real happiness in Hindi Motivational Stories by Vandna Sharma books and stories PDF | असली सुकून

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असली सुकून



कहानी अंधी दौड़ से सुकून तक
लेखिका डॉ वंदना शर्मा 

रीना अभी-अभी ऑफिस से आई थी। लैपटॉप मेज पर रखकर वह फ्रेश होने चली गई। फ्रेश होकर उसने एक कप कॉफी बनाई और फोन में मेल चेक करने लगी।

मेल देखते ही उसकी आँखें भर आईं - "बधाई हो रीना! आपको 'सर्वश्रेष्ठ कर्मचारी पुरस्कार' के लिए चुना गया है।"

उसका दिल किया जोर से चिल्लाए। उसने तुरंत अपने पति रोहन को फोन लगाया।

"रोहन, सुनो! मुझे बेस्ट एम्प्लॉयी का अवॉर्ड मिला है!"

दूसरी तरफ से थकी हुई आवाज आई, "हाँ तो? इसमें इतना खुश होने की क्या बात है रीना? यही छोटी-छोटी बातों में खुश होती रहती हो। कुछ बड़ा सोचो। बड़ा घर, विदेश जाना... ये बचपना छोड़ो, अब बड़ी हो जाओ। मैं मीटिंग में हूँ, बाद में बात करता हूँ।"

फोन कट गया। हाथ में गरम कॉफी का कप था, पर रीना का दिल एकदम ठंडा पड़ गया। एक पल पहले जो खुशी आसमान छू रही थी, वह अब कमरे के सन्नाटे में घुट रही थी।

वह सोचने लगी, मैं कब बड़ी हो पाऊंगी? तीस साल की तो हो गई हूँ। क्या हर समय गंभीर और मशीन बने रहना ही बड़ा होना है? खुशी को उत्सव की तरह क्यों नहीं मना सकते? सब कहते हैं, खुशी छुपा कर रखो, नजर लग जाएगी। मैं तो इस झूठी समझदारी से थक गई हूँ।

उसे अपना बचपन याद आ गया। जब मैडम कॉपी पर एक 'गुड' भी लिख देतीं, तो वह पूरे मोहल्ले में शोर मचा देती थी। भाई को चिढ़ा-चिढ़ा कर दिखाती, "देख, मेरी कॉपी में कितने सारे गुड हैं!" तब खुशी बाँटने के लिए कितने लोग थे। और आज?

उसने खिड़की से बाहर देखा। सड़क पर सब भाग रहे थे। उसे लगा, इस दौड़ती-भागती दुनिया में सब इतने व्यस्त हैं कि किसी के पास दो पल ठहरने का समय ही नहीं। सब एक अंधी दौड़ में दौड़े जा रहे हैं। किसी को नहीं मालूम जाना कहाँ है, बस भेड़चाल में दौड़े जा रहे हैं, इस डर से कि कहीं पीछे न रह जाएं। पर जब मंजिल का ही पता नहीं, तो जीत कैसी और हार कैसी?

इंसान आज मशीन बन गया है। पैसे और तरक्की के लिए इतना अंधा कि न स्वास्थ्य की परवाह, न रिश्तों के लिए समय। और अगर इतना कमा भी लिया तो किस कीमत पर? ऐसी कामयाबी किस काम की, जहाँ अपने ही पीछे छूट जाएं और शाम की कॉफी पर खुशी बाँटने वाला कोई न हो।

ये बंगले, ये रुतबा, ये पैसा कुछ साथ नहीं जाता। सब यहीं रह जाता है। जब अपनी सांस ही साथ छोड़ देती है तो नाम भी छूट जाता है।

उसी पल रीना की आँखों से आँसू तो गिरे, पर उनमें एक नई रोशनी थी। उसने अपना फोन उठाया और रोहन को एक आखिरी मैसेज लिखा, "मैं अपनी नौकरी से आधा दिन कम कर रही हूँ। बाकी समय में मैं जीना सीखूंगी। योगा, डांस, और वो सारी छोटी खुशियाँ जो मैंने खो दी थीं।"

उसने कॉफी का आखिरी घूंट लिया। आज वह अकेली नहीं, आजाद लग रही थी।

क्योंकि जीने का सही तरीका ज्यादा कमाने में नहीं, बल्कि हर छोटी खुशी को पूरी शिद्दत से जीने में है। सुकून से बड़ी कोई कामयाबी नहीं।
डॉ वंदना शर्मा नई दिल्ली