बोली -
“नहीं… ये… ये नहीं हो सकता…”
(कबीर की आँखें अब पूरी तरह लाल हैं। वो सिया की ओर देखता है, चेहरे पर दर्द है, पर आँखों में प्यार भी।)
कबीर (धीरे, भावुक होकर) बोला -
“मैं वो नहीं बनना चाहता था, जो बना दिया गया हूँ…
पर तुमसे एक बात छिपा नहीं सकता अब —
मैं ही वो करण हूँ…जिसकी डायरी तुमने पढ़ी थी।”
(सिया के हाथ से कप टूटकर गिर जाता है। उसकी आँखें फटी की फटी रह जाती हैं।)
“सपने अब हक़ीक़त बन चुके थे…
सिया के सामने वही खड़ा था —
वो राज़, जिसे जानने की कीमत उसकी ज़िंदगी हो सकती थी।”
(रात का समय। घर में अजीब सी खामोशी है। हल्की बारिश हो रही है। बाथरूम के शीशे पर भाप जमी हुई है। सिया नल चालू करती है और चेहरे पर पानी मारती है। उसके चेहरे पर थकान, आँखों में बेचैनी साफ झलक रही है।)
(सिया खुद को शीशे में देखती है। कुछ सेकंड तक चुपचाप खुद को निहारती है। फिर अचानक उसकी नज़र कुछ अजीब पर टिक जाती है।)
(शीशे में उसकी परछाई अलग दिख रही थी — चेहरे पर भयानक मुस्कान, लाल चमकती आँखें और काले घुँघराले बाल। काली साड़ी लहराती हुई जैसे हवा में तैर रही हो।)
सिया (धीरे से, काँपती आवाज़ में) बोली -
“क… कौन हो तुम?”
(शीशे की परछाई मुस्कुराती है, और उसकी आवाज़ में गूंज जैसा असर होता है — भारी, ठंडी, डरावनी।)
ब्लैक सिया (मुस्कराकर) बोली -
“इतनी जल्दी भूल गईं… सिमरन?”
(सिया पीछे हटती है, उसका चेहरा सफेद पड़ जाता है।)
सिया (घबराकर) बोली -
“स… सिमरन?
नहीं… मैं सिया हूँ… सिया!”
(ब्लैक सिया ठहाका लगाती है — उसकी हँसी पूरे बाथरूम में गूंज उठती है, शीशे के कोनों में दरारें पड़ जाती हैं।)
ब्लैक सिया (तेज़ आवाज़ में) बोली -
“सिया? हा हा हा!
तुम खुद को झूठ बोल रही हो।
तुम सिमरन हो… वही लड़की…
जो डर से भागती थी… जो खुद से भी छिपी थी!”
(सिया डर से पीछे हटती है, परछाई और पास आती है। अब वो शीशे के अंदर नहीं, मानो शीशे से बाहर झुककर बोल रही हो।)
सिया (कान बंद करते हुए, काँपती आवाज़ में) बोली -
“नहीं! चुप रहो! मैं सिमरन नहीं हूँ!
तुम मेरी कल्पना हो… तुम सच नहीं हो!”
(ब्लैक सिया चीखती है —)
ब्लैक सिया (गर्जना करते हुए) बोली -
“सच मैं ही हूँ! तुम झूठ जी रही हो, सिमरन!”
(सिया रोने लगती है, उसके हाथ काँप रहे हैं। पानी का नल खुला रह गया है, पानी फर्श पर फैल रहा है।)
(तभी दरवाज़ा खुलता है — कबीर अंदर आता है। वो सिया को काँपते हुए देखता है।)
कबीर (चौंककर) बोला -
“सिया! क्या हुआ तुम्हें?”
(सिया उसकी ओर भागती है और उसे पकड़ लेती है।)
सिया (रोते हुए) बोली -
“वो… वो शीशे में कोई था! मेरी तरह दिखता था… पर वो मैं नहीं थी… वो मुझे सिमरन बुला रही थी…”
(कबीर उसे कसकर बाँहों में भर लेता है, धीरे-धीरे उसे शांत करने की कोशिश करता है।)
कबीर (धीरे, स्नेह से) बोला -
“शांत हो जाओ… कुछ नहीं है वहाँ… बस तुम्हारी आँखों का धोखा है…”
(वो सिया के सिर पर हाथ फेरता है, उसकी धड़कन तेज़ है।)
सिया (कमज़ोर स्वर में) बोली -
“नहीं कबीर जी, वो असली थी… वो मेरी आवाज़ में बोल रही थी… कह रही थी कि मैं सिमरन हूँ…”
(कबीर का चेहरा गंभीर हो जाता है। वो धीरे से सिया को बिस्तर तक ले जाता है।)
कबीर (धीरे से, खुद से बुदबुदाते हुए) बोला -
“तो वो फिर से शुरू हो गया…”
(सिया की आँखें आधी बंद हो रही हैं, वो नींद और डर के बीच झूल रही है।)
सिया (धीरे से) बोली -
“फिर से… क्या?”
(कबीर थोड़ा ठहरता है, फिर उसके माथे पर हाथ रखता है।)
कबीर (धीरे, झूठी मुस्कान के साथ) बोला -
“कुछ नहीं… बस एक बुरा सपना था, मेरी जान।”
(वो सिया को दवा देता है। सिया नींद में चली जाती है। कबीर उसके बालों पर हाथ फेरता है और धीरे से कहता है:)
कबीर (धीरे से, खुद से) बोला -
“मुझे डर था… कि उसकी बीमारी फिर लौटेगी…
पर अब… वो सिमरन सच में वापस आ रही है।”
(कैमरा शीशे की ओर जाता है — और वहाँ ब्लैक सिया की परछाई अब भी मुस्कुरा रही है, धीरे-धीरे होंठ हिलते हैं:)
ब्लैक सिया (फुसफुसाकर) बोली -
“मैं कभी गई ही नहीं… सिमरन…”
(लाइट झिलमिलाती है, स्क्रीन ब्लैक हो जाती है।)
“कबीर जानता था कि सिया की बीमारी ‘हैलुसिनेशन’ से कहीं गहरी थी। वो सिर्फ़ दिमाग़ की नहीं… आत्मा की लड़ाई थी।
सवाल था — क्या सिया खुद को बचा पाएगी… या सिमरन फिर से उस पर हावी हो जाएगी?”