Routes - 30 in Hindi Women Focused by shiromani mathur books and stories PDF | राहें - 30

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राहें - 30

एक थी रेनू

रेनू अपनी परिचित ऑटी सावित्री के घर पहुँची, दरवाजा
खटखटाते हुये वह थोड़ा झिझक रही थी, फिर भी हिम्मत करके
उसने दरवाजा खटखटाया, दरवाजा सावित्री ऑटी ने ही खोला-
रेनू को दरवाजे पर देखकर वे भी स्तंभित रह गई ,फिर बोली-
आओ बेटी ,अन्दर आओ और उन्होनें रेनू को अन्दर ड्राइंग रूम में
बैठाया - पूछा - कैसे हो बेटे-?
बैठते हुये रेनू बोली - ठीक हूँ ऑटी ।
सावित्री ने पूछा - अभी कहाँ रह रही है? इधर आना नहीं होता
क्या -? तेरा कोई हाल चाल भी पता नहीं चला - रेनू बोली - ऑटी
मकान की खोज में ही मैं आपके पास आई हँ, आपके यहाँ किराये
के मतलब से कमरें हो, तो मुझे चाहिये ।
सावित्री ने पूछा - अभी कहाँ रह रही हो?
रेनू बोली - ननद के घर में रह रही हूँ, उनका घर भी छोटा
है इसलिये अड़चन हो रही है।
पहले बसंत कहाँ रहते थे -? सावित्री ने पूछा -
रेनु ने कहा - वे तो ननद के घर सो जाते थे और ननद के घर
में मेहमान आने पर दूकान में ही सो जाते थे। अब घर ना होने से मुझे 
रहने में परेशानी हो रही है। इसलिये आपके पास आई हूँ।
सावित्री बोली - बेटी , मेरे यहाँ कमरे खाली है। तुम रहोगी तो
मुझे भी अच्छा लगेगा परन्तु तुम जानती हो कि तम्हारी इस शादी से
तुम्हारे मम्मी पापा तुमसे नाराज है यदि हमने तुम्हें अपने घर रहने के
लिये कमरे दिये तो वे हमसे भी दुश्मनी साध लेंगें और हमसे भी
लड़ाई झगड़ा करेगें। तुम्हीं सोचो, पड़ोस में तुम्हारे मम्मी- पापा रहते
हैं और तुम भी यहीं रहोगी तो तुम्हें कैसा लगेगा? गंभीर मुद्रा में
सावित्री ने कहा।
रेनू बोली -- यही सब मै भी सोच रही थी, यहाँ रहना ठीक नहीं
होगा - मेरे कारण मम्मी आपसे भी लड़ेगी, झगड़ेगी।
सावित्री ने पूछा- तुम्हारे भाई बहन कोई तुमसे बातचीत करते
हैं या नही ?
रेनू ने कहा- कोई भी बात नही करता यदि बाजार में कभी
टकरा भी जाते हैं तो भी वे लोग मेुँह फेर लेते हैं।
सावित्री के पड़ोसी शर्मा जी की बड़ी बेटी रेनू बड़ी अच्छी व
व्यवहार कुशल लड़की थी। प्रेम प्रसंग में पड़कर भावना वश दलित
बसंत से शादी कर ली है। जबसे उसने बसंत से शादी की है, तब से
पूरा शर्मा परिवार उससे नाराज है। विजातीय बसंत से माता पिता की
इच्छा के बिना शादी करने से समाज में उनकी बेइज्जती हुयी है
और अन्य भाई बहन की शादी होने में भी परेशानी होगी, इसलिये
परिवार का कोई भी सदस्य उससे बातचीत नहीं करता । पहले तो वे
लोग इतने नाराज थे कि कहीं बसंत मिल जाता तो उसकी अच्छी
मरम्मत कर देते। इसलिये रेनू व बसंत बहुत दिनों तक नगर से बाहर
रह रहे थे।
बसंत की बहन के घर रेनु व बसंत रह रहे थे। छोटे घर में
उनको परेशानी हो रही थी, इसलिये रेनू कहीं अन्यंत्र रहने लायक
कमरे खोज रही थी। उसे मालूम था कि सावित्री ऑटी के घर में
कमरे मिल जाते परन्तु वह सावित्री ऑटी को किसी परेशानी में नहीं
डालना चाहती थी।
इसलिये बोली - ठीक है, ऑटी देखती हूँ ,कहीं और व्यवस्था
हो जाती है तो अच्छा रहेगा और जगह प्रयास करती हूँ। कहकर रेनू
चली गई।
सावित्री उसको जाते हुये देखती रही और सोचती रही। रेनू
उसकी बेटी रश्मि के साथ पढ़ती थी, बचपन से दोनो साथ खेलती
रही हैं , घंटो रेणू सावित्री के घर खेलती रहती थी।
रेनू गाने में बहुत होशियार थी, अपनी सुरीली आवाज में जब वह
गीत या ददरिया गाती तो सुनने वाले मुग्ध हो जाते थे, स्कूल के कई
कार्यक्रमों में भाग लेकर वह अपनी प्रतिभा दिखा चुकी थी। उसकी
सहलियाँ उसे लता मंगेशकर कह कर बुलाती थीं। बड़ी सुशील और
समझदार लड़की है रेनू, पता नहीं कैसे बसन्त के प्रेम - प्रसंग में फंस
कर शादी कर बैठी। चलो दोनों सुखी रहे, यही दुआ है।
बाद में पता चला रेनू कहीं मजदूरों की बस्ती में कमरा लेकर
रह रही थी। बसंत का पान का ठेला भी ज्यादा नहीं चलता था।
दोनों का खर्चा निकालना मुश्किल होता था, बसंत बड़ी बड़ी बातें
करके उसे बहलाता रहता था, ना जाने -कहाँ -कहाँ के सपने उसने
उसे दिखाये थे।
शादी के दो वर्ष के बाद रेनू एक बच्चे की माँ बन गई। बच्चे के
जन्म के बाद भी रेनु के माता पिता ने उससे सम्बन्ध नहीं रखा। बसंत
के माता पिता तो थे ही नहीं, उसकी बहन ने ही बच्चे के जन्म के
समय में उनका साथ दिया।
बच्चा आने के बाद घर के खर्चे और बड़ गये परन्तु बसंत की आमदनी
नहीं बड़ी। पति पत्नी में आये दिन झगड़े होने लगे । पढ़ी लिखी रेनू
बसंत को बहुत समझाती और शराब ना पीने के लिये मनाती रहती
थी,रेनू के सौन्दर्य, सुरीली आवाज, शालीन व्यवहार व बातचीत का
प्रभाव बसंत के मन से धीरे धीरे उतरने लगा और शराब का नशा उस
पर चढ़ता गया। शराब पीने की ऐसी लत लगी कि वह उसे छोड़
नहीं पा रहा था, वरना रेनू जैसी पत्नी को पाकर वह अपना जीवन
सुधार सकता था।
पति की मार पीट, गाली गलौज व माता पिता, भाई बहनो द्वारा
त्याज्य रेनू दिन प्रतिदिन टूटती गई । घर में मन बहलाने को सुन्दर
सा बच्चा था फिर भी गरीबी और बसंत का व्यवहार उसे सहन नही
हो पा रहा था। बसंत रोज रात को पीकर आता और मारपीट करता।
अकेली रेन् निराश होती जा रही थी।बसंत की लापरवाही और दारू पीने की आदत से रेणु दुखी रहती थी. 
एक दिन बच्चे की तबियत खराब थी। देर रात बसंत शराब के
नशे में झूमता हुआ, घर आया। रेनु बोली- आज बच्चे की तबियत ज्यादा
खराब है- दिन भर रोता रहा-समझ में नहीं आता क्या करू?
बसंत बोला - डाक्टर को दिखा देती, इसमें क्या समझने की
बात है?
रेनू बोली - मेरे पास एक भी पैसा नहीं है, डाक्टर के पास
जाती तो डाक्टर की फीस और दवाई लेने के लिये पैसे होने चाहिये ।
बसंत चिड़कर बोला- अपने बाप से मॉग लेती, मैने क्या तेरा
और तेरे बच्चे का ठेका लिया है?
रेनू बोली - तुम जानते हो मैं उनके पास नहीं जाती। तुम्हारे
कारण उनसे भी नाता तोड़ दिया और तुम्हीं ऐसा कहते हो।
बसंत गुस्से से बोला - मेरे कारण मॉ बाप से रिश्ता तोड़ा -
क्या बकती है,? अपने शौक के लिये भागकर आई है, मेरे कारण आती
तो कुछ माल लेकर आती। बड़े बाप की बेटी है ,कहने भर के लिये,
कुछ लेकर आती तो जानता- ना जाने कहाँ कहाँ घूमती थी, आज
नखरे दिखाती है। बच्चा भी ना जाने किसका है और मेरे सिर थोप
रही है, चल निकल यहाँ से।
रेनू बोली - अब मैं कहाँ जाऊँ? तुम मुझ पर ही लॉछन लगा
रहे हो- तुम्हीं तो कहते थे कि गाँव में मेरा बहुत बड़ा पक्का घर है,
यह है,वह है, बड़ी बड़ी बातें करते थे आज बच्चे की दवा के लिये पैसे
तक नहीं है।
इतना सुनते ही उन्मुक्त बसंत उठा और उससे मारपीट करने
लगा-बहुत जबान चलाती हैं निकल यहा से, मैं तुझे नहीं रखूंगा
कहकर उसने रेनू को घर से बाहर निकाल दिया, बसंत भी जान
चुका था रिनू अब कहीं नहीं जा सकती उसी की गुलाम बन कर रहेगी, बसंत ने धक्का-मुक्की करके उसे घर से बाहर निकाल दिया और दरबाजा अंदर से बन्द कर लिया. 
रेनू बहुत रोती रही, घंटो बाहर बैठी रही. बसंत के वाक् जाल
में फंस कर वह बहुत पछताती रही। अब पिता के घर जाना भी
उसके लिये संभव नही था, उसकी समझ में कुछ नहीं आ रहा था
कि क्या करे क्या ना करे?
बसंत आये दिन उसे परेशान करता था, धीरे धीरे वह टूटती
गई। वह अपने को असहाय अनुभव करने लगी थी इधर बसंत का मन भी उससे भर गया था वो बात-बात में रेणु को अपमानित करने लगा और मार पीट भी करने लगा था. रेणु बहुत दुखी रहने लगी, अपना दर्द वो किसी से कह भी नहीं पाती थी अन्दर ही अन्दर वो घुलती रहती थी. घुटन बढ़ती ही जा रही थी एक दिन 
बसंत की अनुपस्थिति में बच्चे को सुलाकर रेनू चुन्नी का फंदा
लगाकर, इस संसार से बिदा ले गई। घुट घुट कर अपमानित जीवन
जीने की बजाय उसने मौत को गले लगाना उचित समझा, और एक
मीठी सुरीली आवाज सदैव के लिये शान्त हो गई। रेणु की मौत अपने पीछे कई ज्वलन्त प्रश्न छोड़ गयी, समाज और समाज की परम्पराएं, युवा पीढ़ी के भावात्मक निर्णय, जल्दबाजी में उठाए गए कदम. 

छत्तीसगढ़ रत्न
डॉ. शिरोमणि माथुर 
दल्ली राजहरा
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